मंगलवार, 17 फ़रवरी 2026

फ़िरोज़ गाँधी की दास्तान

एक दो दिन से *कांग्रेस के मणिशंकर अय्यर* बहुत चर्चा में है, उन्होंने कांग्रेस प्रवक्ताओं को विशेषकर *पवन बखेड़ा* को *चमचा* कहा जैसा बाक़ी सभी भक्त लोग सम्माननीय कांग्रेसियों को कहते हैं।
*भारतीय राजनीति और संस्कृति में चमचो का अलग ही स्थान है, हमारे समाज में भी कुछ लोग चुनाव हराकर भी पद प्राप्त करने में कामयाब हो जाते हैं सिर्फ़ चमचागिरी करके, किंतु कांग्रेस में हमेशा ऐसा नहीं रहा।*
राहुल गाँधी के दादा जी *स्वर्गीय फिरोज गांधी* भारतीय राजनीति के इतिहास के वे *दामाद* थे, जिन्होंने *ससुराल में सोफ़े पर बैठकर चाय पीने के बजाय, ससुराल की ही ईंट से ईंट बजाना बेहतर समझा।*
उन्होंने नेहरू को 'ससुर' और गांधी को 'नाम' के रूप में चुना—एक ने उन्हें सत्ता के गलियारे दिए, दूसरे ने उन गलियारों में आग लगाने की हिम्मत!
*कल्पना कीजिए, आज के दौर में कोई दामाद अपने ससुर की कंपनी के घोटालों की फाइलें लेकर प्रेस कॉन्फ्रेंस कर दे?* फिरोज गांधी ने 1957 में यही किया था। नेहरू जी तब देश के निर्विवाद नायक थे, लेकिन फिरोज ने संसद में खड़े होकर *मुंद्रा कांड* की ऐसी परतें खोलीं कि नेहरू जी को समझ नहीं आ रहा था कि वे सदन के नेता के रूप में जवाब दें या ससुर के रूप में गुस्सा करें।
*मुंद्रा कांड (1957): LIC का वो 'पहला पाप'*
यह वह समय था जब नेहरू का नाम ही कानून था, लेकिन फिरोज ने दिखाया कि लोकतंत्र में 'जनता का पैसा' किसी भी रिश्ते से ऊपर है।
*हरिदास मुंद्रा नाम के एक शातिर सट्टेबाज ने नेहरू सरकार के कुछ अधिकारियों और वित्त मंत्री टी.टी. कृष्णमाचारी के साथ मिलकर एक योजना बनाई। LIC (भारतीय जीवन बीमा निगम), जो उस समय जनता के भरोसे का प्रतीक था, उसे मजबूर किया गया कि वह मुंद्रा की छह डूबती हुई कंपनियों के रद्दी शेयर खरीदे।*
16 दिसंबर 1957 को संसद में फिरोज गांधी ने जब फाइलें खोलीं, तो सन्नाटा पसर गया। उन्होंने तीखा व्यंग्य करते हुए पूछा— *”क्या यह सरकार का काम है कि वह सट्टेबाजों के कचरे को जनता की गाढ़ी कमाई से साफ करे?"*
यह शायद इतिहास का पहला उदाहरण था जहाँ डाइनिंग टेबल पर बैठा व्यक्ति (दामाद) सुबह संसद में जाकर अपने ही मेजबान (ससुर) की सरकार का 'कबाड़ा' कर रहा था। मुंद्रा कांड ने नेहरू को इतना मजबूर कर दिया कि उन्हें अपने सबसे प्रिय वित्त मंत्री की बलि देनी पड़ी और सट्टेबाज मुद्रा को जेल भेजना पड़ा
उन्होंने LIC के पैसे के दुरुपयोग को ऐसे पकड़ा जैसे कोई अनुभवी जासूस। नतीजा? वित्त मंत्री का इस्तीफा हो गया और ससुर-दामाद के बीच डिनर टेबल पर सन्नाटा छा गया। फिरोज गांधी ने साबित किया कि "ससुराल गेंदा फूल" हो सकता है, लेकिन भ्रष्टाचार "कांटों की सेज" ही होगा।

*यह फिरोज गांधी ही थे जिन्होंने भारतीय राजनीति को सिखाया कि "देशभक्ति का मतलब सरकार की जी-हुजूरी करना नहीं, बल्कि जनता के पैसे की चौकीदारी करना है।"*

फिरोज गांधी का व्यक्तित्व बहुत गहरा और गंभीर था। वे केवल एक 'विद्रोही' नहीं थे, वे एक बेहद पढ़ा-लिखा और मेहनती सांसद थे। वे आंकड़ों के जादूगर थे। *लेकिन दुख की बात है की राहुल गांधी में उनके DNA का कुछ भी नहीं है।*
फिरोज गांधी सत्ता के सबसे करीब रहकर भी सत्ता की चापलूसी नहीं की।
फिरोज और इंदिरा का रिश्ता किसी ग्रीक ट्रेजेडी (Greek Tragedy) जैसा था। वे एक-दूसरे से प्यार तो करते थे, लेकिन फिरोज की 'आजाद खयाली' और इंदिरा की 'सत्ता की मजबूरी' के बीच एक गहरी खाई थी।
          आज के दौर में जहाँ लोग 'टिकट' के लिए अपनी विचारधारा बदल लेते हैं, फिरोज गांधी ने अपनी विचारधारा के लिए अपना 'घर' (तीन मूर्ति भवन) तक छोड़ दिया और एक छोटे से सरकारी बंगले में रहने चले गए।

फिरोज गांधी को इतिहास ने थोड़ा भुला दिया। शायद इसलिए क्योंकि वे "फिट" नहीं बैठते थे। न वे पूरी तरह कांग्रेस के 'दरबारी' बन पाए, और न ही विपक्ष के 'मोहरे'।
*उनकी मौत 48 साल की उम्र में हुई। शायद उनका दिल इतना बड़ा था कि उसमें नेहरू की नाराजगी, इंदिरा का प्रेम और देश के घोटालों का बोझ—तीनों एक साथ नहीं समा सके।*
आज अगर फिरोज गांधी जीवित होते तो शायद वो अपना सरनेम बदलकर *मोदी* अवश्य कर लेते और राहुल गाँधी को देखते ही दादाजी थप्पड़ रसीद करने से भी बाज नहीं आते।
✍️विकास जैन

रविवार, 15 फ़रवरी 2026

क्या -क्या बताएं?

लीजिए पेश है एक और सच्चाई।

जवाहरलाल नेहरू अभिनेत्री नरगिस के मामा थे। नरगिस की नानी दिलीपा, मंगल पाण्डेय के ननिहाल के राजेन्द्र पाण्डेय की बेटी थीं।

उनकी शादी 1880 में बलिया में हुई थी लेकिन शादी के एक हफ़्ते के अंदर ही उनके पति गुज़र गए थे।

दिलीपा की उम्र उस वक़्त सिर्फ़ 13 साल थी। उस ज़माने में विधवाओं की ज़िंदगी बेहद तक़लीफ़ों भरी होती थी।

ज़िंदगी से निराश होकर दिलीपा एक रोज़ आत्महत्या के इरादे से गंगा की तरफ़ चल पड़ीं, लेकिन रात में रास्ता भटककर मियांजान नाम के एक सारंगीवादक के झोंपड़े में पहुँच गयीं जो तवायफ़ों के कोठों पर सारंगी बजाता था...

मियांजान के परिवार में उसकी बीवी और एक बेटी मलिका थे... वो मलिका को भी तवायफ़ बनाना चाहता था...

दिलीपा को मियांजान ने अपने घर में शरण दी...

और फिर मलिका के साथ साथ दिलीपा भी धीरे धीरे तवायफ़ों वाले तमाम तौर तरीक़े सीख गयीं...

और एक रोज़ चिलबिला की मशहूर तवायफ़ रोशनजान के कोठे पर बैठ गयीं...

रोशनजान के कोठे पर उस ज़माने के नामी वक़ील मोतीलाल नेहरू का आना जाना रहता था...

जिनकी पत्नी पहले बच्चे के जन्म के समय गुज़र गयी थी...

दिलीपा के सम्बन्ध मोतीलाल नेहरू से बन गए...

इस बात का पता चलते ही मोतीलाल के घरवालों ने उनकी दूसरी शादी लाहौर की स्वरूप रानी से करा दी जिनकी उम्र उस वक़्त 15 साल थी...

इसके बावजूद मोतीलाल ने दिलीपा के साथ सम्बन्ध बनाए रखे...

इधर दिलीपा का एक बेटा हुआ जिसका नाम मंज़ूर अली रखा गया...

उधर कुछ ही दिनों बाद 14 नवम्बर 1889 को स्वरूपरानी ने जवाहरलाल नेहरू को जन्म दिया...

साल 1900 में स्वरूप रानी ने विजयलक्ष्मी पंडित को जन्म दिया...

और 1901 में दिलीपा से "जद्दनबाई" पैदा हुईं...

"अभिनेत्री नरगिस" इन्हीं जद्दनबाई की बेटी थीं...

मंज़ूर अली आगे चलकर मंज़ूर अली सोख़्त के नाम से बहुत बड़े मज़दूर नेता बने...

और साल 1924 में उन्होंने यह कहकर देशभर में सनसनी फैला दी कि...

मैं मोतीलाल नेहरू का बेटा और जवाहरलाल नेहरू का बड़ा भाई हूँ...

उधर एक रोज़ लखनऊ नवाब के बुलावे पर जद्दनबाई मुजरा करने लखनऊ गयीं... तो दिलीपा भी उनके साथ थी...

जवाहरलाल नेहरू काँग्रेस के किसी काम से उन दिनों लखनऊ में थे...

उन्हें पता चला तो वो उन दोनों से मिलने चले आए...

दिलीपा जवाहरलाल नेहरू से लिपट गयीं.और रो रोकर मोतीलाल नेहरू का हालचाल पूछने लगीं...

मुजरा ख़त्म हुआ तो जद्दनबाई ने जवाहरलाल नेहरू को राखी बाँधी...

साल 1931 में मोतीलाल नेहरू ग़ुज़रे तो दिलीपा ने अपनी चूड़ियाँ तोड़ डालीं...

और उसके बाद से वो विधवा की तरह रहने लगीं...

गुजरात के वरिष्ठ लेखक रजनीकुमार पंड्या जी की क़िताब ‘आप की परछाईयां’ से साभार 💯 #mahabharat #lovesong #romance #stories #love #NitishKumar #science #viralphoto #reelschallenge #viralvideoシ #Neharuchacha

शुक्रवार, 13 फ़रवरी 2026

गाँधी परिवार, शर्मनाक

कोई पत्रकार राहुल गांधी से यह नहीं पूछ रहा कि राहुल जी जब तक नरेंद्र मोदी भारत के प्रधानमंत्री नहीं बने थे, तब तक आप की नानी आपकी दोनों मौसी दोनों मौसी के पति बच्चे यानी आप का इटली का पूरा खानदान दिल्ली में रहता था, उनको 3 सरकारी बंगले किस हैसियत से इलाट किए गए थे और वह किस हैसियत से तमाम सरकारी कार्यक्रम में शामिल होते थे??

और नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के 15 दिन के बाद यह पूरा माइनों खानदान किसी चोर की तरह इटली क्यों चला गया??

आज राहुल गांधी नानी से मिलने के बहाने बार-बार इटली जाते हैं लेकिन कभी 10 साल कांग्रेस के सत्ता के दौरान और उसके पहले जब राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे तब यह धूर्त इटली नहीं जाते थे, क्योंकि सोनिया गांधी के मायके का पूरा खानदान दिल्ली में रहता था और लुटियंस जोन में पांच बंगले उन्हें रहने को दिए गए थे।

यहां तक कि सोनिया गांधी के बचपन का दोस्त क्वात्रोची भी सोनिया गांधी के साथ रहता था।

सोनिया गांधी की मां पाउलो माइनो सरकारी कार्यक्रम में भाग लेती थी। राष्ट्रपति भवन में कई सरकारी कार्यक्रम में शामिल होती थी। पूरी सरकारी मशीनरी उनके आगे पीछे घूमती थी।

सोनिया गांधी की तीन बहने हैं जिसमें से दो बहने तो भारत में ही रहती थी और एक बहन का रोम और मिलान में बहुत बड़ा एंटीक स्टोर है।

और कई पुरातत्वविद ने इस बात का खुलासा किया था कि भारत से कई म्यूजियम में दुर्लभ चीजों को प्रदर्शनी के बहाने विदेश ले जाया जाता था और फिर वहां बड़े नाटकीय ढंग से उन्हें चोरी हुआ दिखा दिया जाता था और बाद में पता चलता था कि वह सोनिया गांधी के बहन के स्टोर में बिकने के लिए गया है।

इस तरह से भारत की तमाम बेशकीमती दुर्लभ मूर्तियां तमाम आर्टीफैक्ट्स विदेशों में प्रदर्शनी के बहाने ले जाए गए और वहां चोरी की नौटंकी बता कर सोनिया गांधी के बहन के स्टोर में पहुंचा दिया गया था 💯 #science #stories #viralphoto #reelschallenge #viralvideoシ #reelsfypシ #lovesong #love #romance

गुरुवार, 12 फ़रवरी 2026

गिरावट की हद

थर्ड क्लास राजनीति करने वाले सनकी राहुल गांधी की अब अंतरराष्ट्रीय बेइज्जती होगी :-

पूर्व आर्मी चीफ जनरल नरवणे की किताब से जुड़ा मामला अब आगे बढ़ गया है । दिल्ली पुलिस ने इस किताब को ले एफआईआर दर्ज कर ली है । 
यह किताब अभी तक आधिकारिक रूप से प्रकाशित नहीं हुई है, और इसे अप्रकाशित किताब मानते हुए पुलिस ने स्पेशल सेल को जांच सौंपी है ।

यह मामला 2024 से शुरू होता है, जब जनरल नरवणे की संस्मरण किताब ‘फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी’ प्रकाशन के लिए तैयार थी । 
इस किताब में उनकी 40 साल की आर्मी सर्विस सेवा का ब्योरा है, जिसमें 1962 के बाद भारत-चीन के बीच गलवान घाटी में हुए सैन्य टकराव के साथ-साथ अग्निपथ योजना जैसे विवादास्पद मुद्दों पर जानकारी शामिल है । 

पेंग्विन रैंडम हाउस इंडिया ने किताब के प्री-ऑर्डर शुरू कर दिए थे, लेकिन रक्षा मंत्रालय (MoD) से जरूरी क्लियरेंस न मिलने के कारण प्रकाशन रुक गया । अब 2026 में भी किताब अप्रकाशित है ।

लेकिन सच बताएं तो बड़ा रहस्य उजागर करने और लम्बे समय से चली आ रही अपनी सनक को सच साबित करने के चक्कर में  राहुल गांधी इस मामले में बुरी तरह फंस गए हैं ।
वैसे तो उन्हें बढ़ चढ़कर बोलने और लगातार जुगाली करने के बाद माफ़ी मांगने की पुरानी आदत है । लेकिन जनरल नरवणे की किताब को लेकर उनकी अब अंतरराष्ट्रीय बेइज्जती होने वाली है । 
मोदी को जनरल नरवणे की किताब के जरिए घेरने की उनकी मंशा खुद उन्हीं के गले का फंदा बन सकती है । एक तरफ कानूनी कार्रवाई शुरू हो चुकी है और दूसरी तरफ उनके एलओपी पद के सामने भी संकट आ खड़ा हुआ है ।

जनरल साहब खुद कह चुके हैं कि उनकी किताब प्रकाशन हाउस में है , प्रकाशक ने क्लियरेंस के लिया रक्षा मंत्रालय भेजी है । 
अनुमति आने पर छपेगी किताब । तो राहुल गांधी के पास कवर फोटो सहित जो किताब है वह या तो किसी ने नरवणे के घर से चुराई या फिर पब्लिशिंग हाउस से ? 
या फिर किसी के लम्बे हाथ यदि बहुत लम्बे हुए तो पता लगाना होगा कि कहीं डिफेंस मिनिस्ट्री तक तो नहीं जा पहुँचे ? खैर , एफआईआर हो चुकी और पुलिस ने जाँच शुरू कर दी । 

तो एब्रॉड आई या एमेजॉन से आई , खुलासा तो होगा ही । एमेजॉन कोई प्रकाशन संस्थान नहीं केवल विक्रेता है । बताना उसे भी पड़ेगा कि उसके पास किस पब्लिशर से आई किताब ? 

जनरल नरवणे में जिस पेंगुइन हाउस को थी उसने एक बार साफ कह दिया कि किताब अभी छपी ही नहीं , डिफेंस मिनिस्ट्री के पास विचारार्थ है । 
हालांकि बाद में पब्लिशर हाथ मलता भी दिखाई दिया । तो राहुल गांधी ! आपने तो संसद में और संसद के बाहर पढ़ दी किताब । बताइए कहाँ से आई आपके पास । क्या हवाला से ? समय आ गया है कि अब पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल नरवणे ही मीडिया के बीच आएं अथवा अपना वीडियो बयान जारी करें । 

डिफेंस से जुड़े विषयों पर पहले भी किताबें लिखी गई हैं । लेकिन उनमें से कोई किताब संसद में लाकर इस तरह विवादास्पद बनाई गई हो तो हमें याद नहीं । हां राजीव गांधी जब 414 सीटें लेकर प्रधानमंत्री बने तब बोफोर्स कांड ने उन्हें डुबो दिया था । 

हम सेना को संसद अथवा संसद के बाहर लाकर जबरन घसीटने के सख्त ख़िलाफ़ हैं । राहुल गांधी को पता तो होगा पर इतनी तमीज नहीं कि संसद में सैन्य सवाल उठाना कितना गंभीर विषय है । 
लेकिन किसी भी तरह मोदी को नीचा दिखाऊं और उन्हें उतारकर पीएम की कुर्सी पर मैं खुद बैठ जाऊँ , इस सनक ने राहुल को यहां तक पहुँचा दिया है । 
जहां तक किताब में जनरल नरवणे को दिए गए प्रधानमंत्री के आदेश का सवाल है वह गोपनीय विषय है । थर्ड क्लास राजनीति करने वाले महाराजा के अलावा राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े ऐसे गंभीर विषय को भारत में कोई भी अन्य व्यक्ति कभी न उठाता । 
और हां , आपके जमाने तो सेना के हाथ बांध दिए जाते थे ।  

सबसे बड़ी बात नरवणे के पूछने पर पीएम नरेंद्र मोदी का इससे बढ़िया जवाब क्या हो सकता है कि उस हालात में सेना जो उचित समझे वह करे ?

सादर/सा

राहुल अब क्या जबाब देंगे?

थर्ड क्लास राजनीति करने वाले सनकी राहुल गांधी की अब अंतरराष्ट्रीय बेइज्जती होगी :-

पूर्व आर्मी चीफ जनरल नरवणे की किताब से जुड़ा मामला अब आगे बढ़ गया है । दिल्ली पुलिस ने इस किताब को ले एफआईआर दर्ज कर ली है । 
यह किताब अभी तक आधिकारिक रूप से प्रकाशित नहीं हुई है, और इसे अप्रकाशित किताब मानते हुए पुलिस ने स्पेशल सेल को जांच सौंपी है ।

यह मामला 2024 से शुरू होता है, जब जनरल नरवणे की संस्मरण किताब ‘फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी’ प्रकाशन के लिए तैयार थी । 
इस किताब में उनकी 40 साल की आर्मी सर्विस सेवा का ब्योरा है, जिसमें 1962 के बाद भारत-चीन के बीच गलवान घाटी में हुए सैन्य टकराव के साथ-साथ अग्निपथ योजना जैसे विवादास्पद मुद्दों पर जानकारी शामिल है । 

पेंग्विन रैंडम हाउस इंडिया ने किताब के प्री-ऑर्डर शुरू कर दिए थे, लेकिन रक्षा मंत्रालय (MoD) से जरूरी क्लियरेंस न मिलने के कारण प्रकाशन रुक गया । अब 2026 में भी किताब अप्रकाशित है ।

लेकिन सच बताएं तो बड़ा रहस्य उजागर करने और लम्बे समय से चली आ रही अपनी सनक को सच साबित करने के चक्कर में  राहुल गांधी इस मामले में बुरी तरह फंस गए हैं ।
वैसे तो उन्हें बढ़ चढ़कर बोलने और लगातार जुगाली करने के बाद माफ़ी मांगने की पुरानी आदत है । लेकिन जनरल नरवणे की किताब को लेकर उनकी अब अंतरराष्ट्रीय बेइज्जती होने वाली है । 
मोदी को जनरल नरवणे की किताब के जरिए घेरने की उनकी मंशा खुद उन्हीं के गले का फंदा बन सकती है । एक तरफ कानूनी कार्रवाई शुरू हो चुकी है और दूसरी तरफ उनके एलओपी पद के सामने भी संकट आ खड़ा हुआ है ।

जनरल साहब खुद कह चुके हैं कि उनकी किताब प्रकाशन हाउस में है , प्रकाशक ने क्लियरेंस के लिया रक्षा मंत्रालय भेजी है । 
अनुमति आने पर छपेगी किताब । तो राहुल गांधी के पास कवर फोटो सहित जो किताब है वह या तो किसी ने नरवणे के घर से चुराई या फिर पब्लिशिंग हाउस से ? 
या फिर किसी के लम्बे हाथ यदि बहुत लम्बे हुए तो पता लगाना होगा कि कहीं डिफेंस मिनिस्ट्री तक तो नहीं जा पहुँचे ? खैर , एफआईआर हो चुकी और पुलिस ने जाँच शुरू कर दी । 

तो एब्रॉड आई या एमेजॉन से आई , खुलासा तो होगा ही । एमेजॉन कोई प्रकाशन संस्थान नहीं केवल विक्रेता है । बताना उसे भी पड़ेगा कि उसके पास किस पब्लिशर से आई किताब ? 

जनरल नरवणे में जिस पेंगुइन हाउस को थी उसने एक बार साफ कह दिया कि किताब अभी छपी ही नहीं , डिफेंस मिनिस्ट्री के पास विचारार्थ है । 
हालांकि बाद में पब्लिशर हाथ मलता भी दिखाई दिया । तो राहुल गांधी ! आपने तो संसद में और संसद के बाहर पढ़ दी किताब । बताइए कहाँ से आई आपके पास । क्या हवाला से ? समय आ गया है कि अब पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल नरवणे ही मीडिया के बीच आएं अथवा अपना वीडियो बयान जारी करें । 

डिफेंस से जुड़े विषयों पर पहले भी किताबें लिखी गई हैं । लेकिन उनमें से कोई किताब संसद में लाकर इस तरह विवादास्पद बनाई गई हो तो हमें याद नहीं । हां राजीव गांधी जब 414 सीटें लेकर प्रधानमंत्री बने तब बोफोर्स कांड ने उन्हें डुबो दिया था । 

हम सेना को संसद अथवा संसद के बाहर लाकर जबरन घसीटने के सख्त ख़िलाफ़ हैं । राहुल गांधी को पता तो होगा पर इतनी तमीज नहीं कि संसद में सैन्य सवाल उठाना कितना गंभीर विषय है । 
लेकिन किसी भी तरह मोदी को नीचा दिखाऊं और उन्हें उतारकर पीएम की कुर्सी पर मैं खुद बैठ जाऊँ , इस सनक ने राहुल को यहां तक पहुँचा दिया है । 
जहां तक किताब में जनरल नरवणे को दिए गए प्रधानमंत्री के आदेश का सवाल है वह गोपनीय विषय है । थर्ड क्लास राजनीति करने वाले महाराजा के अलावा राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े ऐसे गंभीर विषय को भारत में कोई भी अन्य व्यक्ति कभी न उठाता । 
और हां , आपके जमाने तो सेना के हाथ बांध दिए जाते थे ।  

सबसे बड़ी बात नरवणे के पूछने पर पीएम नरेंद्र मोदी का इससे बढ़िया जवाब क्या हो सकता है कि उस हालात में सेना जो उचित समझे वह करे ?

सादर/सा

मंगलवार, 10 फ़रवरी 2026

विचारणीय योग्य

Riyajeet Rathod के 'अध्यात्मिक सत्संग' ग्रुप से अग्रसारित

इस पृथ्वी पर अनंत कालचक्र हुए हैं, प्रत्येक काल में 6+6 युग (era) होते हैं।
पहले 6 युगो का कालचक्र उत्सर्पिणी( ascending) और दुसरे 6 युगो का कालचक्र अवसर्पिणी (descending) कालचक्र कहलाता है।
अभी वर्तमान में अवसर्पिणी काल का 5वा युग(era) चल रहा है।
अवसर्पिणी काल के पहले 3 युग (era) और उत्सर्पिणी के अंतिम 3 युग (era) "युगलिककाल" कहलाते हैं और उस समय की धरती को "भोगभुमि" कहा जाता है जिसे पश्चिमी धर्मों में garden of Eden(आदम बाग) माना गया है।
  उस युगलिककाल में पति-पत्नी जोड़े के रूप में(युगल) पैदा होते हैं,
  और 10 प्रकार के पेड़ होते हैं जिन्हें इच्छा वृक्ष (कल्पवृक्ष) कहा जाता है,शास्त्रों में यह भी लिखा है कि एक कल्प समय तक आयु होने से इन्हें कल्पवृक्ष कहा जाता है।
 ये युगल लोग उन पेड़ों के फलों को खाकर जीते हैं,और इन कल्पवृक्षों से इनकी सभी जरूरते भी पुरी हो जाती है।
  उन्हें किसी भी प्रकार के काम करने की ज़रूरत नहीं होती है, जैसे व्यवसाय आदि करके जीविकोपार्जन करना,खाना बनाना आदि,
उनकेे शरीर की शक्ति,ऊंचाई,आयु लाखों वर्षों की होती है,सम्पुर्ण जीवन उनका सुखमय ही होता है।(वास्तव में अवसर्पिणीकाल के कुल 6 युगों में शरीर की शक्ति,ऊंचाई,आयु घटते क्रम में होती है जिस कारण इस कालचक्र को अवसर्पिणी(descending)काल कहा जाता है।)
युगलिक काल में पुरुष और स्त्री जोड़े के रूप में ही पैदा होते हैं,आजीवन ब्रह्मचारी की तरह ही रहते हैं, मात्र उनकी आयु के कुछ ही वर्ष शेष रहने पर स्त्री ऋतुवती होती है फिर तीव्र मोहकर्म के उदय होने के कारण संभोग कर अनुवांशिक गुणों के कारण अपनी ही तरह नये युगल को जन्म देते हैं। मात्र 6 महिने ही उनका लालन-पालन कर वे मरकर स्वर्ग में जन्म प्राप्त करते हैं।
इस युगलिक काल के वक्त "ना धर्म था, ना अधर्म" इसलिए कोई भी दीक्षा लेकर साधना कर मोक्ष भी प्राप्त नहीं कर सकता था।(युगलिक काल में धर्म ना होने के कारण सनातन धर्म की शुरुआत ऋषभदेव द्वारा धर्म की स्थापना के बाद ही मानी जानी चाहिए)
 लेकिन युगलिक काल के लोगों का आचरण अच्छा होने से जब भी वे मरते हैं तो वे निश्चित रूप से स्वर्ग को ही प्राप्त करते हैं ,
इसलिए पश्चिमी धर्मों में इस भोगभूमि को स्वर्ग मान लिया गया।
यह युगलिककाल की अवधि पूरे 9 कोड़ाकोडी सागरोपम अथार्त हमारे लिए असंख्य वर्षो के समय की होती है।
युगलिककाल में राज्य व्यवस्था नही होती, मात्र मनु (कुलकर) व्यवस्था ही होती है।
उनके मुखिया को कुलकर(मनु) बुलाया जाता था, मुखिया मनु कहलाने के कारण ही मानव, मनुष्य,human आदि शब्दों का उद्भव हुआ।
वैदिक और जैन दोनों ही धर्मों अनुसार कुल 14 कुलकर (मनु) थे और जिनमें अंतिम मनु (कुलकर) "नाभि" ही थे। जिनके नाम पर से प्राचीन भारत का एक नाम "अजनाभवर्ष" भी है जो भागवतपुराण जैसे कई शास्त्रों में मिलता है।
जब यह युगलिक काल समाप्त होने जा रहा था, तब कल्पवृक्षों का प्रभाव धीमा हो गया था, जिससे सभी युगलिक लोग परेशान हो गए थे, तब वे अपने कुलकर नाभि के पास गये।
तब नाभि मनु ने युगलिको की समस्या का निवारण करने के लिए अपने बेटे ऋषभ को विश्व में प्रथम राजा घोषित किया,
तब स्वर्गलोक के अधिपति इंद्रदेव ने आकर उन्हें वस्त्रालंकारो और मुकुट से सुसज्जित कर उनका राज्याभिषेक किया। प्रजा का पालन करने और विशेष अणु होने के कारण उनका यह मुकुट सहित सुसज्जित रुप "विष्णु" कहलाया।
ऋषभदेव को जन्म से ही मति,श्रुत और अवधि ये तीन ज्ञान थे ,वास्तव में सभी तीर्थंकरो को जन्म से ही ये तीन ज्ञान होते ही हैं।  
 ऋषभदेव ने राज्य व्यवस्था संचालन करने के लिए शूद्र,वैश्य और क्षत्रिय वर्ण परंपरा शुरु करी।(ब्राह्मण वर्ण बाद में उनके पुत्र भरत चक्रवर्ती ने शुरू किया था )
 ऋषभदेव ने स्त्रियो को 64 और पुरुषों को 72 कलाए सिखाई ,
जिनमें खेती करना, घुड़सवारी ,बर्तन बनाना,अस्त्र बनाना, पाककला, नृत्यकला , लिखना-पढना आदि सभी कलाए सम्मिलित है।
वर्णव्यवस्था की स्थापना का उद्देश्य था कि रोजगार का प्रशिक्षण कुल में ही निशुल्क प्राप्त हो जाए और सभी एक-दूसरे के सहयोगी बने रहे।
ऋषभदेव की जुड़वां पत्नी सुनंदा थी,
   लेकिन सुमंगला नाम की एक लड़की जिसे इसाई धर्म में eve और इस्लाम धर्म में हुव्वा कहा जाता है, उसका जुड़वां पति युगलिक काल का पतन होने से समय से पहले ही मर गया था।वह विरह वेदना मे अत्यंत व्याकुल हो गई थी ,उस लड़की के दुःख को दूर करने के लिए नाभि ने अपने पुत्र ऋषभदेव के साथ उसका विवाह करवाया था।
(पुराणों में इस विवाह का जिक्र ब्रह्मा और गायत्री के विवाह के रुप में मिलता है, युगल पत्नी सुनंदा को पहले से ही विवाहित पत्नी सावित्री माना है)
और इसी विवाह को इस्लाम मजहब में आदिम और हुव्वा और ईसाई धर्म में Adam and Eve का विवाह कहा जाता है।
यह दुनिया में पहला विवाह था, स्वर्ग के सभी देवी-देवता (फ़रिश्ते /angels) उस विवाह में शामिल हुए थे।
   ये ऋषभदेव जैन धर्म के पहले तीर्थंकर आदिनाथ है।
जिन्हें वेदो में प्रजापति(प्रजा का पालन करने वाला सर्वप्रथम राजा) माना जाता है। प्रजापति की दुहिता का अर्थ वे सभी नगरिया थी जिन पर ऋषभदेव का शासन था जैसे विनीता आदि।
ऋग्वेद में १२९ ऋचाए में ऋषभ और 12 ऋचाओं में वृषभरूप में इनका संदर्भ देखने को मिलता है। वेदों में रूद्र(शिव) को ऋषभदेव का प्राय: ही मानकर कृतिवसनधारी(वस्त्र का टुकड़ा पहनने वाला,दिगंबर,केशीन्(जटाधारी)आदि कहा है,क्योकि सभी तीर्थंकर पांच मुट्ठी से केशलोच करते हैं मात्र ऋषभदेव ने ही 4 मुट्ठी से केशलोच कर पीछे जटा छोड़ दी थी। ऋषभदेव को वेदों में नग्न होने से शिश्नदेवा भी कहा है जिसकारण से लिंगपुजा का प्रचलन शुरू हुआ।
ब्रह्मज्ञान अथार्त आत्मा का सम्पुर्ण केवलज्ञान प्राप्त होने पर तीर्थंकर समोवसरण में बैठकर चारों दिशाओं में चार प्रतिबिंब से ब्रह्मज्ञान का उपदेश देते हैं, जिसकारण ऋषभदेव चार मुखो वालें ब्रह्मा कहलाये।
ऋषभदेव को ही पुराणों में ब्रह्मा, विष्णु, महेश माना जाता हैं।
और बौद्ध धर्म मे प्रथम बुद्ध आदिबुद्ध माना जाता हैं।
आदि का अर्थ सर्वप्राचीन होने से ऋषभदेव जैन धर्म में पहले तीर्थंकर आदिनाथ कहलाये।
इन्हें ही ईसाई धर्म में एडम माना जाता है। 
 यहूदी धर्म और इस्लाम धर्म में उन्हें पहला पैगंबर आदिम बाबा माना जाता है।
अरब में वे मानते हैं कि अल्लाह ने पहले आदिम को बनाया और फिर स्वर्ग से हिंद प्रदेश (हिंदुस्तान) में भेज दिया।
Forbidden एप्पल का पेड़ वास्तव में कल्पवृक्ष है। आदिनाथ का ही उच्चारण  आदिम हो गया, "आदमी" शब्द का उद्भव आदिम से ही हुआ है।
ऋषभदेव जब ग्रहवस्था में थे तब ऋषभदेव के 100 जुड़वां बेटे और दो बेटियां थी।
जुड़वां युग में पति और पत्नी जुड़वां पैदा होते थे
  इस प्रथा को बदलने के लिए, आदिनाथ ने अपने बेटे भरत(काबिल/Cein) का विवाह बेटी ब्राह्मी(Layudha)के साथ निश्चित किया, जो बाहुबलि(हाबिल/Abel) की जुड़वां थी।
और
 बाहुबली (हाबील/Abel) का विवाह सुंदरी के साथ तय किया ,जो भरत के साथ पैदा हुई थी,अतिसुंदरी होने से उसका नाम सुंदरी(Iqlimiya) था।ये सभी नाम यहुदी,इसाई और इस्लाम मजहब में मिलते है।
 आदिम/एडम/आदिनाथ को ही विश्व में पहला दार्शनिक माना जाता है, राजदरबार में नर्तकी नीलांजना की अचानक मृत्यु होने पर उन्हें अपने क्षणभंगुर मानव देह पर विचार कर वैराग्य उत्पन्न हुआ।और उन्होंने सन्यासी बनने का निश्चय किया ।
उन्होंने अपने बेटों के बीच अपने राज्य को विभाजित करके संन्यास ग्रहण किया, और वे दुनिया के पहले तपस्वी बन गए।
उन्होंने किसी भी धर्म की स्थापना नहीं की बल्कि उन्होंने "धर्म" की स्थापना की।
 विश्व के आदि(प्रथम) तीर्थंकर होने के कारण वे आदिनाथ कहलाए।
भारतीय ऋषि शब्द भी ऋषभदेव से ही पड़ा है, कई सभ्यताओं में इनका नाम वृषभ या बुल गॉड के रूप में भी मिलता है, क्योंकि ऋषभ का शब्द का अर्थ बैल होता है, और उनका चिन्ह भी बैल ही था। जिस कारण आदिनाथ को वृषभनाथ भी कहा जाता है, वृषभ चिह्न को पुराणों में नंदी बैल कहा गया है। सिंधु सभ्यता में जो बैल के मुंह वाले देव की मूर्ति मिलती है यह वास्तव में ऋषभदेव ही है।
दीक्षा के पश्चात 400 दिन तक ऋषभदेव को भूखा रहना पड़ा,क्योकि विश्व के पहले सन्यासी वे ही थे इसलिए प्रजा को भिक्षा में क्या देना यह पता नहीं था इसीलिए वे हीरे,मोती,माणिक,हाथी,घोड़े आदि उनके राजा को भेंट करते थे।
 लेकिन 400 दिन के बाद श्रेयांश कुमार ने आदिनाथ को इक्षु (गन्ना) के रस से उपवास का पारणा करवाया जिसके कारण वह दिन इतिहास में "अक्षयतृतीया" पर्व नाम से प्रसिद्ध हुआ। जो पर्व सम्पुर्ण भारत में प्राचीनकाल से हिंदू और जैन दोनों ही धर्मों द्वारा मनाया जा रहा है।ईक्षुरस से पारणा करवाने के कारण ऋषभदेव का वंश "इश्वांकु वंश" कहलाया। हिंदू और जैन दोनों ही धर्मों में इश्वांकु वंश को प्राचीनतम वंश माना है।
ऋषभदेव के साथ प्रेमवश अन्य राजाओं ने भी उनके साथ सन्यास ग्रहण किया था, लेकिन वे ऋषभदेव की तरह 400 दिन तक भूख-प्यास सहन नहीं कर पाये,जिस कारण वे स्वयं ही फल आदि तोडकर सन्यासी ऋषि बनकर रहने लगे।
तभी से सनातन धर्म की दो परंपरा शुरू हुई,
1-निर्ग्रंथ,आर्हत,श्रमण,जैन मुनि परंपरा
2-वैदिक,ब्राहत ऋषि परंपरा
उधर राज्य में ऋषभदेव का पुत्र भरत चक्रवर्ती(Cain/काबिल)  महत्वाकांक्षी था, उसने अपने भाइयों के राज्यों को भी अपने राज्य में शामिल होने के लिए कहा।
  जब अन्य सभी 98 पुत्रों ने अपने पिता ऋषभदेव से पूछा तब ऋषभदेव ने कहा कि बाहर के शत्रुओं पर विजय नहीं लेकिन स्वयं के ही अंदर अपनी आत्मा के शत्रु लोभ,क्रोध,अहंकार,मोह आदि पर विजय प्राप्त करनी चाहिए।
  और यह सुनकर सभी पुत्र भी संन्यासी बन गए।
जब बाहुबली(हाबिल) ने भरत(काबिल) को राज्य देने से इंकार कर दिया, तो दोनों बेटों के बीच मल्लयुद्ध हुआ जिसमें जब  भरत(काबिल) को मारने के लिए बाहुबलि (हाबिल) ने अपनी मुट्ठी उठाई तो युद्ध भूमि में ही उसे पछतावा हुआ कि वह मात्र राज्य के लिए अपने भाई को मारने चला है और उसी उठाई मुट्ठी से उसने अपने बालों को खींच कर मुंडन कर संन्यासी बन गया,और युद्ध भूमि में वही खड़े खड़े ध्यान में लीन हो गया,
 बाहुबली की प्रतिमा गोमतेश्वर बाहुबली के नाम से दक्षिण में पूजी जाती है,जो एक ही पहाड़ में से निकली हुई विश्व की सबसे बड़ी प्रतिमा है।
ब्राह्मी(Layudha) जो कि बाहुबलि के साथ पैदा हुई थी, वह भी दीक्षा लेकर साध्वी बन गई थी, यह वही ब्राह्मी है जिसे ऋषभदेव ने 18 लिपियों में लिखना सिखाया था, विश्व की प्राचीनतम लिपि ब्राह्मी उन्हीं के नाम से है।
 दुसरा बेटा भरत अपनी जुड़वां बहन "सुंदरी" से शादी करना चाहता था, जो बहुत खूबसूरत थी,
  लेकिन सुंदरी भी ब्राह्मी की तरह साध्वी बनना चाहती थी इस कारण उसने कई सालों तक लगातार उपवास(आयंबिल तप) किये, ताकि उसका रूप फीका हो जाए और भरत चक्रवर्ती(काबिल) पर उसका आकर्षण कम हो जाए।  बाद में भरत चक्रवर्ती ने सुंदरी को साध्वी बनने की अनुमति दे दी थी।
आदिनाथ के पुत्र भरत चक्रवर्ती के नाम पर ही हमारे देश का नाम भारतवर्ष पड़ा है इसका प्रमाण भागवतपुराण,लिंगपुराण आदि कई शास्त्रों में मिलता है।
इन्हीं भरतचक्रवर्ती को पुराणों में शिवपुत्र कार्तिकेय और दक्षिण में मुरूगन देव के नाम से भी पूजा जाता है।
लेकिन यहुदियों की किताब इंजिल और इस्लाम की किताब कुरान में कहा गया है कि काबिल(भरत चक्रवर्ती) और हाबिल(बाहुबलि) के बीच जो युद्ध हुआ था वह सुंदरी(Iqlimiya) के लिए था।जिसमें काबिल ने हाबिल को मार डाला और उसे जमीन में दफन कर दिया,
उनकी किताबें ये नही बताती कि जब हाबिल को मारा जा रहा था तब कोई भी फरिश्ता उस बेगुनाह हाबिल को बचाने क्यो नही आया,और काबिल का निकाह जब दोनों बहनों से ही नहीं हुआ तो फिर किससे हुआ? वास्तव में धरती पर उस समय सिर्फ आदिम,हुव्वा,हाबिल,काबिल और दोनों बहने ही नहीं थी बल्कि पूरी प्रजा मौजूद थी।पुरा देश मौजुद था।
 वास्तव में हाबिल (बाहुबलि) ने  सन्यास ग्रहण किया था और बाद में उन्हें आत्मज्ञान(कैवलज्ञान) और मुक्ति(मोक्ष) भी मिला था।
कुरान और बाइबल और यहुदियों की इंजिल में पहले नबी(पैगंबर) के बारे में जो लिखा गया है, वह जैन धर्म से लिया गया है।
   कुरान 1400 साल पहले लिखी गई थी, बाइबिल 2000 साल पहले लिखी गई थी,
   लेकिन इन दोनों में यहूदी धर्म जो 4000 वर्ष पुराना है उनकी किताबें इंजिल,तनख,तोरह मे से सुनी बाते लिखी गई है।
 जब इब्राहिम( यहूदी धर्म के संस्थापक) आध्यात्मिक ज्ञान की खोज में थे,
  तब एक जैन साधु जो पहाड़ पर ध्यान कर रहे थे, इब्राहीम उन जैन साधु से मिले, उस जैन साधु के द्वारा दिए गए उपदेशों को ही यहूदी धर्म में कमांडमेंट्स कहा जाता है।ये सभी कमांडमेंट्स मूलभूत रुप से जैनधर्म के मूल सिद्धांत ही है।
 स्वर्ग(जन्नत/heavan)और नरक(जहन्नुम/hell) का ज्ञान भी जैन धर्म से ही पश्चिमी धर्मो में आया है।
शैतान का कांसेप्ट भी जैन धर्म से ही निकला है वास्तव में स्वर्ग में जन्म लेने वाले देवों(फरिश्ते/angels)में से कुछ देव जिज्ञासा होने के कारण नरक में जाते हैं। नरक की जीवो को यातना और पीड़ा देते हैं ,जिसकारण उन्हें "परमाधामी देव" कहा जाता है इनके क्रुर स्वभाव के कारण ही इन्हें शैतान कहां गया है।
पश्चिमी धर्मों में भी यही माना है कि शैतान भी जन्नत में जन्मा एक देव(फरिश्ता)ही था जिसे अल्लाह ने अपनी तारिफ ना करने के कारण जन्नत से बाहर निकाल दिया था।
जैन धर्म का पुर्वजन्म का सिद्धांत भी वैदिक और बौद्ध धर्म के साथ यहुदी धर्म द्वारा भी स्वीकारा गया है।
जो एक सृष्टी रचयिता का कांसेप्ट है वह काल्पनिक है।
वास्तव में जैन धर्म में बहुत ही बारिकी से समझाया गया है कि किसप्रकार यह सम्पुर्ण सृष्टी अंनंत जीवो के,और प्रकति के संयोग से एक joint ventureके रुप में बनती हैं और टूटती है।
 परमात्मा एक नही अनंत है।
वेदों और जैन धर्म अनुसार आत्मा ही परमात्मा है(अहम् ब्रह्मास्मि) जो कि सभी कर्मों और दोषों से शुद्ध होकर सभी स्वर्गों से ऊपर मोक्ष में स्थान प्राप्त करती है,जिसे वेदों में वैंकुठ और पश्चिमी सभ्यता में (god)अल्लाह का निवास स्थान(above all heavens) कहा है।
हमारी आने वाली पीढ़ी को यदि  संपूर्ण विश्व में शांति और एकता के साथ जीना है तो दो ही मूल मंत्र याद रखने होंगे। 
1-आत्मा ही ब्रह्म है।
2- अहिंसा ही परम धर्म है।।

रविवार, 8 फ़रवरी 2026

गाँधी परिवार की फ़जियत

राहुल गांधी जिस बिना छपी किताब को लेकर संसद में घूमते दिखे, वह असल में कोई शोधग्रंथ नहीं बल्कि आरोपों, चयनित उद्धरणों और अधूरी सूचनाओं का पुलिंदा था निशिकांत दुबे ने संसद के भीतर कांग्रेस को जिस तरह घेरा, वह सिर्फ एक पलटवार नहीं था, बल्कि गांधी परिवार के लंबे राजनीतिक इतिहास पर खड़े होते सवालों की एक पूरी श्रृंखला थी दुबे ने यह स्पष्ट किया कि अगर आरोपों के आधार पर राजनीति करनी है, तो फिर गांधी से लेकर राहुल तक की पूरी विरासत को भी उसी कसौटी पर रखा जाएगा...!!

महात्मा गांधी के नाम से शुरू होकर कांग्रेस अक्सर नैतिकता का दावा करती है, लेकिन आज़ादी के बाद सत्ता में आई कांग्रेस सरकारों के फैसलों पर दर्जनों किताबें सवाल उठाती रही हैं आरसी मजूमदार जैसे इतिहासकारों ने आज़ादी के विभाजन और उसके बाद की नीतियों पर गंभीर आलोचनाएँ लिखीं कश्मीर मुद्दे को संयुक्त राष्ट्र ले जाने का निर्णय, पीओके का स्थायी हो जाना, और युद्धविराम ये सब ऐसे फैसले हैं जिन पर The Story of Kashmir और India Wins Freedom जैसी पुस्तकों में तीखी बहस मिलती है यह कोई भाजपा का नैरेटिव नहीं, बल्कि कांग्रेस-कालीन दस्तावेज़ों और स्वयं कांग्रेस नेताओं के लिखे संस्मरण हैं...!!

नेहरू युग पर एल्फ़्रेड डेविड, शौर्य दोवल और जदुनाथ सरकार जैसे लेखकों ने विदेश नीति, चीन नीति और रक्षा तैयारियों की भारी चूक का उल्लेख किया है 1962 की पराजय पर Himalayan Blunder जैसी किताबें बताती हैं कि आदर्शवाद के नाम पर देश की सुरक्षा के साथ कैसा समझौता हुआ। इंदिरा गांधी के दौर पर आएं तो The Emergency और Indira Gandhi: A Life in Nature जैसी पुस्तकों में आपातकाल के दौरान प्रेस की आज़ादी कुचलने, विपक्ष को जेल में डालने और संविधान की आत्मा से खिलवाड़ का विस्तृत वर्णन है यह सब आरोप नहीं, बल्कि उस दौर के सरकारी आदेश, अदालती टिप्पणियाँ और पत्रकारों की प्रत्यक्ष गवाही हैं...!!

राजीव गांधी के समय बोफोर्स घोटाला सिर्फ एक राजनीतिक नारा नहीं रहा Boforsgate और The Politician जैसी किताबों में स्वीडन से आए दस्तावेज़, बैंक ट्रेल्स और जांच रिपोर्टों का उल्लेख मिलता है कोर्ट के फैसले भले तकनीकी आधार पर आए हों, लेकिन नैतिक सवाल आज भी जिंदा हैं इसके बाद पी.वी. नरसिम्हा राव के काल में कांग्रेस ने सुधारों का श्रेय लिया, पर उसी दौर में जैन हवाला जैसे मामलों ने पार्टी की आंतरिक सड़ांध भी उजागर की, जिस पर The Scam जैसी पुस्तकों में विस्तार है...!!

सोनिया गांधी के उदय के साथ कांग्रेस एक परिवार-केंद्रित संगठन बनती चली गई यह आरोप भी सिर्फ विरोधियों का नहीं The Accidental Prime Minister और The Insider जैसी किताबें बताती हैं कि मनमोहन सिंह जैसे प्रधानमंत्री की सीमाएँ कहाँ तक तय की जाती थीं और कैसे नीतिगत फैसलों पर पार्टी अध्यक्ष का प्रभाव निर्णायक था 2G, कोयला घोटाला, कॉमनवेल्थ गेम्स इन सब पर CAG रिपोर्टें, चार्जशीट्स और न्यायिक टिप्पणियाँ मौजूद हैं, जिनका उल्लेख 2G Spectrum Scam और Coalgate Files जैसी पुस्तकों में मिलता है...!!

और फिर आते हैं राहुल गांधी पर The Prince और The Rahul Gandhi Story जैसी किताबें उनके राजनीतिक प्रशिक्षण, विदेश यात्राओं, पार्टी के भीतर निर्णयहीनता और बार-बार की चुनावी विफलताओं का विश्लेषण करती हैं संसद में देशद्रोह, सेना, न्यायपालिका और चुनाव आयोग पर दिए गए बयानों को लेकर अदालतों की फटकार, माफी और नोटिस ये सब सार्वजनिक रिकॉर्ड का हिस्सा हैं भारत को डेड डेमोक्रेसी कहने जैसे बयान अंतरराष्ट्रीय मंचों पर दिए गए, जिन पर विदेश नीति विशेषज्ञों और पूर्व राजनयिकों ने भी सवाल उठाए हैं....!!

निशिकांत दुबे का हमला इसी पृष्ठभूमि में था उनका कहना साफ था अगर कांग्रेस आरोपों की किताबें लेकर बैठेगी, तो गांधी परिवार की पूरी कुंडली भी किताबों, दस्तावेज़ों और इतिहास से ही खोली जाएगी फर्क बस इतना है कि एक तरफ़ बिना छपी, बिना स्रोत वाली फाइलें हैं और दूसरी तरफ़ दशकों से प्रकाशित किताबें, सरकारी रिपोर्टें और अदालती रिकॉर्ड संसद में कांग्रेस का असहज होना इसीलिए स्वाभाविक था, क्योंकि सवाल किसी एक नेता पर नहीं, बल्कि उस राजनीतिक विरासत पर था जिसने नैतिकता का ठेका लेकर सत्ता का सबसे लंबा दौर देखा और हर मोड़ पर विवादों की छाया भी...!!

फ़िरोज़ गाँधी की दास्तान

एक दो दिन से *कांग्रेस के मणिशंकर अय्यर* बहुत चर्चा में है, उन्होंने कांग्रेस प्रवक्ताओं को विशेषकर *पवन बखेड़ा* को *चमचा* कहा जैसा बाक़ी सभ...