कहते हैं राजनीती में कुछ सम्भव है. महाराष्ट्र की राजनीती में 20साल से बिछड़े भाई फिर एक साथ आने को तैयार हो रहें हैं.
उद्देव ठाकरे और राज ठाकरे एक बार फिर से साथ आने को राजी हो रहें हैँ. इसका श्रेय हिंदी को जाता है. दरअसल इस समय दोनों ही महाराष्ट्र की राजनीती में धूमिल हो रहें है. दोनों को आगे बढ़ने और चर्चा में रहने के लिए कोई मुद्दा चाहिए. फिलहाल यह मुद्दा हिंदी है. ये दोनों ही महाराष्ट्र के स्कूलों में हिंदी पढ़ाये जाने का विरोध कर रहें हैँ. अब शायद दोनों एक साथ मिलकर विरोध करेंगे.
मामला यह बताया जाता है की महाराष्ट्र के स्कूलों में पाँचवी कक्षा तक हिंदी अनिवार्य कर दी गई है. महाराष्ट्र में बच्चें अब मराठी नहीं पढना चाहते है. क्योंकि महाराष्ट्र में आम बोलचाल में हिंदी बढ़ती जा रही है. इसी बजह से अब स्कूलों में भी हिंदी पढ़ाई जायेगी.
एक सत्य यह भी है की यदि भारत की राजनीती में चमकना है तो हिंदी बोलनी आनी बहुत जरूरी है. उद्देव ठाकरे भी अक्सर हिंदी में बोलते दिखाई दे जाते हैं.
हिंदी ऐसी सरल भाषा है जिसे बोलना, समझना बहुत सरल है. कश्मीर से कन्या कुमारी तक हिंदी का भले ही कहीं - कहीं विरोध होता हो लेकिन वहाँ भी हिंदी बोली - समझी जाती है. अब इसी हिंदी के बहाने दोनों बिछड़े हुए भाइयों का मिलन संभव हो पा रहा है। जय हिंदी मैया।
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