राहुल गांधी जिस बिना छपी किताब को लेकर संसद में घूमते दिखे, वह असल में कोई शोधग्रंथ नहीं बल्कि आरोपों, चयनित उद्धरणों और अधूरी सूचनाओं का पुलिंदा था निशिकांत दुबे ने संसद के भीतर कांग्रेस को जिस तरह घेरा, वह सिर्फ एक पलटवार नहीं था, बल्कि गांधी परिवार के लंबे राजनीतिक इतिहास पर खड़े होते सवालों की एक पूरी श्रृंखला थी दुबे ने यह स्पष्ट किया कि अगर आरोपों के आधार पर राजनीति करनी है, तो फिर गांधी से लेकर राहुल तक की पूरी विरासत को भी उसी कसौटी पर रखा जाएगा...!!
महात्मा गांधी के नाम से शुरू होकर कांग्रेस अक्सर नैतिकता का दावा करती है, लेकिन आज़ादी के बाद सत्ता में आई कांग्रेस सरकारों के फैसलों पर दर्जनों किताबें सवाल उठाती रही हैं आरसी मजूमदार जैसे इतिहासकारों ने आज़ादी के विभाजन और उसके बाद की नीतियों पर गंभीर आलोचनाएँ लिखीं कश्मीर मुद्दे को संयुक्त राष्ट्र ले जाने का निर्णय, पीओके का स्थायी हो जाना, और युद्धविराम ये सब ऐसे फैसले हैं जिन पर The Story of Kashmir और India Wins Freedom जैसी पुस्तकों में तीखी बहस मिलती है यह कोई भाजपा का नैरेटिव नहीं, बल्कि कांग्रेस-कालीन दस्तावेज़ों और स्वयं कांग्रेस नेताओं के लिखे संस्मरण हैं...!!
नेहरू युग पर एल्फ़्रेड डेविड, शौर्य दोवल और जदुनाथ सरकार जैसे लेखकों ने विदेश नीति, चीन नीति और रक्षा तैयारियों की भारी चूक का उल्लेख किया है 1962 की पराजय पर Himalayan Blunder जैसी किताबें बताती हैं कि आदर्शवाद के नाम पर देश की सुरक्षा के साथ कैसा समझौता हुआ। इंदिरा गांधी के दौर पर आएं तो The Emergency और Indira Gandhi: A Life in Nature जैसी पुस्तकों में आपातकाल के दौरान प्रेस की आज़ादी कुचलने, विपक्ष को जेल में डालने और संविधान की आत्मा से खिलवाड़ का विस्तृत वर्णन है यह सब आरोप नहीं, बल्कि उस दौर के सरकारी आदेश, अदालती टिप्पणियाँ और पत्रकारों की प्रत्यक्ष गवाही हैं...!!
राजीव गांधी के समय बोफोर्स घोटाला सिर्फ एक राजनीतिक नारा नहीं रहा Boforsgate और The Politician जैसी किताबों में स्वीडन से आए दस्तावेज़, बैंक ट्रेल्स और जांच रिपोर्टों का उल्लेख मिलता है कोर्ट के फैसले भले तकनीकी आधार पर आए हों, लेकिन नैतिक सवाल आज भी जिंदा हैं इसके बाद पी.वी. नरसिम्हा राव के काल में कांग्रेस ने सुधारों का श्रेय लिया, पर उसी दौर में जैन हवाला जैसे मामलों ने पार्टी की आंतरिक सड़ांध भी उजागर की, जिस पर The Scam जैसी पुस्तकों में विस्तार है...!!
सोनिया गांधी के उदय के साथ कांग्रेस एक परिवार-केंद्रित संगठन बनती चली गई यह आरोप भी सिर्फ विरोधियों का नहीं The Accidental Prime Minister और The Insider जैसी किताबें बताती हैं कि मनमोहन सिंह जैसे प्रधानमंत्री की सीमाएँ कहाँ तक तय की जाती थीं और कैसे नीतिगत फैसलों पर पार्टी अध्यक्ष का प्रभाव निर्णायक था 2G, कोयला घोटाला, कॉमनवेल्थ गेम्स इन सब पर CAG रिपोर्टें, चार्जशीट्स और न्यायिक टिप्पणियाँ मौजूद हैं, जिनका उल्लेख 2G Spectrum Scam और Coalgate Files जैसी पुस्तकों में मिलता है...!!
और फिर आते हैं राहुल गांधी पर The Prince और The Rahul Gandhi Story जैसी किताबें उनके राजनीतिक प्रशिक्षण, विदेश यात्राओं, पार्टी के भीतर निर्णयहीनता और बार-बार की चुनावी विफलताओं का विश्लेषण करती हैं संसद में देशद्रोह, सेना, न्यायपालिका और चुनाव आयोग पर दिए गए बयानों को लेकर अदालतों की फटकार, माफी और नोटिस ये सब सार्वजनिक रिकॉर्ड का हिस्सा हैं भारत को डेड डेमोक्रेसी कहने जैसे बयान अंतरराष्ट्रीय मंचों पर दिए गए, जिन पर विदेश नीति विशेषज्ञों और पूर्व राजनयिकों ने भी सवाल उठाए हैं....!!
निशिकांत दुबे का हमला इसी पृष्ठभूमि में था उनका कहना साफ था अगर कांग्रेस आरोपों की किताबें लेकर बैठेगी, तो गांधी परिवार की पूरी कुंडली भी किताबों, दस्तावेज़ों और इतिहास से ही खोली जाएगी फर्क बस इतना है कि एक तरफ़ बिना छपी, बिना स्रोत वाली फाइलें हैं और दूसरी तरफ़ दशकों से प्रकाशित किताबें, सरकारी रिपोर्टें और अदालती रिकॉर्ड संसद में कांग्रेस का असहज होना इसीलिए स्वाभाविक था, क्योंकि सवाल किसी एक नेता पर नहीं, बल्कि उस राजनीतिक विरासत पर था जिसने नैतिकता का ठेका लेकर सत्ता का सबसे लंबा दौर देखा और हर मोड़ पर विवादों की छाया भी...!!