रविवार, 12 अप्रैल 2026

वीर सावरकर / नेहरू

पहली तस्वीर स्वतंत्रवीर सावरकर की है, जिसे बीबीसी ने 1924 में खींचा था।

यह तस्वीर 14 वर्षों की अमानवीय और यातनापूर्ण "काला पानी" जेल से रिहाई के बाद ली गई थी।

तस्वीर में उनके हाथों में हथकड़ी और पैरों में बेड़ियां हैं।

अंडमान की सेलुलर जेल से रिहा होने के बाद, अंग्रेजों ने उन्हें अगले 13 वर्षों तक नजरबंद रखा।

दूसरी तस्वीर चिचा लेहरू की है - उनके हाथों में भी हथकड़ी है।

देश के लाल

जब 11 जनवरी 1966 की रात ताशकंद में लाल बहादुर शास्त्री जी की मौत हुई 😢🇮🇳, तो पूरा देश सदमे में था।

 लेकिन असली 'तमाशा' तो तब हुआ जब उनकी मौत के बाद उनकी संपत्ति का हिसाब लगाया गया।

लोग हैरान थे कि वह शख्स जो देश का 'प्रधान' था 👑, जो करोड़ों के बजट और फाइलों पर हस्ताक्षर करता था 📑✍️, उसने अपने पीछे क्या वसीयत छोड़ी है? 🤔

लेकिन जब अलमारियां और बैंक खाते देखे गए 🏦, तो सबकी आंखों में आंसू आ गए 😢:
कोई बंगला नहीं: दिल्ली की कोठियों में रहने वाले नेता के नाम अपनी एक इंच जमीन नहीं थी। 🏠❌

पुराना फटा कुर्ता: उनकी अलमारी में बस कुछ जोड़ी खादी के कुर्ते मिले 👕, जिनमें से कुछ तो फटे हुए थे जिन्हें उनकी पत्नी ललिता शास्त्री जी ने रफू (Stitch) किया था 🪡🧵।
बैंक बैलेंस 00.00: उनके खाते में इतने पैसे भी नहीं थे कि एक पुरानी कार की किश्त (EMI) चुकाई जा सके 💸❌।

हैरानी की बात जानते हैं? 😲 शास्त्री जी ने बच्चों के कहने पर एक  'फिएट कार' (Fiat Car) 🚗 लोन लेकर खरीदी थी। उनकी मृत्यु के बाद उस कार का 5,000 रुपये का कर्ज बाकी था 💔, जिसे बाद में उनकी पत्नी ने अपनी पेंशन के पैसों से तिल-तिल कर चुकाया।

जिस इंसान के एक इशारे पर पूरा देश "एक वक्त का उपवास" (Fast) रखने लगा था 🙏, उस इंसान ने अपने बच्चों के लिए विरासत में एक 'सिक्का' तक नहीं छोड़ा 🤲✨।

आज हम छोटी सी नौकरी पाकर या थोड़ा सा पैसा कमाकर घमंड में चूर हो जाते हैं 😔💭। लेकिन शास्त्री जी ने सिखाया कि "पद और प्रतिष्ठा से इंसान बड़ा नहीं होता, चरित्र से होता है।" 💡🪞

वो चाहते तो अरबों की संपत्ति बना सकते थे 💰, लेकिन उन्होंने 'ईमानदारी' को अपनी संपत्ति चुना 🤍✨। आज के दौर में जहाँ भ्रष्टाचार और दिखावा चरम पर है ⚠️, क्या हमें ऐसे नेताओं की याद नहीं आती? ❤️🇮🇳

इस 'नन्हे' कद वाले महान इंसान की सादगी को एक 'नमन' तो बनता है! 🙏🚩

इस पोस्ट को इतना शेयर करो कि आज के 'दिखावे' वाले समाज को अपनी असलियत का आईना दिखे 📲🔥।
क्या आपको लगता है कि आज के दौर में ऐसा नेता मिलना मुमकिन है? 🤔💭
हाँ (Yes) 👍 / नहीं (No) 👎 कमेंट में अपनी राय दें।

🚩 नोट: यह जानकारी विभिन्न ऐतिहासिक स्रोतों और प्रचलित कथनों पर आधारित है 📚। हमारा उद्देश्य किसी भी व्यक्ति या नेता की तुलना करना नहीं है 🙏, बल्कि केवल Lal Bahadur Shastri जी के सादगीपूर्ण जीवन और ईमानदारी को सम्मान देना है ❤️🇮🇳

बुधवार, 8 अप्रैल 2026

खड़गे का नीच बयान

आंख खोलकर पढ़िये....!!

ईशा की पांचवी सदी में शाही राजा खिंगल ने अफगानिस्तान के गर्देज स्थान पर महाविनायक की प्राण प्रतिष्ठा कराई थी। 
समय के साथ सभ्यता के ऊपर धूल चढ़ती गई और महाविनायक की प्रतिमा मिट्टी में कहीं दब गई।

युगों बाद खुदाई में जब वह प्रतिमा मिली तो उसे काबुल में "दरगाह पीर रतन नाथ" के पास स्थापित किया गया। दरगाह पीर रतन नाथ की कहानी किसी दूसरे दिन सुनाएंगे। 
आज कहानी महाविनायक की।

दो वर्ष पूर्व बिहार का एक युवक अफगानिस्तान में भारतीय दूतावास में नौकरी करने पहुँचा। 
स्वयं को यायावर कहने वाले उस युवक को अफगानिस्तान के प्राचीन महाविनायक के सम्बंध में पता था, सो वे महाविनायक के चिन्ह खोजने निकले। 
पर अफगानिस्तान में सनातन के चिन्ह जितने ही सुलभ हैं, उन्हें खोज लेना उतना ही दुर्लभ। 
कई दिनों नहीं कई महीनों के बाद उन्हें पीर रतन नाथ दरगाह का पता चला तो वे एक दिन पहुंचे तो एक ऐसा घर मिला जिसे भारत में मंदिर नहीं कह सकते। उस मंदिर में प्रतिमा स्थापित नहीं थी, बस रामायण महाभारत और गीता आदि पुस्तके रखी हुई थीं।

युवक ने सेवादार से जब महाविनायक की प्रतिमा के बारे में पूछा तो बुजुर्ग सेवादार आश्चर्य में डूब गया। क्या कोई दूर देश से मात्र एक प्रतिमा के लिए आया है? कौन है यह?
भावुक हो चुके सेवादार ने एक बन्द कमरे में रखी महाविनायक की प्रतिमा दिखाई... 
युगों बाद किसी ने श्रद्धा से महाविनायक को देखा, युगों बाद महाविनायक की प्रतिमा ने अपने किसी श्रद्धालु को वात्सल्य की दृष्टि से देखा। 
उस दिन युगों बाद किसी ने अभिशप्त महाविनायक के चरणों में प्रणाम किया, प्रतिमा पोंछी और बीस रुपये वाले माला से उनका श्रृंगार किया।

जानते हैं, ढाई हजार वर्ष पूर्व अफगानिस्तान के हर कण्ठ से वेदमन्त्र उच्चारित होते थे, 
गलियों में यज्ञध्रुम की सुगन्ध पसरी रहती थी। 
"वसुधैव कुटुंकम" की अवधारणा को जन्म देने वाली उस पूण्य भूमि पर सौ वर्ष पूर्व तक सनातन धर्म पूरी प्रतिष्ठा के साथ खड़ा था। 
पर आज का सत्य यह है कि अफगानिस्तान से महाविनायक पर लेख लिख कर जब उस युवक ने भारत भेजा तो पत्रिका के सम्पादक ने भय के मारे लेख में उनका नाम तक नहीं जोड़ा, कि कहीं उन्हें अफगानिस्तान में इसका दण्ड न भोगना पड़े।

सभ्यताओं के चिन्ह कैसे मरते हैं देखें। 
काबुल में एक अत्यंत प्राचीन तीर्थस्थल है 'आशा माई'। 
पस्तो प्रभाव के कारण वहां के लोग उस स्थान को 'कोही आस्माई' कहते थे, मतलब आशामाई की पहाड़ी। 
बीस वर्ष पूर्व सरकार ने उस पहाड़ी पर टेलीविजन का टावर लगा दिया, लोग धीरे धीरे उस स्थान को "कोही टेलीविजन" कहने लगे। 
आशामाई का नाम मिट गया।
काबुल में ही एक सड़क थी, देवगनाना रोड। 
देवगनाना संस्कृत के "देवगणानाम" का अपभ्रंस है। 
अब उस सड़क का नाम है, दे-अफ़ग़ान रोड। 
सभ्यता के चिन्ह ऐसे मरते हैं।

देश में लोकतंत्र का महापर्व चल रहा है। मत देना हमारा कर्तव्य भी है, और हमारी आवश्यकता भी। अपने घरों से निकलिए, और मत देते समय इतना अवश्य याद रखिए कि अब हमारे पास धरती का यही एक टुकड़ा है जहाँ हम अपनी परम्पराओं को निभा सकते हैं, महाविनायक की अर्चना कर सकते हैं। 
ऐसा ना हो कि सौ पचास वर्षों बाद किसी दूसरे Lalit Kumar को इसी तरह दिल्ली, आगरा, मथुरा या कानपुर में अपने चिन्ह खोजने आना पड़े। 
यकीन मानिए 200 वर्ष पहले काबुल के हिंदुओं ने भी ऐसा नहीं सोचा होगा कि 200 वर्ष बाद हमारा कोई बच्चा जब काबुल आएगा तो उसे अपने पूर्वजों के चिन्ह इस दशा में मिलेंगे। 
1946 ईस्वी तक सिंध के लोगों ने यह नहीं सोचा होगा कि पचास वर्ष बाद ही उनसे उनकी सम्पति, उनका धर्म, उनकी बेटियां, उनके बेटे सबकुछ छीन लिए जाएंगे।

हम सभ्यताओं के युद्ध में जी रहे हैं। 
हमको छोड़कर हर सभ्यता हमारी परम्पराओं को अपराध और हराम बताती है, और मूर्ति तथा मूर्तिपूजकों की समाप्ति को ही अपना परम् उद्देश्य मानती है।

उनकी तलवार हमारी गर्दन पर है... यही है हमारा आज का सत्य।
मैं यह नहीं कह रहा कि आप फलाँ दल को वोट दीजिये। 
मैं क्यों कहूँ? 
मैं बस यह कह रहा हूँ कि मत देते समय ध्यान रखिये कि मत अपने देश के लिए देना है। 

मत इसलिए देना है ताकि देश मे फिर कोई हत्यारा गुरु गोविंद सिंह जी के साहिबजादों को दीवाल में न चुनवा सके। 

मत इसलिए देना है ताकि फिर किसी बिरसा मुंडा को अपनी संस्कृति के लिए प्राण न देना पड़े।
मत इसलिए देना है ताकि फिर किसी पद्मावती को अग्नि में न उतरना पड़े। 

मत इसलिए देना है ताकि अयोध्या, मथुरा, काशी, कांची, पूरी, अवंतिका बनी रहे। 

मत इसलिए देना है ताकि हजार वर्षों बाद भी जब हमारा कोई बेटा इस मिट्टी को सूँघे तो उसे इस मिट्टी में हमारी गन्ध मिल सके। 

मत इसलिए देना है ताकि हमारा देश हमारा ही रहे। 
अपना देश रहेगा तभी हम रहेंगे।

खत्म होता इतिहास

आंख खोलकर पढ़िये....!!

ईशा की पांचवी सदी में शाही राजा खिंगल ने अफगानिस्तान के गर्देज स्थान पर महाविनायक की प्राण प्रतिष्ठा कराई थी। 
समय के साथ सभ्यता के ऊपर धूल चढ़ती गई और महाविनायक की प्रतिमा मिट्टी में कहीं दब गई।

युगों बाद खुदाई में जब वह प्रतिमा मिली तो उसे काबुल में "दरगाह पीर रतन नाथ" के पास स्थापित किया गया। दरगाह पीर रतन नाथ की कहानी किसी दूसरे दिन सुनाएंगे। 
आज कहानी महाविनायक की।

दो वर्ष पूर्व बिहार का एक युवक अफगानिस्तान में भारतीय दूतावास में नौकरी करने पहुँचा। 
स्वयं को यायावर कहने वाले उस युवक को अफगानिस्तान के प्राचीन महाविनायक के सम्बंध में पता था, सो वे महाविनायक के चिन्ह खोजने निकले। 
पर अफगानिस्तान में सनातन के चिन्ह जितने ही सुलभ हैं, उन्हें खोज लेना उतना ही दुर्लभ। 
कई दिनों नहीं कई महीनों के बाद उन्हें पीर रतन नाथ दरगाह का पता चला तो वे एक दिन पहुंचे तो एक ऐसा घर मिला जिसे भारत में मंदिर नहीं कह सकते। उस मंदिर में प्रतिमा स्थापित नहीं थी, बस रामायण महाभारत और गीता आदि पुस्तके रखी हुई थीं।

युवक ने सेवादार से जब महाविनायक की प्रतिमा के बारे में पूछा तो बुजुर्ग सेवादार आश्चर्य में डूब गया। क्या कोई दूर देश से मात्र एक प्रतिमा के लिए आया है? कौन है यह?
भावुक हो चुके सेवादार ने एक बन्द कमरे में रखी महाविनायक की प्रतिमा दिखाई... 
युगों बाद किसी ने श्रद्धा से महाविनायक को देखा, युगों बाद महाविनायक की प्रतिमा ने अपने किसी श्रद्धालु को वात्सल्य की दृष्टि से देखा। 
उस दिन युगों बाद किसी ने अभिशप्त महाविनायक के चरणों में प्रणाम किया, प्रतिमा पोंछी और बीस रुपये वाले माला से उनका श्रृंगार किया।

जानते हैं, ढाई हजार वर्ष पूर्व अफगानिस्तान के हर कण्ठ से वेदमन्त्र उच्चारित होते थे, 
गलियों में यज्ञध्रुम की सुगन्ध पसरी रहती थी। 
"वसुधैव कुटुंकम" की अवधारणा को जन्म देने वाली उस पूण्य भूमि पर सौ वर्ष पूर्व तक सनातन धर्म पूरी प्रतिष्ठा के साथ खड़ा था। 
पर आज का सत्य यह है कि अफगानिस्तान से महाविनायक पर लेख लिख कर जब उस युवक ने भारत भेजा तो पत्रिका के सम्पादक ने भय के मारे लेख में उनका नाम तक नहीं जोड़ा, कि कहीं उन्हें अफगानिस्तान में इसका दण्ड न भोगना पड़े।

सभ्यताओं के चिन्ह कैसे मरते हैं देखें। 
काबुल में एक अत्यंत प्राचीन तीर्थस्थल है 'आशा माई'। 
पस्तो प्रभाव के कारण वहां के लोग उस स्थान को 'कोही आस्माई' कहते थे, मतलब आशामाई की पहाड़ी। 
बीस वर्ष पूर्व सरकार ने उस पहाड़ी पर टेलीविजन का टावर लगा दिया, लोग धीरे धीरे उस स्थान को "कोही टेलीविजन" कहने लगे। 
आशामाई का नाम मिट गया।
काबुल में ही एक सड़क थी, देवगनाना रोड। 
देवगनाना संस्कृत के "देवगणानाम" का अपभ्रंस है। 
अब उस सड़क का नाम है, दे-अफ़ग़ान रोड। 
सभ्यता के चिन्ह ऐसे मरते हैं।

देश में लोकतंत्र का महापर्व चल रहा है। मत देना हमारा कर्तव्य भी है, और हमारी आवश्यकता भी। अपने घरों से निकलिए, और मत देते समय इतना अवश्य याद रखिए कि अब हमारे पास धरती का यही एक टुकड़ा है जहाँ हम अपनी परम्पराओं को निभा सकते हैं, महाविनायक की अर्चना कर सकते हैं। 
ऐसा ना हो कि सौ पचास वर्षों बाद किसी दूसरे Lalit Kumar को इसी तरह दिल्ली, आगरा, मथुरा या कानपुर में अपने चिन्ह खोजने आना पड़े। 
यकीन मानिए 200 वर्ष पहले काबुल के हिंदुओं ने भी ऐसा नहीं सोचा होगा कि 200 वर्ष बाद हमारा कोई बच्चा जब काबुल आएगा तो उसे अपने पूर्वजों के चिन्ह इस दशा में मिलेंगे। 
1946 ईस्वी तक सिंध के लोगों ने यह नहीं सोचा होगा कि पचास वर्ष बाद ही उनसे उनकी सम्पति, उनका धर्म, उनकी बेटियां, उनके बेटे सबकुछ छीन लिए जाएंगे।

हम सभ्यताओं के युद्ध में जी रहे हैं। 
हमको छोड़कर हर सभ्यता हमारी परम्पराओं को अपराध और हराम बताती है, और मूर्ति तथा मूर्तिपूजकों की समाप्ति को ही अपना परम् उद्देश्य मानती है।

उनकी तलवार हमारी गर्दन पर है... यही है हमारा आज का सत्य।
मैं यह नहीं कह रहा कि आप फलाँ दल को वोट दीजिये। 
मैं क्यों कहूँ? 
मैं बस यह कह रहा हूँ कि मत देते समय ध्यान रखिये कि मत अपने देश के लिए देना है। 

मत इसलिए देना है ताकि देश मे फिर कोई हत्यारा गुरु गोविंद सिंह जी के साहिबजादों को दीवाल में न चुनवा सके। 

मत इसलिए देना है ताकि फिर किसी बिरसा मुंडा को अपनी संस्कृति के लिए प्राण न देना पड़े।
मत इसलिए देना है ताकि फिर किसी पद्मावती को अग्नि में न उतरना पड़े। 

मत इसलिए देना है ताकि अयोध्या, मथुरा, काशी, कांची, पूरी, अवंतिका बनी रहे। 

मत इसलिए देना है ताकि हजार वर्षों बाद भी जब हमारा कोई बेटा इस मिट्टी को सूँघे तो उसे इस मिट्टी में हमारी गन्ध मिल सके। 

मत इसलिए देना है ताकि हमारा देश हमारा ही रहे। 
अपना देश रहेगा तभी हम रहेंगे।

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शनिवार, 4 अप्रैल 2026

मोदीजी के खिलाफ षड्यंत्र

कोई नहीं जानता है कि *ये देश जस्टिस एमबी सोनी का भी कर्जदार है।*

नरेंद्र मोदी को जेल मे सड़ाने की प्लानिंग किसकी थी...?

और इस षड्यंत्र से कैसे नरेंद्र मोदी बच सके...?

*_षड्यंत्र कितने खतरनाक!!!😳_*

*_आप अंदाज नहीं लगा सकते!!!🫣_*

*_अगर वो सफल हो जाते!!! तो हम क्या खो देते...?_*
*_और नरेंद्र मोदी का हश्र क्या होता...?_*

कांग्रेस राज में कोई भी केस सुप्रीम कोर्ट में जाने के पहले ही सब कुछ मैनेज हो जाता था।

कि केस किस जज की बेंच में जायेगा और वो जज क्या फैसला देंगे...

कांग्रेस की 70 सालों की सफलता का यही सबसे बड़ा राज ये है कि, उसने मीडिया और न्यायपालिका सबको मैनेज करके अपना राज स्थापित किया।

गुजरात हाईकोर्ट के रिटायर जज जस्टिस एमबी सोनी ने इसका खुलासा तब किया, जब उन्होंने पाया की गुजरात दंगो के सम्बन्धित कोई भी याचिका, जो तीस्ता सीतलवाड सुप्रीम कोर्ट में दायर करती है वो सिर्फ जस्टिस आफताब आलम के बेंच में ही क्यों जाती है, जबकि रोस्टर के अनुसार वो किसी और के बेंच में जानी चाहिए थी।

फिर उन्होंने और तहकीकात की तो पता चला कि रजिस्ट्रार को ऊपर से आदेश था कि तीस्ता का केस जस्टिस आफ़ताब आलम के बेंच में ही भेजा जाए और इसके लिए मस्टर रोल और रोस्टर को बदल दिया जाये।

फिर उन्होंने और तहकीकात की तो पता चला कि....

जस्टिस आफताब आलम की सगी बेटी अरुसा आलम, तीस्ता के एनजीओ सबरंग में पार्टनर है और...

उस समय के केबिनेट मंत्री और सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल की पत्नी भी उसी एनजीओ में है...

यह सब जानकर उन्होंने इसके खिलाफ चीफ जस्टिस को पत्र भेजा, और जस्टिस आफ़ताब आलम, कांग्रेस नेता और हिमाचल के मुख्यमंत्री की बेटी (जस्टिस अभिलाषा कुमारी) के 10 फैसलों की बकायदा आठ हजार पन्नों में विस्तृत बिवेचना करके भेजी....

और कहा कि इन लोगों ने खुलेआम न्यायव्यवस्था का बलात्कार किया है।

इसके बाद ही इस गैंग को गुजरात के हर एक मामले से अलग किया गया।

*_अगर जस्टिस एम बी सोनी नहीं होते तो कांग्रेस सरकार नरेंद्र मोदी को दंगों के मामलों में फंसाने की पूरी प्लानिंग कर चुकी थी।_*

*क्या कभी आपने राहुल गांधी, लालू यादव, सीताराम येचुरी, मायावती, अखिलेश, ममता, महबूबा, और विपक्ष के नेताओं को एक दूसरे को चोर बोलते सुना है...?🤔*

नहीं ना...🤨

*जबकि इनमें से कुछ को सजा भी हो चुकी है, कोई जेल में है, कोई बेल पर है और कुछ पर कोर्ट में मुकदमे है !*

*मगर ये लोग एक दूसरे को चोर कभी नहीं बोलते? परन्तु मोदी पर कोई भी आधिकारिक आरोप नहीं है, कोई FIR नहीं है, कोई मुकदमा भी नहीं चल रहा है और किसी कोर्ट ने किसी जाँच का आदेश भी नहीं दिया, उसे ये चोर बोलते हैं?*

*_हिमाद्रि तुंग शृंग से प्रबुद्ध शुद्ध भारती।।_*

*_स्वयं प्रभा समुज्ज्वला स्वतंत्रता पुकारती।।_*

*_अमर्त्य वीर पुत्र हो, दृढ़- प्रतिज्ञ सोच लो।।_*

*_प्रशस्त पुण्य पंथ है, बढ़े चलो, बढ़े चलो।।_*

*_-साभार 🙏_*

वीर सावरकर / नेहरू

पहली तस्वीर स्वतंत्रवीर सावरकर की है, जिसे बीबीसी ने 1924 में खींचा था। यह तस्वीर 14 वर्षों की अमानवीय और यातनापूर्ण "काला पानी" ज...