बुधवार, 8 अप्रैल 2026

खड़गे का नीच बयान

आंख खोलकर पढ़िये....!!

ईशा की पांचवी सदी में शाही राजा खिंगल ने अफगानिस्तान के गर्देज स्थान पर महाविनायक की प्राण प्रतिष्ठा कराई थी। 
समय के साथ सभ्यता के ऊपर धूल चढ़ती गई और महाविनायक की प्रतिमा मिट्टी में कहीं दब गई।

युगों बाद खुदाई में जब वह प्रतिमा मिली तो उसे काबुल में "दरगाह पीर रतन नाथ" के पास स्थापित किया गया। दरगाह पीर रतन नाथ की कहानी किसी दूसरे दिन सुनाएंगे। 
आज कहानी महाविनायक की।

दो वर्ष पूर्व बिहार का एक युवक अफगानिस्तान में भारतीय दूतावास में नौकरी करने पहुँचा। 
स्वयं को यायावर कहने वाले उस युवक को अफगानिस्तान के प्राचीन महाविनायक के सम्बंध में पता था, सो वे महाविनायक के चिन्ह खोजने निकले। 
पर अफगानिस्तान में सनातन के चिन्ह जितने ही सुलभ हैं, उन्हें खोज लेना उतना ही दुर्लभ। 
कई दिनों नहीं कई महीनों के बाद उन्हें पीर रतन नाथ दरगाह का पता चला तो वे एक दिन पहुंचे तो एक ऐसा घर मिला जिसे भारत में मंदिर नहीं कह सकते। उस मंदिर में प्रतिमा स्थापित नहीं थी, बस रामायण महाभारत और गीता आदि पुस्तके रखी हुई थीं।

युवक ने सेवादार से जब महाविनायक की प्रतिमा के बारे में पूछा तो बुजुर्ग सेवादार आश्चर्य में डूब गया। क्या कोई दूर देश से मात्र एक प्रतिमा के लिए आया है? कौन है यह?
भावुक हो चुके सेवादार ने एक बन्द कमरे में रखी महाविनायक की प्रतिमा दिखाई... 
युगों बाद किसी ने श्रद्धा से महाविनायक को देखा, युगों बाद महाविनायक की प्रतिमा ने अपने किसी श्रद्धालु को वात्सल्य की दृष्टि से देखा। 
उस दिन युगों बाद किसी ने अभिशप्त महाविनायक के चरणों में प्रणाम किया, प्रतिमा पोंछी और बीस रुपये वाले माला से उनका श्रृंगार किया।

जानते हैं, ढाई हजार वर्ष पूर्व अफगानिस्तान के हर कण्ठ से वेदमन्त्र उच्चारित होते थे, 
गलियों में यज्ञध्रुम की सुगन्ध पसरी रहती थी। 
"वसुधैव कुटुंकम" की अवधारणा को जन्म देने वाली उस पूण्य भूमि पर सौ वर्ष पूर्व तक सनातन धर्म पूरी प्रतिष्ठा के साथ खड़ा था। 
पर आज का सत्य यह है कि अफगानिस्तान से महाविनायक पर लेख लिख कर जब उस युवक ने भारत भेजा तो पत्रिका के सम्पादक ने भय के मारे लेख में उनका नाम तक नहीं जोड़ा, कि कहीं उन्हें अफगानिस्तान में इसका दण्ड न भोगना पड़े।

सभ्यताओं के चिन्ह कैसे मरते हैं देखें। 
काबुल में एक अत्यंत प्राचीन तीर्थस्थल है 'आशा माई'। 
पस्तो प्रभाव के कारण वहां के लोग उस स्थान को 'कोही आस्माई' कहते थे, मतलब आशामाई की पहाड़ी। 
बीस वर्ष पूर्व सरकार ने उस पहाड़ी पर टेलीविजन का टावर लगा दिया, लोग धीरे धीरे उस स्थान को "कोही टेलीविजन" कहने लगे। 
आशामाई का नाम मिट गया।
काबुल में ही एक सड़क थी, देवगनाना रोड। 
देवगनाना संस्कृत के "देवगणानाम" का अपभ्रंस है। 
अब उस सड़क का नाम है, दे-अफ़ग़ान रोड। 
सभ्यता के चिन्ह ऐसे मरते हैं।

देश में लोकतंत्र का महापर्व चल रहा है। मत देना हमारा कर्तव्य भी है, और हमारी आवश्यकता भी। अपने घरों से निकलिए, और मत देते समय इतना अवश्य याद रखिए कि अब हमारे पास धरती का यही एक टुकड़ा है जहाँ हम अपनी परम्पराओं को निभा सकते हैं, महाविनायक की अर्चना कर सकते हैं। 
ऐसा ना हो कि सौ पचास वर्षों बाद किसी दूसरे Lalit Kumar को इसी तरह दिल्ली, आगरा, मथुरा या कानपुर में अपने चिन्ह खोजने आना पड़े। 
यकीन मानिए 200 वर्ष पहले काबुल के हिंदुओं ने भी ऐसा नहीं सोचा होगा कि 200 वर्ष बाद हमारा कोई बच्चा जब काबुल आएगा तो उसे अपने पूर्वजों के चिन्ह इस दशा में मिलेंगे। 
1946 ईस्वी तक सिंध के लोगों ने यह नहीं सोचा होगा कि पचास वर्ष बाद ही उनसे उनकी सम्पति, उनका धर्म, उनकी बेटियां, उनके बेटे सबकुछ छीन लिए जाएंगे।

हम सभ्यताओं के युद्ध में जी रहे हैं। 
हमको छोड़कर हर सभ्यता हमारी परम्पराओं को अपराध और हराम बताती है, और मूर्ति तथा मूर्तिपूजकों की समाप्ति को ही अपना परम् उद्देश्य मानती है।

उनकी तलवार हमारी गर्दन पर है... यही है हमारा आज का सत्य।
मैं यह नहीं कह रहा कि आप फलाँ दल को वोट दीजिये। 
मैं क्यों कहूँ? 
मैं बस यह कह रहा हूँ कि मत देते समय ध्यान रखिये कि मत अपने देश के लिए देना है। 

मत इसलिए देना है ताकि देश मे फिर कोई हत्यारा गुरु गोविंद सिंह जी के साहिबजादों को दीवाल में न चुनवा सके। 

मत इसलिए देना है ताकि फिर किसी बिरसा मुंडा को अपनी संस्कृति के लिए प्राण न देना पड़े।
मत इसलिए देना है ताकि फिर किसी पद्मावती को अग्नि में न उतरना पड़े। 

मत इसलिए देना है ताकि अयोध्या, मथुरा, काशी, कांची, पूरी, अवंतिका बनी रहे। 

मत इसलिए देना है ताकि हजार वर्षों बाद भी जब हमारा कोई बेटा इस मिट्टी को सूँघे तो उसे इस मिट्टी में हमारी गन्ध मिल सके। 

मत इसलिए देना है ताकि हमारा देश हमारा ही रहे। 
अपना देश रहेगा तभी हम रहेंगे।

खत्म होता इतिहास

आंख खोलकर पढ़िये....!!

ईशा की पांचवी सदी में शाही राजा खिंगल ने अफगानिस्तान के गर्देज स्थान पर महाविनायक की प्राण प्रतिष्ठा कराई थी। 
समय के साथ सभ्यता के ऊपर धूल चढ़ती गई और महाविनायक की प्रतिमा मिट्टी में कहीं दब गई।

युगों बाद खुदाई में जब वह प्रतिमा मिली तो उसे काबुल में "दरगाह पीर रतन नाथ" के पास स्थापित किया गया। दरगाह पीर रतन नाथ की कहानी किसी दूसरे दिन सुनाएंगे। 
आज कहानी महाविनायक की।

दो वर्ष पूर्व बिहार का एक युवक अफगानिस्तान में भारतीय दूतावास में नौकरी करने पहुँचा। 
स्वयं को यायावर कहने वाले उस युवक को अफगानिस्तान के प्राचीन महाविनायक के सम्बंध में पता था, सो वे महाविनायक के चिन्ह खोजने निकले। 
पर अफगानिस्तान में सनातन के चिन्ह जितने ही सुलभ हैं, उन्हें खोज लेना उतना ही दुर्लभ। 
कई दिनों नहीं कई महीनों के बाद उन्हें पीर रतन नाथ दरगाह का पता चला तो वे एक दिन पहुंचे तो एक ऐसा घर मिला जिसे भारत में मंदिर नहीं कह सकते। उस मंदिर में प्रतिमा स्थापित नहीं थी, बस रामायण महाभारत और गीता आदि पुस्तके रखी हुई थीं।

युवक ने सेवादार से जब महाविनायक की प्रतिमा के बारे में पूछा तो बुजुर्ग सेवादार आश्चर्य में डूब गया। क्या कोई दूर देश से मात्र एक प्रतिमा के लिए आया है? कौन है यह?
भावुक हो चुके सेवादार ने एक बन्द कमरे में रखी महाविनायक की प्रतिमा दिखाई... 
युगों बाद किसी ने श्रद्धा से महाविनायक को देखा, युगों बाद महाविनायक की प्रतिमा ने अपने किसी श्रद्धालु को वात्सल्य की दृष्टि से देखा। 
उस दिन युगों बाद किसी ने अभिशप्त महाविनायक के चरणों में प्रणाम किया, प्रतिमा पोंछी और बीस रुपये वाले माला से उनका श्रृंगार किया।

जानते हैं, ढाई हजार वर्ष पूर्व अफगानिस्तान के हर कण्ठ से वेदमन्त्र उच्चारित होते थे, 
गलियों में यज्ञध्रुम की सुगन्ध पसरी रहती थी। 
"वसुधैव कुटुंकम" की अवधारणा को जन्म देने वाली उस पूण्य भूमि पर सौ वर्ष पूर्व तक सनातन धर्म पूरी प्रतिष्ठा के साथ खड़ा था। 
पर आज का सत्य यह है कि अफगानिस्तान से महाविनायक पर लेख लिख कर जब उस युवक ने भारत भेजा तो पत्रिका के सम्पादक ने भय के मारे लेख में उनका नाम तक नहीं जोड़ा, कि कहीं उन्हें अफगानिस्तान में इसका दण्ड न भोगना पड़े।

सभ्यताओं के चिन्ह कैसे मरते हैं देखें। 
काबुल में एक अत्यंत प्राचीन तीर्थस्थल है 'आशा माई'। 
पस्तो प्रभाव के कारण वहां के लोग उस स्थान को 'कोही आस्माई' कहते थे, मतलब आशामाई की पहाड़ी। 
बीस वर्ष पूर्व सरकार ने उस पहाड़ी पर टेलीविजन का टावर लगा दिया, लोग धीरे धीरे उस स्थान को "कोही टेलीविजन" कहने लगे। 
आशामाई का नाम मिट गया।
काबुल में ही एक सड़क थी, देवगनाना रोड। 
देवगनाना संस्कृत के "देवगणानाम" का अपभ्रंस है। 
अब उस सड़क का नाम है, दे-अफ़ग़ान रोड। 
सभ्यता के चिन्ह ऐसे मरते हैं।

देश में लोकतंत्र का महापर्व चल रहा है। मत देना हमारा कर्तव्य भी है, और हमारी आवश्यकता भी। अपने घरों से निकलिए, और मत देते समय इतना अवश्य याद रखिए कि अब हमारे पास धरती का यही एक टुकड़ा है जहाँ हम अपनी परम्पराओं को निभा सकते हैं, महाविनायक की अर्चना कर सकते हैं। 
ऐसा ना हो कि सौ पचास वर्षों बाद किसी दूसरे Lalit Kumar को इसी तरह दिल्ली, आगरा, मथुरा या कानपुर में अपने चिन्ह खोजने आना पड़े। 
यकीन मानिए 200 वर्ष पहले काबुल के हिंदुओं ने भी ऐसा नहीं सोचा होगा कि 200 वर्ष बाद हमारा कोई बच्चा जब काबुल आएगा तो उसे अपने पूर्वजों के चिन्ह इस दशा में मिलेंगे। 
1946 ईस्वी तक सिंध के लोगों ने यह नहीं सोचा होगा कि पचास वर्ष बाद ही उनसे उनकी सम्पति, उनका धर्म, उनकी बेटियां, उनके बेटे सबकुछ छीन लिए जाएंगे।

हम सभ्यताओं के युद्ध में जी रहे हैं। 
हमको छोड़कर हर सभ्यता हमारी परम्पराओं को अपराध और हराम बताती है, और मूर्ति तथा मूर्तिपूजकों की समाप्ति को ही अपना परम् उद्देश्य मानती है।

उनकी तलवार हमारी गर्दन पर है... यही है हमारा आज का सत्य।
मैं यह नहीं कह रहा कि आप फलाँ दल को वोट दीजिये। 
मैं क्यों कहूँ? 
मैं बस यह कह रहा हूँ कि मत देते समय ध्यान रखिये कि मत अपने देश के लिए देना है। 

मत इसलिए देना है ताकि देश मे फिर कोई हत्यारा गुरु गोविंद सिंह जी के साहिबजादों को दीवाल में न चुनवा सके। 

मत इसलिए देना है ताकि फिर किसी बिरसा मुंडा को अपनी संस्कृति के लिए प्राण न देना पड़े।
मत इसलिए देना है ताकि फिर किसी पद्मावती को अग्नि में न उतरना पड़े। 

मत इसलिए देना है ताकि अयोध्या, मथुरा, काशी, कांची, पूरी, अवंतिका बनी रहे। 

मत इसलिए देना है ताकि हजार वर्षों बाद भी जब हमारा कोई बेटा इस मिट्टी को सूँघे तो उसे इस मिट्टी में हमारी गन्ध मिल सके। 

मत इसलिए देना है ताकि हमारा देश हमारा ही रहे। 
अपना देश रहेगा तभी हम रहेंगे।

#butterflies #fitness #mondayvibes #mondaymotivation #food #fitnessmotivation #viratkohlifanpage #wellness #hinduism #history

शनिवार, 4 अप्रैल 2026

मोदीजी के खिलाफ षड्यंत्र

कोई नहीं जानता है कि *ये देश जस्टिस एमबी सोनी का भी कर्जदार है।*

नरेंद्र मोदी को जेल मे सड़ाने की प्लानिंग किसकी थी...?

और इस षड्यंत्र से कैसे नरेंद्र मोदी बच सके...?

*_षड्यंत्र कितने खतरनाक!!!😳_*

*_आप अंदाज नहीं लगा सकते!!!🫣_*

*_अगर वो सफल हो जाते!!! तो हम क्या खो देते...?_*
*_और नरेंद्र मोदी का हश्र क्या होता...?_*

कांग्रेस राज में कोई भी केस सुप्रीम कोर्ट में जाने के पहले ही सब कुछ मैनेज हो जाता था।

कि केस किस जज की बेंच में जायेगा और वो जज क्या फैसला देंगे...

कांग्रेस की 70 सालों की सफलता का यही सबसे बड़ा राज ये है कि, उसने मीडिया और न्यायपालिका सबको मैनेज करके अपना राज स्थापित किया।

गुजरात हाईकोर्ट के रिटायर जज जस्टिस एमबी सोनी ने इसका खुलासा तब किया, जब उन्होंने पाया की गुजरात दंगो के सम्बन्धित कोई भी याचिका, जो तीस्ता सीतलवाड सुप्रीम कोर्ट में दायर करती है वो सिर्फ जस्टिस आफताब आलम के बेंच में ही क्यों जाती है, जबकि रोस्टर के अनुसार वो किसी और के बेंच में जानी चाहिए थी।

फिर उन्होंने और तहकीकात की तो पता चला कि रजिस्ट्रार को ऊपर से आदेश था कि तीस्ता का केस जस्टिस आफ़ताब आलम के बेंच में ही भेजा जाए और इसके लिए मस्टर रोल और रोस्टर को बदल दिया जाये।

फिर उन्होंने और तहकीकात की तो पता चला कि....

जस्टिस आफताब आलम की सगी बेटी अरुसा आलम, तीस्ता के एनजीओ सबरंग में पार्टनर है और...

उस समय के केबिनेट मंत्री और सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल की पत्नी भी उसी एनजीओ में है...

यह सब जानकर उन्होंने इसके खिलाफ चीफ जस्टिस को पत्र भेजा, और जस्टिस आफ़ताब आलम, कांग्रेस नेता और हिमाचल के मुख्यमंत्री की बेटी (जस्टिस अभिलाषा कुमारी) के 10 फैसलों की बकायदा आठ हजार पन्नों में विस्तृत बिवेचना करके भेजी....

और कहा कि इन लोगों ने खुलेआम न्यायव्यवस्था का बलात्कार किया है।

इसके बाद ही इस गैंग को गुजरात के हर एक मामले से अलग किया गया।

*_अगर जस्टिस एम बी सोनी नहीं होते तो कांग्रेस सरकार नरेंद्र मोदी को दंगों के मामलों में फंसाने की पूरी प्लानिंग कर चुकी थी।_*

*क्या कभी आपने राहुल गांधी, लालू यादव, सीताराम येचुरी, मायावती, अखिलेश, ममता, महबूबा, और विपक्ष के नेताओं को एक दूसरे को चोर बोलते सुना है...?🤔*

नहीं ना...🤨

*जबकि इनमें से कुछ को सजा भी हो चुकी है, कोई जेल में है, कोई बेल पर है और कुछ पर कोर्ट में मुकदमे है !*

*मगर ये लोग एक दूसरे को चोर कभी नहीं बोलते? परन्तु मोदी पर कोई भी आधिकारिक आरोप नहीं है, कोई FIR नहीं है, कोई मुकदमा भी नहीं चल रहा है और किसी कोर्ट ने किसी जाँच का आदेश भी नहीं दिया, उसे ये चोर बोलते हैं?*

*_हिमाद्रि तुंग शृंग से प्रबुद्ध शुद्ध भारती।।_*

*_स्वयं प्रभा समुज्ज्वला स्वतंत्रता पुकारती।।_*

*_अमर्त्य वीर पुत्र हो, दृढ़- प्रतिज्ञ सोच लो।।_*

*_प्रशस्त पुण्य पंथ है, बढ़े चलो, बढ़े चलो।।_*

*_-साभार 🙏_*

पुस्तकों के अंश

महात्मा गांधी के यौन जीवन की अनकही कहानी। (अपनी पोती (मनु) और अन्य महिलाओं के साथ नग्न सोते थे।)

लंदन के प्रतिष्ठित अखबार "द टाइम्स" के अनुसार, 82 वर्षीय गांधीवादी इतिहासकार कुसुम वदगामा, जो कभी गांधी को भगवान की तरह पूजती थीं, ने कहा कि गांधी को यौन की बुरी लत थी और वे आश्रम में कई महिलाओं के साथ नग्न सोते थे।
वे इतने कामुक थे कि ब्रह्मचर्य के प्रयोग और संयम की परीक्षा के बहाने उन्होंने अपने चाचा अमृतलाल तुलसीदास गांधी की पोती और जयसुखलाल की बेटी मनुबेन गांधी के साथ सोना शुरू कर दिया।
ये आरोप बहुत सनसनीखेज हैं क्योंकि कुसुम अपनी किशोरावस्था में गांधी की अनुयायी भी रही हैं। प्रसिद्ध ब्रिटिश इतिहासकार जेड एडम्स ने पंद्रह वर्षों के गहन अध्ययन और शोध के बाद 2010 में "गांधी: नेकेड एम्बिशन" लिखकर सनसनी मचा दी थी।

किताब में गांधी को असामान्य यौन व्यवहार वाला एक 'सेमी-रिप्रेस्ड सेक्स-मेनियाक' (अर्ध-दमित यौन-उन्मादी) कहा गया है। यह पुस्तक राष्ट्रपिता के जीवन में आने वाली लड़कियों के साथ उनके अंतरंग और मधुर संबंधों पर विशेष प्रकाश डालती है।
उदाहरण के लिए, गांधी लड़कियों और महिलाओं के साथ नग्न सोते थे और नग्न स्नान भी करते थे। देश के सबसे सम्मानित लाइब्रेरियन गिरिजा कुमार ने गांधी से संबंधित दस्तावेजों के गहन अध्ययन और शोध के बाद डेढ़ दर्जन महिलाओं का विवरण दिया है।

जो 2006 में "ब्रह्मचर्य गांधी एंड हिज विमेन एसोसिएट्स" में ब्रह्मचारी सहयोगी थीं। वे गांधी के साथ नग्न सोती थीं, उन्हें स्नान कराती थीं और मालिश करती थीं। इनमें मनु, आभा गांधी, आभा की बहन बीना पटेल, सुशीला नैयर, प्रभावती (जयप्रकाश नारायण की पत्नी), राजकुमारी अमृत कौर,
बीबी अमतुसलाम, लीलावती असर, प्रेमाभन कंटक, मिली ग्राहम पोलक, कंचन शाह, रेहाना तैयबजी शामिल हैं। प्रभावती अपने पति जेपी को छोड़कर आश्रम में रहने चली आई थीं। इस कारण जेपी का गांधी से विशेष विवाद भी हुआ था।

निर्मल कुमार बोस, जो लगभग दो दशकों तक महात्मा गांधी के निजी सहायक थे, ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक "माय डेज विद गांधी" में राष्ट्रपिता के आश्रम की महिलाओं के साथ नग्न सोने और अपने आत्म-नियंत्रण के परीक्षण के लिए मालिश करवाने का उल्लेख किया है।
नोआखली की एक विशेष घटना का जिक्र करते हुए निर्मल बोस ने लिखा, "एक सुबह जब मैं गांधी के बेडरूम में पहुँचा, तो मैंने सुशीला नैयर को रोते हुए और महात्मा को दीवार पर अपना सिर पटकते हुए देखा।"
उसके बाद बोस ने गांधी के ब्रह्मचर्य के अभ्यास का खुलकर विरोध किया। जब गांधी ने उनकी बात नहीं मानी, तो बोस ने खुद को उनसे अलग कर लिया।

एडम्स के अनुसार, गांधी ने स्वयं लिखा है, जब सुशीला स्नान करते समय मेरे सामने नग्न होती हैं, तो मेरी आँखें कसकर बंद हो जाती हैं। मुझे कुछ दिखाई नहीं देता। मुझे केवल साबुन लगाने की आवाज सुनाई देती है। मुझे अंदाज़ा नहीं होता कि वह कब पूरी तरह नग्न है और कब वह सिर्फ अपने अंडरवियर में है।
दरअसल, जब पंचगनी में गांधी के महिलाओं के साथ नग्न सोने की बात फैलने लगी, तो वहाँ नाथूराम गोडसे के नेतृत्व में विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए। इसके कारण गांधी को प्रयोग रोकना पड़ा और वहाँ से अपना बोरिया-बिस्तर समेटना पड़ा।

बाद में, गांधी हत्या के मुकदमे के दौरान, गोडसे के विरोध को गांधी की हत्या के कई प्रयासों में से एक माना गया।
एडम्स का दावा है कि सुशीला, मनु, आभा और अन्य महिलाएं जो गांधी के साथ सोती थीं, उन्होंने हमेशा गांधी के साथ अपने शारीरिक संबंधों के बारे में अस्पष्ट और गोलमोल बातें कीं। जब भी उनसे पूछा गया, उन्होंने केवल यही कहा कि यह सब ब्रह्मचर्य के सिद्धांतों का अभिन्न अंग था।
गांधी की हत्या के बाद उनके यौन प्रयोगों को भी लंबे समय तक दबा दिया गया। उन्हें महिमामंडित करने और राष्ट्रपिता बनाने के लिए उन दस्तावेजों, तथ्यों और सबूतों को नष्ट कर दिया गया, जो यह साबित कर सकते थे कि संत गांधी, वास्तव में, एक 'सेक्स-मेनियाक' थे।

कांग्रेस भी स्वार्थवश गांधी के यौन-प्रयोग से जुड़े सच को छुपाती रही है। गांधी की हत्या के बाद मनु को अपना मुंह बंद रखने का सख्त निर्देश दिया गया था। उन्हें गुजरात के एक बहुत ही दूरदराज के इलाके में भेज दिया गया था।
सुशीला भी इस मुद्दे पर हमेशा चुप रहीं। सबसे दुखद बात यह है कि गांधी के ब्रह्मचर्य के प्रयोग में शामिल लगभग सभी महिलाओं का वैवाहिक जीवन बर्बाद हो गया।

एक ब्रिटिश इतिहासकार के अनुसार, जवाहरलाल नेहरू गांधी को उनके ब्रह्मचर्य के कारण एक अप्राकृतिक और असामान्य व्यक्ति मानते थे। सरदार पटेल और जे.बी. कृपलानी ने उनके व्यवहार के कारण उनसे दूरी बना ली थी।
गिरिजा कुमार के अनुसार, पटेल ने गांधी के ब्रह्मचर्य को अधर्म कहना शुरू कर दिया था। यहाँ तक कि बेटे देवदास गांधी सहित परिवार के सदस्य और अन्य राजनीतिक सहयोगी भी नाराज थे।

बी.आर. अंबेडकर, विनोबा भावे, डी.बी. केलकर, छगनलाल जोशी, किशोरलाल मशरूवाला, मथुरादास त्रिकुमजी, वेद मेहता, आर.पी. परशुराम, जयप्रकाश नारायण भी गांधी के ब्रह्मचर्य के प्रयोग का खुलकर विरोध कर रहे थे।
अब तक बापू की छवि गोल फ्रेम का चश्मा पहने एक ऐसे बूढ़े व्यक्ति की रही है, जो दो युवतियों को लाठी के सहारे की तरह इस्तेमाल करते हुए घूमते हैं। अंतिम समय तक गांधी ऐसे ही राजसी वातावरण में रहे।
साभार 

गुरुवार, 2 अप्रैल 2026

युद्ध जीतकर भी हार गए

1971 की लड़ाई में इंदिरा गांधी की तारीफ तो हम सब करते हैं, लेकिन पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी के संसद में दिए उस धमाकेदार बयान को पढ़ना जरूरी है, जो शिमला समझौते की सच्चाई उजागर करता है।

युद्ध की पृष्ठभूमि
1971 के युद्ध में पाकिस्तान के 93,000 से अधिक सैनिक भारतीय कैद में थे, जिनमें 3,000 से ज्यादा अधिकारी शामिल थे।

भारतीय सेना ने सिंध के थारपारकर जिले के बड़े हिस्से पर कब्जा कर लिया था और उसे गुजरात का नया जिला घोषित करने की घोषणा की थी।

मुजफ्फराबाद में भी तिरंगा फहराया गया था, लेकिन ये सारी जीत मैदान में हुई—मेज पर कुछ और ही हुआ।

शिमला समझौते का खेल
जुल्फिकार अली भुट्टो अपनी बेटी बेनजीर भुट्टो को लेकर शिमला आए, जहां इंदिरा गांधी ने कश्मीर की मांग रखी—93000 सैनिकों के बदले कश्मीर दो।

 भुट्टो ने साफ इनकार कर दिया: "कश्मीर नहीं देंगे, सैनिक रख लो।" जिनेवा कन्वेंशन के तहत युद्धबंदियों की गरिमा बनाए रखना भारत पर था, जिसका बोझ इंदिरा नहीं झेल सकीं।

भुट्टो की कूटनीति
भुट्टो ने बेनजीर से कहा कि भारत की कमर टूट चुकी—शरणार्थियों का बोझ, अर्थव्यवस्था चरमराई, 93000 सैनिक पालना असंभव।

 उन्होंने इंदिरा को घेर लिया, जैसे सांप के गले में छछूंदर फंस जाए। पुपुल जयकर और कुलदीप नैयर की किताबों में लिखा है कि इंदिरा के पास कूटनीतिक दांव का ज्ञान नहीं था, वो मौके चूक गईं।

समझौते का नतीजा
शिमला समझौते (1972) में इंदिरा ने कश्मीर मुद्दा द्विपक्षीय रखा, 93000 पाक सैनिक लौटा दिए, थारपारकर (जहां 1971 में हिंदू बहुल आबादी थी) पाकिस्तान को वापस कर दिया।

 भारत के 54-56 सैनिक पाक जेलों में, मरते रहे।

सेना प्रमुख का गुस्सा
तत्कालीन सेना प्रमुख ने रिटायरमेंट के बाद किताब में लिखा: "मैदान में हम जीते, लेकिन राजनेताओं ने मेज पर हरा दिया—वो इंदिरा गांधी थीं।"

 आसिफ जरदारी ने संसद में कहा कि भुट्टो ने इंदिरा से जमीन वापस ले ली, जबकि 90,000 कैदी भारत के पास थे।

कांग्रेस का इतिहास यही बताता है—युद्ध जीता, लेकिन कूटनीति में बर्बादी। ये दमदार सबक है कि ताकत मैदान तक सीमित न रहे।

खड़गे का नीच बयान

आंख खोलकर पढ़िये....!! ईशा की पांचवी सदी में शाही राजा खिंगल ने अफगानिस्तान के गर्देज स्थान पर महाविनायक की प्राण प्रतिष्ठा कराई थी।  समय के ...