गुरुवार, 26 फ़रवरी 2026

जतीन्द्र नाथ मुखर्जी / बाघा जतिन

उस दिन अगर वो गद्दारी न हुई होती... तो 1915 में ही हम आज़ाद हो गए होते और 'राष्ट्रपिता' ये व्यक्ति होता 👇!"
खून खौल उठता है यह सोचकर कि जिस शेर ने अकेले दम पर रॉयल बंगाल टाइगर के जबड़े फाड़ दिए थे, उसे हम हिंदुस्तानियों ने ही अकेला छोड़ दिया। हम 1947 की आज़ादी की सालगिरह मनाते हैं, लेकिन उस 10 सितंबर 1915 की उस काली दोपहर को भूल गए, जब एक महानायक का सपना अपनों की ही मुखबिरी की भेंट चढ़ गया।
आज दिल बहुत भारी है यह सोचकर कि हमारे देश का इतिहास कितना अलग होता, अगर उस दिन अपनों ने ही पीठ में छुरा न घोंपा होता। हम 1947 की आजादी का जश्न मनाते हैं, लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि एक शख्स ऐसा भी था जिसने 1915 में ही भारत को आजाद कराने का पूरा ब्लूप्रिंट तैयार कर लिया था।
​मैं बात कर रहा हूँ जतीन्द्रनाथ मुखर्जी की, जिन्हें दुनिया 'बाघा जतिन' के नाम से जानती है।

​सोचिए, वो कैसा फौलादी इंसान रहा होगा जिसने बिना किसी बंदूक के, सिर्फ एक छोटी सी खुखरी से रॉयल बंगाल टाइगर को ढेर कर दिया था। लेकिन उनका असली मुकाबला उन 'सफेद भेड़ियों' से था जिन्होंने हमारी मां भारती को जकड़ रखा था। जतिन दा का एक ही मंत्र था "देश के लिए मरना सीखो, ताकि देश जी सके।"
​मुझे उनकी वो बातें आज भी झकझोर देती हैं
​साहस का वो मंजर जब अंग्रेजों ने गाड़ी की छत पर बैठकर भारतीय महिलाओं का अपमान किया, तो जतिन दा अकेले उन पर टूट पड़े और तब तक मारा जब तक कि अंग्रेज पैरों में नहीं गिर गए। उस दौर में, जहाँ लोग अंग्रेजों के साये से डरते थे, जतिन दा उन्हें बीच सड़क पर पीट दिया करते थे।
​विवेकानंद का वो प्रभाव जो स्वामी जी ने उन्हें सिखाया था कि लोहे की मांसपेशियों में ही वज्र जैसा संकल्प रहता है। और जतिन दा ने उसे जी कर दिखाया।
​गद्दारी की वो चोट जब उन्होंने जर्मनी से हथियार मंगाकर पूरे देश में एक साथ बगावत की योजना बनाई थी। चेक जासूस रॉस हेडविक ने खुद लिखा था कि अगर वह प्लान कामयाब हो जाता, तो आज राष्ट्रपिता बाघा जतिन होते। पर अफ़सोस, एक गद्दार की मुखबिरी ने हमें 32 साल और गुलामी की आग में झोंक दिया।
​10 सितंबर 1915 को जब उन्होंने अस्पताल में आखिरी सांस ली, तो उनका शरीर गोलियों से छलनी था, लेकिन चेहरे पर हार का गम नहीं, बल्कि भारत माता के प्रति समर्पण की चमक थी।आज समय है यह पूछने का कि क्या हमारी देशभक्ति सिर्फ 15 अगस्त और 26 जनवरी के स्टेटस तक सीमित है? बाघा जतिन और उनके साथियों ने जब बूढ़ी बालम की तट पर आखिरी गोलियां झेली थीं, तो उनके सामने कोई निजी स्वार्थ नहीं था। उन्हें पता था कि वह शाम उनकी आखिरी शाम है, फिर भी उन्होंने समर्पण के बजाय संघर्ष को चुना।
इतिहास गवाह है कि हम दुश्मनों से कभी नहीं हारे, हम तब-तब हारे जब घर के ही किसी भेदी ने दरवाज़ा खोल दिया। आज बाघा जतिन को सच्ची श्रद्धांजलि यह नहीं होगी कि हम उनकी तस्वीर पर फूल चढ़ाएं, बल्कि यह होगी कि:
हम अपने इतिहास के उन विस्मृत नायकों (Forgotten Heroes) को पहचानें।
राष्ट्रहित को व्यक्तिगत लाभ से ऊपर रखें, ताकि फिर कभी कोई 'मुखबिरी' किसी क्रांतिकारी के सपने को न कुचल सके।
अपनी आने वाली पीढ़ियों को बताएं कि आज़ादी केवल अहिंसा के चरखे से नहीं, बल्कि जतिन दा जैसे शेरों के लहू से भी सींची गई है।
याद रखिये, जो राष्ट्र अपने बलिदानियों को भूल जाता है, उसका भूगोल बदल जाता है। जतिन दा का शरीर उस दिन गोलियों से छलनी हुआ था, लेकिन उनकी रूह आज भी हर उस हिंदुस्तानी में ज़िंदा है जो अन्याय के खिलाफ खड़ा होने का हौसला रखता है।
उठो! और अपने अंदर के उस 'बाघा' को जगाओ, जो देश के लिए मरने से पहले, देश के लिए जीना जानता हो।"
​आज जब हम आजादी की खुली हवा में सांस लेते हैं, तो एक पल के लिए रुक कर सोचिएगा जरूर... क्या हम उन बलिदानों के लायक बन पाए हैं? जतिन दा जैसे नायक इतिहास की किताबों के किसी कोने में खो गए हैं, लेकिन हमारे दिलों में उनकी मशाल जलती रहनी चाहिए।
​बाघा जतिन जैसे महान क्रांतिकारी के चरणों में मेरा कोटि-कोटि नमन।

बुधवार, 25 फ़रवरी 2026

राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह

दोस्तों ज्ञानी जैल सिंह भारत के पूर्व राष्ट्रपति थे और उन्हें 
Z ±security मिली थी और अब उन्होंने दिल्ली में घोषणा कर दी की कल मैं चंडीगढ़ पहुंचने पर बोफोर्स धोटाले के सारे राज खोलने वाला हूं,,,,,,

 तो हुआ ये की दिल्ली-चंडीगढ़ मार्ग पर सामने से एक ट्रक आया और दनदनाता हुआ ज्ञानी जैलसिंह की कार को कुचल हुए आगे निकल गया और उनका वहीं रामनाम सत्य हो गया,,,,,,
और उस दुर्घटना की कोई जांच नहीं हुई,,,,,

दोस्तों एक बार राजेश पायलट ने कांग्रेस नेत्री की सलाह को ना मानते हुए एक घोषणा कर दी की कल मैं कांग्रेस अध्यक्ष पद हेतु नामांकन भरूँगा,,,,,

बस फिर क्या था, सामने से एक बस आई और उनकी कार को लपेटती हुई चली गई और उनका वही रामनाम सत्य हो गया,,,,,

श्रीमन्त माधवराव शिन्दे (सिंधिया) को तो आप लोग जानते ही होंगे लोकसभा चुनाव के पहले कांग्रेस के सबसे लोकप्रिय वा कर्मठ नेता थे और वो लोकसभा के लिए लगातार 9वीं बार चुने गए थे तथा लोकसभा में विपक्ष के नेता भी थे,,,,,,

कांग्रेस राजमाता ने उत्तर प्रदेश के कांग्रेस अध्यक्ष को कहा की मैं प्रचार करने आ रही हूँ लेकिन प्रदेश अध्यक्ष निर्भीक था उसने कहा आप मत आइए बल्कि माधवराव जी को भेज दीजिए,,,,,

यहां वो ही वोट दिलवा सकते हैं बस फिर क्या था माधवराव जी को आदेश आया की आप अपने निजी विमान से ना जाकर इस दूसरे विमान से जाएंगे,,,,,,,

उस समय एक चश्मदीद किसान ने भी बयान दिया था विमान में पहले बम विस्फोट हुआ उसके बाद आग लगी और विमान में सवार आठों लोगों का रामनाम सत्य हो गया,,,,,,,

लेकिन इसकी कोई जांच नही हुई और थोड़े समय के बाद कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष भी रामनाम सत्य हुए पाए गए,,,,,

और क्रमशः इसी तरह से 1965 की लड़ाई के विजेता प्रधानमंत्री श्री लाल बहादुर शास्त्री जी,,डॉ होमी जहांगीर भाभा के साथ करीब 2500 से भी ज्यादा इसरो और डीआरडीओ के वैज्ञानिक और टॉप इंजीनियरों का भी बहुत ही संदेहपूर्ण स्थिति में रामनाम सत्य हो गया,,,,,जिसकी भी कोई जांच तक नही की गई,,,,

राजीव गांधी ने अपने जीवन काल मे टोटल 181 रैलिया की थीं और जिसमें से 180 रैलियों मे सोनिया गांधी भी उसके साथ थी बस उस 181वीं रैली मे वो राजीव गांधी के साथ नही थी,,,,
और उसी रैली मे उनका रामनाम सत्य हो गया,,,,,, 

 राजीव गांधी की हत्या के समय वहां मौजूद 14 अन्य लोगों की भी मौत हुई थी मगर सबसे खास बात ये हुई की उन 14 मरने वालों मे एक भी कोंग्रेसी नेता नहीं था मतलब जो भी मरे वो आम लोग ही थे,,,, 

ऐसा कैसे हो सकता है की प्रधानमंत्री रैली कर रहा हो और पार्टी का अन्य कोई नेता वहां मौजूद ना हो,,,,,,,

राजीव गांधी के साथ बड़ा या छोटा कोई कांग्रेसी नेता नहीं मरा और ना ही सोनिया गांधी जो की हर सभा में राजीव गांधी जी के साथ रहतीं थीं और उस दिन होटल में सरदर्द के कारण रुक गईं थी 

अब ये संयोग हो सकता है लेकिन बात कुछ हजम नही होती,,,,,

और बाद में जब स्वयं प्रियंका गांधी ने अपने पिता राजीव के कातिल को कोर्ट में माफ करने की अपील कर दी थी,,,,
तब से बात और नही हजम हो रही,,,,,,

अब ये समझ लीजिए की जब से चमचों की राजमाता इस परिवार की बहू बनकर आई हैं तब से आज तक गांधी परिवार के एक भी सदस्य को प्राकृतिक मृत्यु का सौभाग्य प्राप्त नहीं हुआ है,,,,,

इंदिरा गांधी के पुत्र संजय गांधी के ससुर कर्नल आनंद अपने ही फार्म हाउस के पास थोड़ी दूरी पर गोली लगने से मरे पाये गये थे,,

और संजय गांधी,,, बताओ हवाई जहाज से नीचे गिर गये और उनका रामनाम सत्य हो गया,,,,,,

अब इंदिरा गांधी का कैसे रामनाम सत्य हुआ वो तो सब जानते ही हैं,,,,

प्रियंका गांधी के ससुर राजेन्द्र वाड्रा दिल्ली के एक गेस्ट हाउस मे पाये गये उनका रामनाम सत्य हो गया था,,तथा ननद का जयपुर दिल्ली हाइवे में कार दुर्घटना में रामनाम सत्य हो गया और देवर मुरादाबाद के एक होटल में रामनाम सत्य हुआ पाया जाता है,,,,,

राजेश पायलट एक सड़क दुर्घटना में लपेट दिया जाता है और माधवराव सिंधिया जहाज दुर्घटना में लपेट दिए जाते है,,,,,,

अब इन सब बातों मे जो सबसे खास बात है वो ये है की जब संसद पर हमला होता है तो मां बेटे दोनो अनुपस्थित थे मतलब राहुल जी और सोनिया जी दोनो ने एक साथ छुट्टी मार दी और संसद मे नही गये,,,,,,,
अब मेरा कहने का मतलब ये कतई नही है की ये सब कांड किसी साजिश तहत हुए,,,, लेकिन बहुत गजब के संयोग बने थे,,,,,,

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राजीव गाँधी?

राजीव गांधी को भूल कर भी मत भूलिएगा

भगवान का शुक्र है कि उस दौर में सोशल मीडिया नहीं था नहीं तो राहुल गांधी से भी बड़े थे राजीव गांधी।

आज कुछ किस्से मै आपको बताने जा रहा हूं जिसे पढ़कर आप दंग रह जाएंगे कि राजीव गांधी जैसे लोग भी इतने बड़े देश के प्रधानमंत्री बन गए!!!

राजीव गांधी के पास सिर्फ एक ही योग्यता थी कि वो फिरोज गांधी के बेटे थे... और उससे भी ज्यादा जरूरी... वो पंडित नेहरू के नाती थे।

राजीव गांधी पढ़ाई लिखाई में फिसड्डी थे। 5 Star Doon School से स्कूलिंग के बाद 1961 में उन्हें इंजियनीरिंग पढ़ने लन्दन के ट्रिनिटी कॉलेज कैब्रिज भेजा गया।

यहीं पर राजीव से एडवीज अंतोनियो अल्बिना माइनो जिन्हें आज हम सोनिया गांधी के नाम से जानते हैं के सम्पर्क में आये।

1965 तक वो Antonio Mayno के प्यार में डूबे रहे और निरंतर फेल होते रहे और पास नहीं हो सके जिसके बाद कॉलेज ने राजीव को निकाल दिया।

फिर राजीव ने 1966 में लन्दन स्थित इम्पीरियल कॉलेज में मैकेनिकल इंजीनियरिंग में दाखिला लिया, किन्तु वहां भी फेल हुए।

उसी वर्ष राजीव की मां इंदिरा प्रधानमंत्री बनी और राजीव भारत आ गए, 1966 में दिल्ली फ्लाइंग क्लब ज्वाइन किया और प्लेन उड़ाना सीखने लगे।

अब 1970 में प्रधानमंत्री इंदिरा ने जुगाड़ लगवा कर राजीव को सरकारी एयरलाइंस एयर इंडिया में कमर्शियल पायलट के तौर पर नौकरी में लगवा दिया।

1971 में भारत पाक युद्ध हुआ भारतीय सेना व् वायु सेना को लाजिस्टिक स्पोर्ट के लिए पायलट्स की आवश्यकता थी और एयर इंडिया के कमर्शियल पायलट्स को रसद एवं हथियार एयर ड्राप करने हेतु बुलाया गया।

सारे के सारे पायलट्स तुरन्त युद्ध क्षेत्र में सेवाएं देने को आ गये सिवाय एक के और वो राजीव गांधी थे जो डर के मारे सोनिया गांधी संग दिल्ली में इटली के दूतावास में जा छिपे थे।

1980 में संजय गांधी की मृत्यु के बाद राजीव राजनीती में आये।

1984 में इंदिरा गांधी को उनके अंगरक्षकों ने दोपहर में गोली मार दी। राजीव गांधी ने मां की मृत्यु के शोक संताप में समय लगाने के बजाय उसी दिन शाम को भारत के प्रधानमंत्री की कुर्सी पर अपनी तशरीफ़ रख दी।

और कांग्रेसियों को सिखों का नरसंहार करने का आदेश दे डाला, कांग्रेसियों ने स्कूलों के रजिस्टरों और वोटर लिस्ट निकाल निकाल कर सिखों के घर खोजे और घरों में घुसकर हजारों सिखों को काटा। सिख महिलाओं से दुष्कर्म किया।

कई गर्भवती महिलाओं को जीवित ही जला दिया।

सिखों को और उनके बच्चो को, उनकी सम्पत्तियों को फूंकने हेतु कांग्रेस नेताओं के पेट्रोल पंपों से पेट्रोल सप्पलाई किया गया। सड़क चलते सिखों के गले में टायर डालकर जला दिया गया।

यहाँ तक कि तत्कालीन राष्ट्रपति जैल सिंह को भी नहीं बख्शा गया और जब वो गाड़ी में थे तो उनपर भी कांग्रेसियों ने हमला किया। गाड़ी के कांच तोड़ दिए गए।

दिल्ली में कांग्रेसियों का हिंसा का तांडव शुरू हुआ और शीघ्र ही ये देश के कोने कोने में फ़ैल गया।

और राजीव गांधी ने इंदिरा की मृत्यु का बदला देश भर में हजारों निर्दोष सिखों को मौत के घाट उतरवाकर लिया।

और बाद में राजीव गांधी ने उसे “बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती हिलती है” वाला ब्यान देकर उसे न्यायोचित ठहरा दिया।

खैर अगले चुनाव हुए और जनता ने राजीव द्वारा करवाये सिख नरसंहार को महत्व दिए बिना राजीव को इंदिरा की सहानुभूति के नाम पर 411 सीटें देकर असीम शक्ति दे दी..

और राजीव ने निरंकुश होकर उस बहुमत का दुरूपयोग किया,

1985 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा शाहबानो को न्याय देकर मुस्लिम महिलाओं के लिए तीन तलाक से बचने और गुजारे भत्ते का जो मार्ग खोला था उसपर आतातायी राजीव ने अपनी अक्ल पर पड़ा बड़ा वाला भीमकाय पत्थर दे मारा।

और अपुर्व बहुमत का प्रयोग कर मुस्लिम तुष्टिकरण का नया अध्याय लिखा और सुप्रीम कोर्ट का निर्णय पलटकर मुस्लिम महिलाओं को पुनः गुलाम बना दिया।

भोपाल गैस कांड हुआ हजारों निर्दोष लोगों के हत्यारे यूनियन कार्बाइड के मालिक वारेन एंडरसन को राजीव ने अमेरिकी सरकार से सौदेबाजी कर सुरक्षित अमरीका भेज दिया।

राजीव में न वैश्विक कूटनीति की समझ थी, न सैन्य शक्ति के सदुपयोग की समझ थी। अतः अपने सीमित विवेक क्षमता से ग्रस्त राजीव गांधी ने श्रीलंका में LTTE से लड़ने भारतीय सेना जबर्दस्ती भेज दी। और इंडियन पीस कीपिंग फोर्सेस के 1400 सैनिक मरवाये और 3000 सैनिक घायल करवाये

हलांकि बाद में राजीव को थूककर चाटना पड़ा और सैनिकों को वापस बुलाना पड़ा। राजीव को अपनी उस गलती के कारण ही श्रीलंका दौरे पर श्रीलंकाई सैनिक द्वारा हमला किया गया था।

वो पहले व् एकमात्र प्रधानमंत्री बने जिन्हें विदेशी धरती पर विदेशी सैनिक द्वारा अपमानित होना पडा!

1989 में बोफोर्स का घोटाला खुला जिसमे पता चला की राजीव गांधी ने सोनिया के “करीबी” जिसे सोनिया अपने संग इटली से दहेज़ में लायी थी और जो सोनिया राजीव के घर में ही रहता था उस ओटावियो कवात्रोची के द्वारा बोफोर्स सौदे में राजीव ने दलाली खायी थी।

1991 में Schweizer Illustrierte नामक स्विस मैगज़ीन ने काले धन वाले उन लोगों के नाम का खुलासा किया जिनका अवैध धन स्विट्ज़रलैंड के बैंकों में जमा था।

और उसमें राजीव गांधी का भी नाम था। मैगज़ीन ने खुलासा किया कि राजीव गांधी के 2.5 बिलियन स्विस फ्रैंक स्विट्ज़रलैंड के बैंक के एक अकाउंट में जमा हैं

1992 में टाइम्स ऑफ़ इंडिया और द हिन्दू ने खबरें छापीं की राजीव गांधी को सोवियत ख़ुफ़िया एजेंसी KGB से निरंतर धन मिलता था। रूस ने इस खबर की पुष्टि भी की थी और सफाई में कहा था कि सोवियत विचारधारा के हितों की रक्षा हेतु ये पैसे दिए जाते रहे हैं।

1994 में येवगिनिया अल्बट्स और कैथरीन फिट्ज़पेट्रिक ने KGB प्रमुख विक्टोर चेब्रिकोव के हस्ताक्षर युक्त पत्र प्रस्तुत कर ये खुलासा किया कि राजीव के बाद राजीव के परिवार, सोनिया और राहुल को KGB की ओर से धन उपलब्ध करवाया जाता रहा और KGB गांधी परिवार से निरन्तर संपर्क में रहती थी।

अब यदि आप पूरा आकलन करें तो पाएंगे कि राजीव एक औसत से कम समझदार वो व्यक्ति थे जिसने

निर्दोष सिख मरवाये,

भोपाल गैस कांड में हजारों निर्दोषों के हत्यारे को भगाया।

मुस्लिमों महिलाओं का जीवन नर्क बनाया।

रक्षा सौदों में दलाली खायी।

KGB जैसी एजेंसी के वो खुद एजेंट थे और उससे पैसे लेते थे, कूटनीति की समझ नहीं थी।

और मूर्खतावश श्रीलंका में 1400 भारतीय सैनिकों की बलि चढ़वाई और देश का नाम कलंकित किया।# #viralreelsシ #foryouシpage #viralvideoシ #ViralStoryTime #foryoupageシ #foryouシ #reels #stories #story #storytime

बुधवार, 18 फ़रवरी 2026

NPA 56लाख करोड़ था

आप कहाँ-कहाँ गड्ढे खोदकर गये हो जी ??
अब समझ में आ रही है नोट बंदी ???
कांग्रेस के अर्थशास्त्री PM मनमोहन सिंह जी ने बैंकों के एनपीए 37% बताये थे, जो वस्तुतः 82% थे !
कितना बड़ा झूठ ....
बैंकें डूबने की कगार पर थीं ...
कुल एनपीए था 56 लाख करोड़ रुपये ...
कल्पना कीजिये जब ये सच्चाई नव नियुक्त पीएम के सामने आयी होगी तो उन पर क्या बीती होगी, अगर बैंकें फेल हो जातीं तो देश किस हालत में होता ? ...
आर्थिक अराजकता सामाजिक अराजकता में बदल चुकी होती, देश भयंकर संकटों में घिर चुका होता ...
नया पीएम उसकी भेंट चढ़ गया होता और आंकड़ों की भूलभुलैया में यही विपक्ष अपने पाप को मोदी के सर मढ रहा होता ...

नोटबंदी ने इस दुष्चक्र से बाहर निकाल दिया ....
बैंकों के पास तत्काल ढ़ेर सारा कैश आ गया !
फिर बैंक डिफाल्टरो पर नकेल कसने का काम शुरू हुआ और हजारों, लाखों करोड़ की संपत्तियां जब्त हुई !

लोग मोदी से तमाम मुद्दों पर क्षुब्ध रहते हैं, उन्हें  अंदाजा ही नहीं है कि देश कितना खोखला कर दिया गया था । 
डिफेंस आतंरिक सुरक्षा विदेशनीति ,आर्थिक अव्यवस्था , सामाजिक विग्रह, आस्तीन के सांप इन सबसे एक साथ निपटना बहुत दुष्कर, विवेकपूर्ण और राजनैतिक इच्छाशक्ति का काम है !

हम मोदी शासन के कारण देशद्रोहियों की गहरी जड़ों को कुछ कुछ देख पा रहे हैं, मिडिया शिक्षा संस्थान, न्यायपालिका सब जगह आज भी विषधर बैठे हुए हैं ....
इन सबके बीच अपने को सुरक्षित रखते हुए देश को सुरक्षित करने का काम मोदी जी  कर रहे हैं ...
हमें पूरा विश्वास है कि मोदी हमारी आशाओं आकांक्षाओं को निश्चित ही पूरा करेंगे ...
ये दौर इन विषधरों के दांत तोड़ने का है !

मोदी को हमारे सार्थक समर्थन की आवश्यकता है,
धैर्य के साथ मोदी के साथ खड़े होने की आवश्यकता है,
अधैर्य से हम मोदी को ही नहीं खोएंगे, अपितु उन्ही दरिंदों के हाथों में देश और अपनी संतानों के भविष्य को सौंप देंगे
सत्ता की ताक में बैठे बहेलिये यही चाहते हैं और हमें गुमराह कर रहे हैं ! दुश्मन जो चाहता है अगर वैसा ही करेंगे, तो पराजय और दुर्भाग्य तो निश्चित है .....

काले कारनामें

लगभग 1500 भारतीय~हिन्दू, वैज्ञानिकों की हत्या, अपहरण:  
जिन बैज्ञानिकों की हत्याएं और अपहरण बाबर बंशी मियां नेहरू, नकली गांधीयों के शासनकाल में हुई, ऊनमें  भी सबसे ज्यादा  हत्या,अपहरण अब्दुल कलाम (ISRO), हामिद अंसारी ( उपराष्ट्रपति), और Antonia (के गुलाम मनमोहन) के समय हुई। ये बाबर बंशी नेहरू,नकली गांधी खानदान भारत,हिन्दुओं का सबसे बड़ा गद्दार है,हर भारतीय को इसे समझना चाहिए, इन्होंने CIA से लेकर ISI,तक को जानकारियां दी है सहयोग किया है। भारत में सैंकड़ों आतंकी घटनाओं में इस खानदान का हाथ रहा है,चाहे 26/11 हो या 1990 का कश्मीरी हिंदुओं का नरसंहार, या 1948 चित्त पावन ब्राह्मणों की हत्या, 1984 सिक्खों का या पुलवामा... या दूसरे सैंकड़ों आतंकी हमले 

भारतीय वैज्ञानिकों की रहस्यमयी मौतें और RAW के नेटवर्क को ध्वस्त करना ये साजिश हर भारतीय जानना चाहता है। यह बाबर बंशी मियां नेहरू, नकली गांधीयों का परिवार वैज्ञानिकों को मरवा देते या गायब थे यह एक बड़ा रहस्य है जो उजागर होना चाहिए क्यों वैज्ञानिक मारें गये , लापता हुवे, और आत्महत्या तक करने को मजबुर हुए इस रहस्य को उजागर करना चाहिए।
कांग्रेस के राज में 1500 जीतने  वैज्ञानिकों की संदिग्ध हालात में मौतें , अपहरण, आत्म हत्याएं हुई, कुछ पाकिस्तान में brain 🧠 dead अवस्था में मिले, किसी की कोई जांच नहीं हुई सब ठंडे बस्ते में चली गई, ऐसा हि हुआ था हमारे दुसरे प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री जी के साथ उनका रहस्यमय परिस्थितियों में मरना ( हत्या ) ऐक पहेली बनकर रह गया हे, आज भी कई रहस्यों पर पर्दा पडा हुआ हे जो शायद अब सबुतो के अभाव के कारण सुलझ नहीं पाएंगे।🥲

5वी फेल Antonia 13 जनवरी 1968 को भारत आई , जिसकी शादी 25 फरवरी 1968 को राजीव खान गांधी से हुई,जो एक एस्कॉर्ट सर्विस चलाती थी और खुद भी धंधेवाली थी #एंटोनियामाइनो जिसको भारत आते ही सैटेलाइट और अंतरिक्ष विज्ञान में रुचि हो गई। है न घोर आश्चर्य की बात ?
जिस धंधेवाली को Resister, Capacitor, IC and Diode का मुंह किधर है और G किधर होता है पता ही नहीं है वो अंतरिक्ष विज्ञान समझ रही है 😜उसकी आंखों में कुटिलता देखिए,(फोटो)सब समझ आ जाएगा....
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अप्रैल, 1968: विक्रम साराभाई Antonia ~सोनिया खान गांधी को अहमदाबाद में प्रायोगिक उपग्रह संचार का अर्थ स्टेशन का कामकाज समझाते हुए।( चित्र संलग्न) अप्रैल 1968 में लिया गया यह चित्र ISRO के अहमदाबाद सेंटर का है। वैज्ञानिक विक्रम साराभाई सोनिया  को भारत की उपग्रह परियोजना की जानकारी दे रहे हैं। जनवरी में भारत आई, दो महीने पहले ही फरवरी 1968 में सोनिया राजीव का विवाह उसने भारत की नागरिकता भी नहीं ली थी। और पहुंच गई अति महत्वपूर्ण संस्थान की जानकारी लेने के लिये ??? क्यूं??? 

संयोग है कि कुछ समय बाद ही विक्रम साराभाई केरल मे एक रिजॉर्ट के कमरे में रहस्यमय ढंग से मृत पाए गए। बिना पोस्टमार्टम के ही घोषणा कर दी गई थी कि मृत्यु हार्ट अटैक से हुई है।

कोई भी विदेशी भारत वर्ष का हितैषी नहीं हो सकता दाल में कुछ काला नहीं बल्कि पूरी दाल  काली है.. आज ये, उस इटालियन धंधेवाली Antonia का नाजायज पिल्ला पप्पू, पिंकी खान वाड्रा,रॉबर्ट वाड्रा सब देश को भांडने, फूट डालने, बिगाड़ने में लगे हैं।देश का सबसे बड़ा गद्दार बाबर बंशी मियां नेहरू,नकली गांधीयों का खानदान है।

जिस हामिद अंसारी को इस कांग्रेस ने उपराष्ट्रपति बनाया उसके ईरान, ISI पाकिस्तान से सम्बन्ध सभी जानते हैं, पर जो हिंदू ये बोलते नहीं थकते कि मुस्लिम हो तो अब्दुल कलाम जैसा वे हिन्दू अलतकिया अब्दुल कलाम का अ और क भी नहीं जानते। 

अब्दुल कलाम के समय ISRO से करीब 67 बैज्ञानिक गायब हुवे, जिसमें ना जाने कितने पाकिस्तान पहुंचाए गए पर 3 जो brain 🧠 dead अवस्था में पाकिस्तान में मिले वह मृत्यु तुल्य अवस्था थी, शायद 32 की लाशे मिली थी बाकी का आज तक कोई सुराग नहीं, शायद पाकिस्तान ही पहुंचाए गए थे।RTI से ये जानकारी आप ले सकते है। इसी अब्दुल कलाम ने नियम, कानून विपरीत मुल्लों के लिए राष्ट्रपति भवन के अंदर किया किया बनाए आप RTI से जानकारी ले सकते हैं।

इसी अब्दुल कलाम के समय ISRO में एक जॉब vacancy थी 66 लोगों के लिए, जिसमें 8800 एप्लीकेशन पड़ी थी, और उस अब्दुल कलाम ने सारी 66 जॉब छांट छांट कर मुल्लों को दी थी। बहुत बड़ा बवाल हुआ था पर कांग्रेस ने सब शांत कर छुपा दिया।  साउथ इंडिया के लोग ये कांड अच्छी तरह जानते है और मुझे इसकी जानकारी साउथ इंडिया के ही लोगों ने दी थी ( 2012 में ) किसी भी मुल्ले पर बिस्वास करना एक महा पाप है, चाहे वो वैज्ञानिकों का हत्यारा अब्दुल कलाम हो या मूर्खो का चहेता फैज खान, या यूसुफ खान ( दिलीप कुमार) या मूर्खो का सड़क छाप सड़ खान सड़ .. 

होमी जहांगीर भावा की हत्या में इसी बाबर बंशी मियां नेहरू खानदान की मेमुना बेगम उर्फ इंदिरा खान का हाथ था तो बिक्रम साराभाई की हत्या में पूरी तरह  Antonia का हाथ था 

कितने षड्यंत्र किए इस बाबर बंशी मियां नेहरू खानदान ने कितनी हत्याएं,कितनी लूट, 2014 में अगर मोदी जी न आते तो किसी को कुछ पता भी ना चलता।

विक्रम साराभाई ,डॉक्टर होमी जहांगीर भाभा  आज होते तो भारत दुनिया का बाप होता। 

She came to India only because as spy, by profession she was running an Escort service from a bar, was a prostitute , her partner n supplier of Girls/teens was a Islamabadi rich muslim, qualifications 5th standard fail but what an interesting she went to observe I S R O  ! Soon after she came to Bharat ( married to Rajiv Khan Gandhi) 
      LATER ON  Dr sarabhai was found dead 
She stayed in india as spy ~of CIA,KgB , is also an agent for Pop ( convert apx 6,65,000 Hindus to Christianity)

     After long years she took  Indian citizen ship , sources of incomes Nil was NiL, but  now a days she is 4th richest woman in the world

Whenever a politician visits such an esteemed organization, the scientists should not come forward to explain the project or workings, they are useless fellows and come to shine their report card only.

Antonio has damaged India like any thing and now his son is also doing the same

बहुत कुछ तो रहस्य है लेकिन किसी की हिम्मत क्यों नहीं है इस इटालियन को छूने की???इस spy इटालियन के रहस्य ~ जिस जिस ने जाने   वे सब रहस्यमयी मौत को प्राप्त हुए है चाहे राजीव खान गांधी हो, या माधव राव सिंधिया,राजेश पायलट या रॉबर्ट वाड्रा का खानदान.....

गलती विक्रम साराभाई की नहीं थी उस समय भारत के लोगों की मानसिकता ही कुछ ऐसी थी कि बाबर बंशी मियां नेहरू, नकली गांधी परिवार को भारत का मालिक समझते थे और ये परिवार भारत को अपनी बापौती समझ कर लुटता,रहा हजारों नहीं लाखों हत्याएं, करोड़ो पाकिस्तानी, बांग्लादेशी  मुल्लों को  लाकर बसाया। 

देश को खत्म करना ही कांग्रेस और इस मुल्ले नकली गांधी परिवार का शुरू से मकसद रहा है और आज भी  एंटोनिया, पिंकिखान वाड्रा, राहुल खान गांधी देश भर मे झूठ बोल कर इसी प्लानिंग पर काम कर रहा है

मतलब ये पनौती जब से भारत आई,तब से महत्वपूर्ण पदों पर विराजमान महानुभावों की जीवनलीला पर ग्रहण लगने लगा। संजय खान गांधी, इंदिरा खानगांधी , राजीव खान गांधी जैसे परिवारों के लोग मारे गए।
परन्तु जब से बागडोर संभाली तब से परिवार सुरक्षित और पुराने कांग्रेसी साइड। नटवर सिंह जी को कैसे धक्के मारकर बाहर किया। फिर भी पुराने कांग्रेसी इनके और परिवार का गुणगान करते नहीं थकते। परिवार को शहीद कहते हैं लेकिन कोई ये नहीं कहता कि हत्या हुई है। राजेश पायलट ,माधवराज सिंधिया , जगदीश पायलट   रॉबर्ट वाड्रा का प्रायः पूरा खानदान , जैसे खास लोगों को क्या हुआ कोई नहीं बताता। 
जब वैज्ञानिक तक नहीं छोड़ा तो औरों को क्या बखसेंगे।

अभी ग़ुलामी निकली नहीं न हिन्दू जागा है, बस पैसे दे दो कुछ भी करो , कॉग्रेस का मतलब ही "एक आतंकवादी गद्दारों का संगठन"  है और इसके जो इंडी ठग बंधन है वो भी मेम्बर है इन्हें सबको जेल भेज दे या सालो को ऊपर हूरो से मिलवा दो । ये ही इन गद्दारों की  बीमारी का सही इलाज है ।

भला हो वर्तमान सरकार का और सोशल मीडिया का जिसने भारत के सही इतिहास को सामने लाया, और इस परिवार की असलियत धीरे धीरे खुल कर सामने आ गई। 
मोदी जी के शासन में वैज्ञानिक सुरक्षित हैं और नई नई खोजों में लगे हैं । भारत नई ऊंचाइयों को छू रहा है ♥️🚩🇮🇳

उसके बाद क्या हुआ हमारे साराभाई और कितने वैज्ञानिकों कि हत्या हुई ?? 

भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम के पितामह विक्रम साराभाई जिन्होंने रखी थी ISRO की नींव । भारत का अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन अतंरिक्ष के क्षेत्र में ऊंचे शिखर पर है जिसका पूरा श्रेय ‘भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम के पितामह’ विक्रम साराभाई को जाता है।

साल 1975 में भारत ने एक रूसी कॉस्मोड्रोम से ‘आर्यभट्ट’ उपग्रह को सफलतापूर्वक प्रक्षेपित कर दुनिया को चकित कर डाला.  यह विक्रम भाई की परियोजना की सफलता थी। 

मई, 1966 में उन्होंने परमाणु ऊर्जा आयोग के अध्यक्ष पद का कार्यभार संभाला। साल 1919 में 12 अगस्त को अहमदाबाद के स्वतंत्रता आन्दोलन को समर्पित एक प्रगतिशील विचारों वाले उद्योगपति परिवार में जन्मे थे तो वहीं पर देश की प्रसिद्ध शख्सियत  सरोजिनी नायडू, अन्य से नाता रहा।
साल 1962 में उन्होंने शांतिस्वरूप भटनागर पदक प्राप्त किया, तो 1966 में पद्मभूषण. मरणोपरांत उन्हें 1972 में पद्म विभूषण सम्मान से सम्मानित किया गया।साल 2019 में उनकी जन्म शताब्दी पर इसरो ने विक्रम साराभाई पत्रकारिता पुरस्कार भी शुरू करने की घोषणा की।

भारत के चंद्र मिशन चंद्रयान-2 के लैंडर (जिसको 20 सितंबर, 2019 को चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के पास उतरना था) का नाम भी विक्रम रखा गया।
साराभाई की मौत एक रहस्य
आम दिनों की ही तरह 30 दिसंबर, 1971 का भी दिन था। लेकिन उस दिन को खास बना दिया एक घटना ने। और वह घटना थी देश के महान वैज्ञानिक विक्रम साराभाई का इस दुनिया से चले जाना। किसी को यकीन नहीं था कि भारत के स्पेस प्रोग्राम के पिता कहे जाने वाले विक्रम साराभाई हमें यूं छोड़कर चले जाएंगे। एक दिन पहले तो सबकुछ ठीक-ठाक था। उन्होंने वैज्ञानिकों के साथ बैठकें की थीं और अहम विषयों पर चर्चाएं भी हुई थीं। ऐसे कोई लक्षण नहीं दिख रहे थे जिससे लगे कि उनकी तबीयत खराब है। लेकिन अगली सुबह केरल के तटीय शहर कोवलाम के एक होटल रूम में उनका शव मिला। उनकी इस अचानक मौत ने सबको झिंझोड़ कर रख दिया था।

​नांबी नारायण की आत्मकथा और साजिश का शक
जासूसी के गलत मामले में फंसाए गए पूर्व अंतरिक्ष वैज्ञानिक नांबी नारायणन की मानें तो साराभाई अंतरराष्ट्रीय साजिश का शिकार हुए। इसरो के जासूसी मामले में फंसे और फिर बाद में बेदाग साबित हुए एस.नांबी नारायणन की 2017 में मलयाली भाषा में आत्मकथा आई थी जिसका नाम Ormakalude Bhramanapatham है। उस किताब से विक्रम साराभाई की मौत के रहस्य पर फिर से चर्चा गर्माया।

​मौत पर यकीन नहीं
नांबी नारायणन ने साराभाई के साथ मिलकर उनके जूनियर के तौर पर इसरो में काम किया है और उनके काफी करीब रहे हैं। उन्होंने अपनी आत्मकथा में लिखा है, 'उनकी मौत से कई सवाल उठे हैं। अगर उनकी मौत साजिश थी तो पूरी संभावना है कि उसके पीछे अंतरराष्ट्रीय शक्तियों का हाथ हो। नहीं तो उनके जैसे वैज्ञानिक का इस तरह अचानक निधन कैसे हो सकता है?'

सेहत पर देते थे बहुत ध्यान
नांबी नारायणन ने अपनी आत्मकथा में एक पूरा चैप्टर साराभाई के निधन को समर्पित किया है। उन्होंने इसमें उनके निधन पर कई सवाल खड़े किए हैं। उनका कहना है कि साराभाई अपनी सेहत का बहुत ध्यान रखते थे। नांबी लिखते हैं, 'एक आदमी जिसने जिंदगी में कभी सिगरेट को छुआ तक नहीं। फिर उनकी ऐसे मौत कैसे हो गई? यह जानते हुए भी कि मृतक एक महान वैज्ञानिक थे, उनका अंतिम संस्कार उनकी ऑटोप्सी कराए बगैर क्यों किया गया?'

 उन्होंने कहा कि साराभाई के निधन को प्रसिद्ध भौतिकशास्त्री होमी जहांगीर भाभा की मौत से जोड़कर देखा जाना चाहिए जिनका 1966 में एक विमान दुर्घटना में निधन हो गया था। CIA ~ सीआईए का हाथ?
उन्होंने पत्रकार ग्रेगरी डगलस की किताब Conversations with the Crow का हवाला दिया है जिसमें सीआईए अफसर रॉबर्ट क्रॉली ने भाभा की मौत के पीछे सीआईए के हाथ होने के संकेत दिए थे। किताब में क्रॉली के हवाले से लिखा है, '1965 में भारत-पाकिस्तान के युद्ध में भारत की जीत से अमेरिका बेचैन हो गया। भारत को एक न्यूक्लियर ताकत के तौर पर उभरते हुए देखने से भी अमेरिका की चिंता बढ़ गई।'👇👇

इन कांग्रेसी कुत्तों ने सबसे अंत में नम्बी नारायण जी को शिकार बनाया था, परंतु उनका सौभाग्य था कि उनके जेल में रहते हुए सत्ता परिवर्तन हो गया, नयी सरकार ने दुबारा जांच बिठा दिया तो इसरो के महान वैज्ञानिक नम्बी नारायण जी निर्दोष पाए गए और सुप्रीम कोर्ट ने नारायणन जी से माफी मांगते हुए सम्मान बरी कर दिया तथा उनका जो बकाया धनराशि ब्याज सहित उनको प्रदान किया गया।
 एक अभिनंदन समारोह में उन्होंने रूंधे गले से साक्षात्कार दिया था कि यदि सत्ता में मोदीजी नहीं आते तो मेरा जीवित जेल से निकलना असंभव था, जो पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार ने मेरे उपर देशके प्रति गद्दारी का काला धब्बा थोप दिया था वो धब्बा भी मिटना मुश्किल था, मैं बहुत प्रसन्न हूं कि मुझे दूसरा जन्म मिल गया।......

डॉ होमी जेन्हागीर भाभा (1909-1966) एक भारतीय भौतिक विज्ञानी थे जिन्हें अक्सर भारतीय परमाणु कार्यक्रम का जनक माना जाता है ।

भाभा का जन्म मुंबई के एक धनी परिवार में हुआ था। 1927 में वे इंग्लैंड के कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में पढ़ने गए। हालाँकि उन्होंने परिवार की इच्छा के अनुसार इंजीनियरिंग की पढ़ाई शुरू की, लेकिन भाभा जल्द ही भौतिकी की ओर आकर्षित हो गए।  1932 में भाभा ने लिखा , “मैं आपसे स्पष्ट रूप से कहता हूँ कि व्यवसाय या इंजीनियर के रूप में नौकरी मेरे लिए नहीं है। यह मेरे स्वभाव से बिल्कुल अलग है और मेरे मिजाज और विचारों के बिल्कुल विपरीत है। भौतिकी ही मेरा क्षेत्र है। मुझे पता है कि मैं इसमें महान कार्य करूँगा।” भाभा ने 1934 में परमाणु भौतिकी में पीएचडी की उपाधि प्राप्त की।

द्वितीय विश्व युद्ध से पहले भाभा भारत लौट आए और भारतीय विज्ञान संस्थान में शामिल हो गए, जहाँ उन्होंने कॉस्मिक रे रिसर्च इंस्टीट्यूट की स्थापना की। 1945 में, उन्होंने टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च की स्थापना की, जहाँ भारत के परमाणु कार्यक्रम के लिए प्रारंभिक शोध कार्य शुरू हुआ। 1947 में भारत की स्वतंत्रता के तुरंत बाद,  भाभा ने प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को पत्र लिखकर तर्क दिया कि "अगले कुछ दशकों में, परमाणु ऊर्जा देशों की अर्थव्यवस्था और उद्योग में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी और यदि भारत दुनिया के औद्योगिक रूप से उन्नत देशों से और भी पीछे नहीं रहना चाहता है, तो विज्ञान की इस शाखा को विकसित करना आवश्यक होगा।"

1954 में, भाभा ने ट्रॉम्बे में एक परमाणु अनुसंधान केंद्र की स्थापना की, जिसका नाम बाद में भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र (BARC) रखा गया। परमाणु ऊर्जा के प्रबल समर्थक भाभा ने 1955 में परमाणु ऊर्जा के शांतिपूर्ण उपयोग पर पहले संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन का आयोजन किया। वे अपनी मृत्यु तक भारत के परमाणु कार्यक्रम के प्रमुख रहे।

होमी भाभा की मृत्यु 24 जनवरी, 1966 को जिनेवा जाते समय एक विमान दुर्घटना में हो गई थी। इनकी मृत्यु का शक CIA और मेमुना बेगम उर्फ इंदिरा खान गांधी पर किया जाता है। 11 जनवरी 1966 को ही मेमुना बेगम उर्फ इंदिरा खान ने रूस में श्री लाल बहादुर शास्त्री जी को मुस्लिम रसोइए से उनके खाने में जहर देकर उनकी हत्या करवाई थी, और 24 जनवरी को डॉ होमी जहांगीर भावा की भी हत्या में CIA और मेमुना बेगम उर्फ इंदिरा खान का हाथ था। 

Dr. Homi Jehangir Bhabha (1909–1966) was a pioneering Indian nuclear physicist and the "father of the Indian nuclear programme". He founded key research institutions, including the Tata Institute of Fundamental Research (TIFR) and the Atomic Energy Establishment, Trombay (AEET), now named the Bhabha Atomic Research Centre (BARC) in his honor. A Cambridge-educated visionary, he championed India's self-reliance in nuclear energy, initiating its three-stage nuclear power program.

बहुत बड़ी कीमत चुकायी है देश ने  इस बाबर बंशी मियां नेहरू,नकली गाँधी परिवार की वजह से.🤔😷😡

इसके बाद भी हिंदुस्तान की जनता की आंखें नहीं खुल रही हैं विशेष कर  सनातनी हिंदू असावधान भाइयों की। 

राजीव खान गांधी,Antonia, राउल विंची कोढ़ उर्फ पप्पू, अमिताभ श्रीवास्तव बच्चन परिवार ने कैसे भारतीय सेना के संसाधनों INS Vikrant जैसे युद्ध पोत, , सेना की जहाजों का छुट्टियां , पिकनिक, व्यक्तिगत  अय्याशी,एशो आराम, चुनाव तक में दुरुपयोग किया हर हिन्दू को हर भारतीय को सत्य समझना चाहिए

एक चुड़ैल Antonio Maino आज भी भारत के टुकड़े करने में षड्यंत्र कर रही है वह है एंटोनिया माइनो उसका नाजायज कपूत पप्पू खान गांडी,पिंकी खान वाड्रा, रॉबर्ट वाड्रा सब के सब लुटेरे, हत्यारे, ड्रामा बाज ,अय्याश नित नए प्रोपगेंडा भड़काना बवाल मचाना । हर हिन्दू को इस गद्दार नकली परिवार  से सावधान रहना चाहिए, #कांग्रेस_मुक्तहो_अपनाभारत✊✊

मोदीजी का दृढ़ निश्चय है की 
भारतीय सेना, भारतीय अंतरिक्ष विज्ञान को मजबूत बनाना,साथ ही देश में इंफ्रास्ट्रक्चर ~निर्माण,  संसाधनों का उपयोग कर भारत को भारतीयों को आत्म निर्भर बनाए। जिसमें देश के हर सदस्य का सहयोग अपेक्षित है।

अपने देश अपने सनातन से प्यार करें।  
Keep open your eyes 👀 Love you nation Bharat ⛳ 
#NationFirst ♥️🚩🇮🇳

Raveena Zen Raunak Jain

मंगलवार, 17 फ़रवरी 2026

फ़िरोज़ गाँधी की दास्तान

एक दो दिन से *कांग्रेस के मणिशंकर अय्यर* बहुत चर्चा में है, उन्होंने कांग्रेस प्रवक्ताओं को विशेषकर *पवन बखेड़ा* को *चमचा* कहा जैसा बाक़ी सभी भक्त लोग सम्माननीय कांग्रेसियों को कहते हैं।
*भारतीय राजनीति और संस्कृति में चमचो का अलग ही स्थान है, हमारे समाज में भी कुछ लोग चुनाव हराकर भी पद प्राप्त करने में कामयाब हो जाते हैं सिर्फ़ चमचागिरी करके, किंतु कांग्रेस में हमेशा ऐसा नहीं रहा।*
राहुल गाँधी के दादा जी *स्वर्गीय फिरोज गांधी* भारतीय राजनीति के इतिहास के वे *दामाद* थे, जिन्होंने *ससुराल में सोफ़े पर बैठकर चाय पीने के बजाय, ससुराल की ही ईंट से ईंट बजाना बेहतर समझा।*
उन्होंने नेहरू को 'ससुर' और गांधी को 'नाम' के रूप में चुना—एक ने उन्हें सत्ता के गलियारे दिए, दूसरे ने उन गलियारों में आग लगाने की हिम्मत!
*कल्पना कीजिए, आज के दौर में कोई दामाद अपने ससुर की कंपनी के घोटालों की फाइलें लेकर प्रेस कॉन्फ्रेंस कर दे?* फिरोज गांधी ने 1957 में यही किया था। नेहरू जी तब देश के निर्विवाद नायक थे, लेकिन फिरोज ने संसद में खड़े होकर *मुंद्रा कांड* की ऐसी परतें खोलीं कि नेहरू जी को समझ नहीं आ रहा था कि वे सदन के नेता के रूप में जवाब दें या ससुर के रूप में गुस्सा करें।
*मुंद्रा कांड (1957): LIC का वो 'पहला पाप'*
यह वह समय था जब नेहरू का नाम ही कानून था, लेकिन फिरोज ने दिखाया कि लोकतंत्र में 'जनता का पैसा' किसी भी रिश्ते से ऊपर है।
*हरिदास मुंद्रा नाम के एक शातिर सट्टेबाज ने नेहरू सरकार के कुछ अधिकारियों और वित्त मंत्री टी.टी. कृष्णमाचारी के साथ मिलकर एक योजना बनाई। LIC (भारतीय जीवन बीमा निगम), जो उस समय जनता के भरोसे का प्रतीक था, उसे मजबूर किया गया कि वह मुंद्रा की छह डूबती हुई कंपनियों के रद्दी शेयर खरीदे।*
16 दिसंबर 1957 को संसद में फिरोज गांधी ने जब फाइलें खोलीं, तो सन्नाटा पसर गया। उन्होंने तीखा व्यंग्य करते हुए पूछा— *”क्या यह सरकार का काम है कि वह सट्टेबाजों के कचरे को जनता की गाढ़ी कमाई से साफ करे?"*
यह शायद इतिहास का पहला उदाहरण था जहाँ डाइनिंग टेबल पर बैठा व्यक्ति (दामाद) सुबह संसद में जाकर अपने ही मेजबान (ससुर) की सरकार का 'कबाड़ा' कर रहा था। मुंद्रा कांड ने नेहरू को इतना मजबूर कर दिया कि उन्हें अपने सबसे प्रिय वित्त मंत्री की बलि देनी पड़ी और सट्टेबाज मुद्रा को जेल भेजना पड़ा
उन्होंने LIC के पैसे के दुरुपयोग को ऐसे पकड़ा जैसे कोई अनुभवी जासूस। नतीजा? वित्त मंत्री का इस्तीफा हो गया और ससुर-दामाद के बीच डिनर टेबल पर सन्नाटा छा गया। फिरोज गांधी ने साबित किया कि "ससुराल गेंदा फूल" हो सकता है, लेकिन भ्रष्टाचार "कांटों की सेज" ही होगा।

*यह फिरोज गांधी ही थे जिन्होंने भारतीय राजनीति को सिखाया कि "देशभक्ति का मतलब सरकार की जी-हुजूरी करना नहीं, बल्कि जनता के पैसे की चौकीदारी करना है।"*

फिरोज गांधी का व्यक्तित्व बहुत गहरा और गंभीर था। वे केवल एक 'विद्रोही' नहीं थे, वे एक बेहद पढ़ा-लिखा और मेहनती सांसद थे। वे आंकड़ों के जादूगर थे। *लेकिन दुख की बात है की राहुल गांधी में उनके DNA का कुछ भी नहीं है।*
फिरोज गांधी सत्ता के सबसे करीब रहकर भी सत्ता की चापलूसी नहीं की।
फिरोज और इंदिरा का रिश्ता किसी ग्रीक ट्रेजेडी (Greek Tragedy) जैसा था। वे एक-दूसरे से प्यार तो करते थे, लेकिन फिरोज की 'आजाद खयाली' और इंदिरा की 'सत्ता की मजबूरी' के बीच एक गहरी खाई थी।
          आज के दौर में जहाँ लोग 'टिकट' के लिए अपनी विचारधारा बदल लेते हैं, फिरोज गांधी ने अपनी विचारधारा के लिए अपना 'घर' (तीन मूर्ति भवन) तक छोड़ दिया और एक छोटे से सरकारी बंगले में रहने चले गए।

फिरोज गांधी को इतिहास ने थोड़ा भुला दिया। शायद इसलिए क्योंकि वे "फिट" नहीं बैठते थे। न वे पूरी तरह कांग्रेस के 'दरबारी' बन पाए, और न ही विपक्ष के 'मोहरे'।
*उनकी मौत 48 साल की उम्र में हुई। शायद उनका दिल इतना बड़ा था कि उसमें नेहरू की नाराजगी, इंदिरा का प्रेम और देश के घोटालों का बोझ—तीनों एक साथ नहीं समा सके।*
आज अगर फिरोज गांधी जीवित होते तो शायद वो अपना सरनेम बदलकर *मोदी* अवश्य कर लेते और राहुल गाँधी को देखते ही दादाजी थप्पड़ रसीद करने से भी बाज नहीं आते।
✍️विकास जैन

जतीन्द्र नाथ मुखर्जी / बाघा जतिन

उस दिन अगर वो गद्दारी न हुई होती... तो 1915 में ही हम आज़ाद हो गए होते और 'राष्ट्रपिता' ये व्यक्ति होता 👇!" खून खौल उठता है यह ...