बुधवार, 29 अप्रैल 2026

हमले नहीँ होते थे - राहुल

जब कांग्रेस सत्ता में थी तब राहुल गांधी कहते थे की आतं की हमलो को रोक पाना संभव नहीं है आपको आतंकी हमलो  की आदत डालनी होगी

यह देखिए जब राहुल गांधी सत्ता में थे तब समझौता एक्सप्रेस ब्लास्ट ,मालेगांव ब्लास्ट, मोडासा ब्लास्ट ,अहमदाबाद सूरत जयपुर बनारस गोरखपुर लखनऊ सीरियल ब्लास्ट उसके अलावा तीन ट्रेनों में सीरियल ब्लास्ट पांच हिंदू मंदिरों में सीरियल ब्लास्ट जिसमें संकट मोचन मंदिर प्रमुख है

उसके बाद सबसे भीषण आतं की हम ला यानी 26/ 11 का मुंबई हमला यानी कि मनमोहन सिंह के कार्यकाल में करीब 20000 से ज्यादा लोगों की आतं की हमले में जा न गई

उस वक्त राहुल गांधी प्रेस कांफ्रेंस करके कहा की आतं की हमलों  को रोक पाना असंभव है कोई भी सरकार आतंकी हमलो को नहीं रोक सकती 

और आज कांग्रेसी कु त्ते कह रहे हैं कि काश आज राहुल गांधी प्रधानमंत्री होते 

और अगर किसी कांग्रेसी  के पास कोई तस्वीर या वीडियो है जिसमें राहुल गांधी मुंबई हमले के पीड़ितों से मिले हो या घटनास्थल पर गए हो तो वह दिखा सकता है

 जी हां आपको  यह जानकर आश्चर्य होगा कि राहुल गांधी मुंबई हमले के ठीक अगले दिन इटली चले गए थे और वहां से वह लंदन चले गए थे और 15 दिन के बाद वापस आए थे

आज बेशर्म कांग्रेसी  कैसी बात करते हैं इन बेहया  नीचे को शर्म भी नहीं आती

पोस्ट साभार

सोमवार, 27 अप्रैल 2026

नेहरू की जहालत

बात उस समय की है जिस समय महाराजा हरिसिंह 1937 के दरमियान ही जम्मू कश्मीर में लोकतंत्र स्थापित करना चाहते थे, लेकिन शेख अब्दुल्ला इसके विरोध में थे क्योंकि शेख अब्दुल्ला महाराजा हरिसिंह के प्रधानमंत्री थे और कश्मीर का नियम यह था कि जो प्रधानमंत्री होगा वही अगला राजा बनेगा। 

लेकिन महाराजा हरि सिंह प्रधानमंत्री के कुकृत्य से भलीभांति परिचित थे। इसलिए कश्मीर के लोगों की भलाई के लिए वह 1937 में ही वहां लोकतंत्र स्थापित करना चाहते थे। 

लेकिन शेख अब्दुल्ला ने बगावत कर दी और सिपाहियों को भड़काना शुरू कर दिया। लेकिन राजा हरि सिंह ने समय रहते हुए उस विद्रोह को कुचल डाला और शेख अब्दुल्ला को देशद्रोह के केस में जेल के अंदर डाल दिया।

शेख अब्दुल्ला और जवाहरलाल नेहरू की दोस्ती प्रसिद्ध थी, जवाहरलाल नेहरू शेख अब्दुल्ला का केस लड़ने के लिए कश्मीर पहुंच जाते हैं, वह बिना इजाजत के राजा हरिसिंह द्वारा चलाई जा रही कैबिनेट में प्रवेश कर जाते हैं, महाराजा हरि सिंह के पूछे जाने पर नेहरु ने बताया कि मैं भारत का भावी प्रधानमंत्री हूं। राजा हरिसिंह ने कहा चाहे आप कोई भी है, बगैर इजाजत के यहां नहीं आ सकते, अच्छा रहेगा आप यहां से निकल जाएं।

नेहरु ने जब राजा हरि सिंह के बातों को नहीं माना तो राजा हरिसिंह ने गुस्सा में आकर नेहरु को भरे दरबार में जोरदार थप्पड़ जड़ दिया और कहा यह तुम्हारी कांग्रेस नहीं है या तुम्हारा ब्रिटिश राज नहीं है जो तुम चाहोगे वही होगा। तुम होने वाले प्रधानमंत्री हो सकते हो लेकिन मैं वर्तमान राजा हूं और उसी समय अपने सैनिकों को कहकर कश्मीर की सीमा से बाहर फेंकवा दिया।

कहते हैं फिर नेहरू ने दिल्ली में आकर शपथ ली कि वह 1 दिन शेख अब्दुल्ला को कश्मीर के सर्वोच्च पद पर बैठा कर ही रहेगा। इसीलिए बताते हैं कि कश्मीर को छोड़कर अन्य सभी रियासतों का जिम्मा सरदार पटेल को दिया गया और एकमात्र कश्मीर का जिम्मा भारत में मिलाने के लिए जवाहरलाल नेहरु ने लिया था।

सरदार पटेल ने सभी रियासतों को मिलाया लेकिन नेहरू ने एक थप्पड़ के अपमान के लिए भारत के साथ गद्दारी की ओर शेख अब्दुल्ला को मुख्यमंत्री बनाया।

गुरुवार, 23 अप्रैल 2026

वोट के लिए सबकुछ करेगा

बीजेपी की वित मंत्री निर्मला सीतारमण प्याज लहसुन तक 
नहीं खाती , और उन्होंने ये बात संसद में खड़ी होकर कहा था कि मैं ऐसे परिवार से आती हूं जहां लहसुन प्याज नहीं खाया जाता है 

दूसरी तरफ जब तेजस्वी यादव बिहार चुनाव प्रचार के दौरान मछली खाते है तो देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी कहते है कि मच्छी दिखा दिखाकर खाई जा रही है इससे जनता की भावनाएं आहता होती है जबकि बिहार में सबसे ज्यादा खाया जाना वाला नॉनवेज है 

अब बंगाल चुनाव में बीजेपी नेता अनुराग ठाकुर मनोज तिवारी वोट मांगते हुए प्रचार करते हुए मच्छी भात और मटन बिरयानी खा रहे है और बकायदा वीडियो बना बनाकर सोशल मीडिया पर डाली जा रही है और देश का मीडिया उनको कवर भी कर रहा है 

बात खाने पीने, पहनावे , भाषा, की है ही नहीं , बात है दोगलेपन की जो ये लोग कर रहे है और जमकर कर रहे है 
जब चुनाव नॉर्थ में हो तो ये लोग भगवा पहनकर , माथे में तिलक लगाकर साधु संत बन जाते हैं 

और जब चुनाव साउथ ईस्टर्न में हो तो ये लोग मच्छी मटन खाकर वोट मांगते है और मछलियां बटाने तक का वादा करते है 

इन्होंने देश में खाने पीने , पहनावे , भाषा , को लेकर खूब नफरत बोई है और तो और जिन राज्यों में इनकी सरकार नहीं आई उन राज्यों को ये लोग देशहितेशी नहीं मानते है 

भारत बीफ निर्यात में नंबर वन बन चुका है और आप गूगल करके देखिए बीफ कंपनिया सबसे ज्यादा उत्तर प्रदेश बीजेपी शासित राज्य में है 
अब आप कहोगे कि बीफ में गाय तो नहीं आती ? भैंस ,बकरी , खगड़ा , झोटे, ऊंट , तो आते होंगे , क्या वो जीवो में नहीं आते है ? क्या उनमें जान नहीं है ? क्या उनके प्रति आपमें कोई दया भावना नहीं है गाय से ज्यादा तो हमारा देश भैंस का दूध घी लस्सी दही खाता पीता है 
जीव तो जीव है 

लेकिन इन लोगों की भावनाएं केवल और केवल वोट लेने के लिए आहट होती है बाकी इनको ना तो मछली भैंस बकरे से कोई हमदर्दी और ना ही इनके धर्म आड़े आता है 

देश के 20 राज्यों से अधिक की 70% जनता नॉनवेज पर डिपेंड है बंगाल तो 99% मांसाहारी है नागालैंड में तो ऐसा कोई जीव ही नहीं होगा जिसको खाया ना जाता हो 

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मंगलवार, 21 अप्रैल 2026

हिंसा - बलात्कार और नेहरू

विभाजन के बाद 1947 में पाकिस्तान में हिंदुओं की ह'त्याओं, लड़कियों से बला'त्कार का नंगा नाच हो रहा था। लाहौर से हर ट्रैन में ला"शें और उन पर मंडराते कुत्ते, गिद्ध दिखाई दे रहे थे तब लेहरू ने रेडियो पर शरणार्थी शिविरों में रह रहे हिंदुओं से धैर्य और शांति बनाये रखने की अपील की। 
दूसरे दिन वो शिविरों में इंदिरा  के साथ गए। वहां नेहरू तक अपनी बात पहुंचाने की कोशिश में एक 80 वर्षीय वृद्ध ने इंदिरा को स्पर्श कर दिया। नेहरू ने तुरंत ही उसे तमाचा जड़ दिया। वो वृद्ध लाहौर का प्रसिद्ध व्यापारी था जिस पर वक़्त की मार पड़ रही थी। 
तमाचा खा कर वो जोर से हंसा और बोला, "इंदिरा मेरी पोती समान है क्योंकि आप खुद मेरे बेटे की उम्र के हैं। मेरा हाथ लग जाने भर से आप क्रोधित हो गए और मेरी 3 जवान पोतियों को मु@सलमान मेरे सामने उठा ले गए फिर भी आप कहते हैं सब भुला दूं।" नेहरू ये सुनकर वहां से इंदिरा को साथ लेकर निकल गए।

-अश्व घोष की पुस्तक "द कु'रान एंड द का'फिर" के अंश..

सोमवार, 20 अप्रैल 2026

DRDO की जादुई तकनीक

भारतीय रेलवे का यह बायो-टॉयलेट मिशन स्वच्छता की दिशा में एक भयंकर और जादुई क्रांति है! जिसे लोग केवल एक नया 'डिब्बा' समझते हैं, वह असल में पटरियों को जंग से बचाने और पर्यावरण को शुद्ध रखने वाली DRDO की फौलादी तकनीक है।

1. अवायवीय बैक्टीरिया (Anaerobic Bacteria) का जादू
इन टैंकों के अंदर DRDO द्वारा विकसित विशेष बैक्टीरिया छोड़े जाते हैं, जो अंटार्कटिका जैसे भयंकर ठंडे इलाकों से लाए गए थे।

• बिना ऑक्सीजन के काम: ये बैक्टीरिया बिना ऑक्सीजन के जीवित रहते हैं और मल को जादुई रफ़्तार से खाना शुरू कर देते हैं।
• पूर्ण निपटान: ये बैक्टीरिया मल को तब तक तोड़ते हैं जब तक कि वह केवल पानी और गैस (मीथेन) में न बदल जाए।

2. तीन चरणों वाला फौलादी फ़िल्ट्रेशन
बायो-डाइजेस्टर टैंक को अंदर से कई हिस्सों में बांटा गया है ताकि सफाई जादुई रूप से सटीक हो:

• पहला चरण: मल को बैक्टीरिया द्वारा लिक्विड में बदलना।
• दूसरा चरण: क्लोरिनेशन के ज़रिए हानिकारक कीटाणुओं का भयंकर खात्मा।
• तीसरा चरण: अंत में जो पानी बाहर निकलता है, वह पूरी तरह रंगहीन और गंधहीन होता है, जिससे पटरियों पर जंग लगने का खतरा शून्य हो जाता है।

3. पटरियों की फौलादी उम्र और बचत
रेलवे पटरियों में जंग लगना केवल सफाई का मुद्दा नहीं था, बल्कि यह एक भयंकर आर्थिक नुकसान भी था।

• अरबों की बचत: पटरियों के गलने के कारण उन्हें बार-बार बदलना पड़ता था। बायो-टॉयलेट तकनीक ने पटरियों की उम्र को जादुई तरीके से बढ़ा दिया है, जिससे रेलवे के करोड़ों रुपये बच रहे हैं।
• स्टेशन की स्वच्छता: पहले ट्रेनों के रुकने पर स्टेशनों पर जो भयंकर बदबू आती थी, वह अब इस फौलादी तकनीक की वजह से इतिहास बन चुकी है।

4. बायो-टॉयलेट की 'जादुई' विशेषताएँ
• रखरखाव में आसान: इन बैक्टीरिया को बार-बार डालने की ज़रूरत नहीं होती, ये खुद को जादुई रूप से रीजेनरेट करते रहते हैं।
• तापमान सहनशीलता: ये बैक्टीरिया -20°C से लेकर 50°C तक के भयंकर तापमान में भी अपना काम फौलादी तरीके से करते हैं। #lifestyle

जीव रक्षा केंद्र, सहारनपुर

गुरुवार, 16 अप्रैल 2026

नेहरू जी को भारत रत्न क्यों?

13 जुलाई 1955 को जब पण्डित नेहरू जी यूरोप और सोवियत रूस के दौरे से वापस आए तब उनके वैचारिक विरोधी तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद जी सभी प्रोटोकॉल तोड़कर दिल्ली एयरपोर्ट उनका स्वागत करने पहुंचे।

राजेन्द्र प्रसाद जी ने राष्ट्रपति भवन में भोज का आयोजन किया सभी महान हस्तियों की उपस्थिति में राजेंद्र प्रसाद जी ने पण्डित नेहरू जी को लेकर कहा - "यह हमारे समय के शांति के सबसे बड़े वास्तुकार हैं।" और मैंने पण्डित नेहरू जी को भारत रत्न देने का फैसला किया है।
राष्ट्रपति ने कहा कि पण्डित नेहरू के प्रयासों से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत मजबूत रूप से खड़ा हुआ है।

उन्होंने आगे कहा यह कदम मैंने अपने स्वविवेक से लिया है,अपने प्रधानमंत्री की अनुशंसा के बगैर इसलिए यह कहा जा सकता है कि यह निर्णय अवैधानिक है लेकिन मैं यह जानता हूँ कि मेरे इस फैसले का स्वागत होगा।

7 सितंबर 1955 को राष्ट्रपति भवन में आयोजित नेहरू के भारत रत्न सम्मान समारोह में तत्कालीन केंद्रीय गृह सचिव एवी पाई ने सम्मान पाने वाली विभूतियों के नाम पुकारे, लेकिन नेहरू का प्रशस्ति-पत्र नहीं पढ़ा गया था। किदवई के अनुसार प्रशस्तियों की आधिकारिक पुस्तिका में प्रधानमंत्री का महज नाम दर्ज है। इसमें उनके द्वारा की गई सेवाओं का वहां कोई जिक्र नहीं है। सामान्य रूप से यह उल्लेख परम्परागत रूप से उस पुस्तिका में किया जाता है। उस समय के लोगों का कहना था कि देश और समाज के लिए नेहरू के अप्रतिम योगदान का चंद पैराग्राफ में जिक्र करना कठिन होगा, इसलिए उसे छोड़ दिया गया।

ऐसी शख्शियत जिसके विरोधी भी उन्हें सम्मान करते थे क्योंकि पण्डित नेहरू अपने विरोधियों को भी समान आदर करते थे आलोचकों को भी उतना ही स्थान मिला पण्डित नेहरू जी के दौर में जितना प्रसंशकों को।

©...✍️ Pramod Singh

मंगलवार, 14 अप्रैल 2026

इथेनोल की साज़िश

क्या आपने कभी सोचा है कि जिस गाड़ी को आपने अपनी खून-पसीने की कमाई से खरीदा, वह अचानक 'कबाड़' (Scrap) कैसे घोषित की जा सकती है? 

जबकि जापान और अमेरिका जैसे विकसित देशों में 40 साल पुरानी गाड़ियाँ भी फिट होने पर सड़कों पर दौड़ती हैं, तो भारत में ही यह 'जबरन कबाड़' नीति क्यों?

​आज हम उन 'डॉट्स' को कनेक्ट करेंगे जिन्हें मुख्यधारा का मीडिया आपसे छिपा रहा है।

​1. E20 पेट्रोल: आपके इंजन के लिए 'धीमा जहर' 🧪

​1 अप्रैल 2026 से देशभर में E20 (20% एथेनॉल मिश्रण) अनिवार्य हो रहा है।

    2023 से पहले के इंजन शुद्ध पेट्रोल के लिए बने थे। एथेनॉल एक अल्कोहल है जो आपके पुराने इंजन की रबर सील और पाइपों को गला देता है और अंदर जंग (Corrosion) पैदा करता है।

​     यह आपके वाहन के खिलाफ एक 'साइलेंट सॉफ्टवेयर अपडेट' जैसा है। जब ईंधन ही आपके इंजन को चोक कर देगा, तो आप मजबूरन अपनी गाड़ी कबाड़ में देंगे।

​2. दिल्ली की नई EV नीति: निजी स्वामित्व का अंत? 🚫

​दिल्ली इलेक्ट्रिक वाहन नीति 2.0 के मसौदे के अनुसार:
​1 अप्रैल 2027 से तिपहिया और 1 अप्रैल 2028 से पेट्रोल टू-व्हीलर का नया रजिस्ट्रेशन बंद हो सकता है।
​नवीनीकरण (Renewal) की संभावना लगभग खत्म की जा रही है।

​     क्या यह जनता की भलाई के लिए है या ऑटोमोबाइल कंपनियों की तिजोरियां भरने के लिए?

​3. 'एजेंडा 2030' और भारत: एक बड़ी लैबोरेटरी 🌍

​वैश्विक संस्थाओं (WEF/UN) का नारा है— "2030 तक आपके पास कुछ नहीं होगा और आप खुश रहेंगे।"

 
 भारत को इस 'ग्रेट रीसेट' का टेस्टिंग ग्राउंड बनाया जा रहा है।

​     पुराने मैकेनिकल वाहनों को ट्रैक करना मुश्किल है। लेकिन नई 'स्मार्ट' और 'इलेक्ट्रिक' गाड़ियाँ पूरी तरह इंटरनेट से जुड़ी हैं।

     सरकार एक बटन दबाकर आपकी गाड़ी को कहीं भी 'डिसेबल' कर सकती है। यह 'ग्रीन एनर्जी' के नाम पर आपकी 'आर्थिक आजादी' पर ताला है।

​4. 'यूज एंड थ्रो' का नया मॉडल ♻️

​वर्तमान की EV तकनीक 'यूज एंड थ्रो' है। बैटरी का खर्च गाड़ी की आधी कीमत के बराबर है और रीसेल वैल्यू शून्य।

​पहले हमारा कल्चर 'रिपेयर' (मरम्मत) का था, जो हमें आत्मनिर्भर बनाता था।
​अब हमें 'रिप्लेस' (बदलाव) के चक्रव्यूह में फंसाया जा रहा है ताकि हम जीवन भर किश्तें (EMI) भरते रहें और कभी भी पूरी तरह किसी संपत्ति के मालिक न बन सकें।

​5. क्यों चुप हैं जिम्मेदार? 🤐

​सड़क परिवहन मंत्री एथेनॉल का प्रचार करते हैं, लेकिन पेट्रोलियम मंत्रालय पुराने वाहन मालिकों को होने वाले नुकसान पर चुप है। 

क्या यह कॉर्पोरेट घरानों और वैश्विक एजेंडे के बीच की एक गुप्त सांठगांठ है?

​📢 जागरूक बनें, केवल दर्शक नहीं!
​यह केवल पर्यावरण का मुद्दा नहीं है, यह आपकी संपत्ति के अधिकार (Property Rights) पर हमला है।

    अगर आपकी 15 साल पुरानी गाड़ी फिट है और धुआं नहीं दे रही, तो उसे छीनने का हक किसी को नहीं होना चाहिए।

​अपनी राय कमेंट में जरूर बताएं— क्या आप इस 'जबरन कबाड़ नीति' और 'ईंधन के खेल' को समझ पा रहे हैं?

सोमवार, 13 अप्रैल 2026

भारत की रक्षा तकनीक

यह वाकई में भारत की रक्षा तकनीक (Defense Tech) में एक क्रांतिकारी कदम है। डीआरडीओ (DRDO) द्वारा विकसित यह हाई पावर माइक्रोवेव (HPM) तकनीक 'एंटी-ड्रोन' सिस्टम के क्षेत्र में गेम-चेंजर मानी जा रही है। 
यहाँ इस तकनीक की कुछ खास बातें हैं:
सॉफ्ट किल क्षमता: यह तकनीक किसी मिसाइल या गोली का इस्तेमाल करने के बजाय विद्युत चुंबकीय तरंगों (Electromagnetic Waves) का उपयोग करती है। यह ड्रोन के अंदर के इलेक्ट्रॉनिक्स और सर्किट को एक झटके में ठप कर देती है।
एक साथ कई निशाने: जैसा कि आपने बताया, यह सिस्टम एक ही पल्स या शॉट में 49 ड्रोनों के झुंड (Swarm) को निष्क्रिय करने की क्षमता रखता है।
कम लागत: पारंपरिक हथियारों के मुकाबले इसमें प्रति शॉट खर्चा बहुत कम आता है।
आनंद महिंद्रा की सराहना: उद्योगपति आनंद महिंद्रा ने भी इसे भारत के भविष्य के लिए एक बड़ी उपलब्धि बताया है, जो आधुनिक युद्ध के दौर में "ड्रोन स्वार्म" हमलों से बचने में मदद करेगी।

रहस्यमय मौतें?

1968 का वो खतरनाक फोटो सामने आया… 

ISRO के अंदर इटली की  महिला को भारत का सबसे गुप्त उपग्रह प्रोजेक्ट दिखा रहे थे विक्रम साराभाई!

अप्रैल 1968… अहमदाबाद का ISRO सेंटर।

वैज्ञानिक विक्रम साराभाई एक विदेशी महिला को अत्यंत संवेदनशील सैटेलाइट प्रोजेक्ट की पूरी जानकारी दे रहे हैं।

  ये कोई साधारण महिला नहीं… 

इटली की एंटोनियो एडवीज अल्बिना मायनो – 

जिसने महज दो महीने पहले फरवरी 1968 में भारत के प्रधानमंत्री के बेटे राजीव गांधी से शादी कर ली थी।

नागरिकता बदली?

 नहीं बदली!

फिर भी विदेशी नागरिक को ISRO जैसे टॉप-सीक्रेट रिसर्च सेंटर में घुसने की इजाजत? 

नियमों का सीधा उल्लंघन!इटली की ये 8वीं पास महिला अचानक सैटेलाइट और अंतरिक्ष विज्ञान की दीवानी हो गई…

 हैरान करने वाली बात!  

रुकिए… अब शुरू होता है असली सनसनीखेज राज!

जैसे ही ये इटालियन महिला गांधी परिवार में घुसी, परिवार के बाकी 4 सदस्य थे –

 इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, संजय गांधी और मेनका गांधी। 

 फिर एक-एक करके शुरू हुईं रहस्यमय मौतों की बाढ़…  

इंदिरा गांधी – अपने ही घर में अपने बॉडीगार्ड्स द्वारा गोली मार दी गई।  

संजय गांधी – प्लेन क्रैश में मारे गए।  

राजीव गांधी – बम ब्लास्ट में टुकड़े-टुकड़े हो गए।

और राजीव के सबसे करीबी दोस्त?  

राजेश पायलट – कार दुर्घटना में मारे गए।  

माधवराव सिंधिया – प्लेन क्रैश में मारे गए।

संजय गांधी के ससुर लेफ्टिनेंट कर्नल टी.एस. आनंद – 

दिल्ली के फार्महाउस के पास मृत पाए गए। 

 विक्रम साराभाई – दिसंबर 1971 में केरल के कोवलम रिजॉर्ट के कमरे में रहस्यमय ढंग से मृत पाए गए। 

बिना पोस्टमार्टम के बस हार्ट अटैक बता दिया गया!

  मेनका गांधी – परिवार, सत्ता और दिल्ली की राजनीति से बाहर फेंक दी गईं। 

 प्रियंका गांधी की सास-ससुर की साइड: 

 राजेंद्र वाड्रा – गेस्ट हाउस में मृत पाए गए।  

ननद – जयपुर-दिल्ली हाईवे पर कार दुर्घटना में मारी गई।  

देवर – मुरादाबाद के होटल में मृत पाए गए।

सारे “संयोग”… एक-एक करके सब खत्म!

आस-पास कोई नहीं बचा… सब मारे गए, 

दुर्घटना में मरे, गोली खाकर मरे, बम से उड़ गए…  

बस एक इटालियन महिला बची रही – एंटोनियो एडवीज अल्बिना मायनो उर्फ सोनिया गांधी!

ये संयोग हैं… या साजिश का सबसे बड़ा राज?   

अब खुद सोचिए… इतने सारे “संयोग” एक इटालियन महिला के आने के बाद क्यों? 

 सनसनीखेज सच… जो छुपाया नहीं जा सकता!
साभार 

रविवार, 12 अप्रैल 2026

वीर सावरकर / नेहरू

पहली तस्वीर स्वतंत्रवीर सावरकर की है, जिसे बीबीसी ने 1924 में खींचा था।

यह तस्वीर 14 वर्षों की अमानवीय और यातनापूर्ण "काला पानी" जेल से रिहाई के बाद ली गई थी।

तस्वीर में उनके हाथों में हथकड़ी और पैरों में बेड़ियां हैं।

अंडमान की सेलुलर जेल से रिहा होने के बाद, अंग्रेजों ने उन्हें अगले 13 वर्षों तक नजरबंद रखा।

दूसरी तस्वीर चिचा लेहरू की है - उनके हाथों में भी हथकड़ी है।

देश के लाल

जब 11 जनवरी 1966 की रात ताशकंद में लाल बहादुर शास्त्री जी की मौत हुई 😢🇮🇳, तो पूरा देश सदमे में था।

 लेकिन असली 'तमाशा' तो तब हुआ जब उनकी मौत के बाद उनकी संपत्ति का हिसाब लगाया गया।

लोग हैरान थे कि वह शख्स जो देश का 'प्रधान' था 👑, जो करोड़ों के बजट और फाइलों पर हस्ताक्षर करता था 📑✍️, उसने अपने पीछे क्या वसीयत छोड़ी है? 🤔

लेकिन जब अलमारियां और बैंक खाते देखे गए 🏦, तो सबकी आंखों में आंसू आ गए 😢:
कोई बंगला नहीं: दिल्ली की कोठियों में रहने वाले नेता के नाम अपनी एक इंच जमीन नहीं थी। 🏠❌

पुराना फटा कुर्ता: उनकी अलमारी में बस कुछ जोड़ी खादी के कुर्ते मिले 👕, जिनमें से कुछ तो फटे हुए थे जिन्हें उनकी पत्नी ललिता शास्त्री जी ने रफू (Stitch) किया था 🪡🧵।
बैंक बैलेंस 00.00: उनके खाते में इतने पैसे भी नहीं थे कि एक पुरानी कार की किश्त (EMI) चुकाई जा सके 💸❌।

हैरानी की बात जानते हैं? 😲 शास्त्री जी ने बच्चों के कहने पर एक  'फिएट कार' (Fiat Car) 🚗 लोन लेकर खरीदी थी। उनकी मृत्यु के बाद उस कार का 5,000 रुपये का कर्ज बाकी था 💔, जिसे बाद में उनकी पत्नी ने अपनी पेंशन के पैसों से तिल-तिल कर चुकाया।

जिस इंसान के एक इशारे पर पूरा देश "एक वक्त का उपवास" (Fast) रखने लगा था 🙏, उस इंसान ने अपने बच्चों के लिए विरासत में एक 'सिक्का' तक नहीं छोड़ा 🤲✨।

आज हम छोटी सी नौकरी पाकर या थोड़ा सा पैसा कमाकर घमंड में चूर हो जाते हैं 😔💭। लेकिन शास्त्री जी ने सिखाया कि "पद और प्रतिष्ठा से इंसान बड़ा नहीं होता, चरित्र से होता है।" 💡🪞

वो चाहते तो अरबों की संपत्ति बना सकते थे 💰, लेकिन उन्होंने 'ईमानदारी' को अपनी संपत्ति चुना 🤍✨। आज के दौर में जहाँ भ्रष्टाचार और दिखावा चरम पर है ⚠️, क्या हमें ऐसे नेताओं की याद नहीं आती? ❤️🇮🇳

इस 'नन्हे' कद वाले महान इंसान की सादगी को एक 'नमन' तो बनता है! 🙏🚩

इस पोस्ट को इतना शेयर करो कि आज के 'दिखावे' वाले समाज को अपनी असलियत का आईना दिखे 📲🔥।
क्या आपको लगता है कि आज के दौर में ऐसा नेता मिलना मुमकिन है? 🤔💭
हाँ (Yes) 👍 / नहीं (No) 👎 कमेंट में अपनी राय दें।

🚩 नोट: यह जानकारी विभिन्न ऐतिहासिक स्रोतों और प्रचलित कथनों पर आधारित है 📚। हमारा उद्देश्य किसी भी व्यक्ति या नेता की तुलना करना नहीं है 🙏, बल्कि केवल Lal Bahadur Shastri जी के सादगीपूर्ण जीवन और ईमानदारी को सम्मान देना है ❤️🇮🇳

बुधवार, 8 अप्रैल 2026

खड़गे का नीच बयान

आंख खोलकर पढ़िये....!!

ईशा की पांचवी सदी में शाही राजा खिंगल ने अफगानिस्तान के गर्देज स्थान पर महाविनायक की प्राण प्रतिष्ठा कराई थी। 
समय के साथ सभ्यता के ऊपर धूल चढ़ती गई और महाविनायक की प्रतिमा मिट्टी में कहीं दब गई।

युगों बाद खुदाई में जब वह प्रतिमा मिली तो उसे काबुल में "दरगाह पीर रतन नाथ" के पास स्थापित किया गया। दरगाह पीर रतन नाथ की कहानी किसी दूसरे दिन सुनाएंगे। 
आज कहानी महाविनायक की।

दो वर्ष पूर्व बिहार का एक युवक अफगानिस्तान में भारतीय दूतावास में नौकरी करने पहुँचा। 
स्वयं को यायावर कहने वाले उस युवक को अफगानिस्तान के प्राचीन महाविनायक के सम्बंध में पता था, सो वे महाविनायक के चिन्ह खोजने निकले। 
पर अफगानिस्तान में सनातन के चिन्ह जितने ही सुलभ हैं, उन्हें खोज लेना उतना ही दुर्लभ। 
कई दिनों नहीं कई महीनों के बाद उन्हें पीर रतन नाथ दरगाह का पता चला तो वे एक दिन पहुंचे तो एक ऐसा घर मिला जिसे भारत में मंदिर नहीं कह सकते। उस मंदिर में प्रतिमा स्थापित नहीं थी, बस रामायण महाभारत और गीता आदि पुस्तके रखी हुई थीं।

युवक ने सेवादार से जब महाविनायक की प्रतिमा के बारे में पूछा तो बुजुर्ग सेवादार आश्चर्य में डूब गया। क्या कोई दूर देश से मात्र एक प्रतिमा के लिए आया है? कौन है यह?
भावुक हो चुके सेवादार ने एक बन्द कमरे में रखी महाविनायक की प्रतिमा दिखाई... 
युगों बाद किसी ने श्रद्धा से महाविनायक को देखा, युगों बाद महाविनायक की प्रतिमा ने अपने किसी श्रद्धालु को वात्सल्य की दृष्टि से देखा। 
उस दिन युगों बाद किसी ने अभिशप्त महाविनायक के चरणों में प्रणाम किया, प्रतिमा पोंछी और बीस रुपये वाले माला से उनका श्रृंगार किया।

जानते हैं, ढाई हजार वर्ष पूर्व अफगानिस्तान के हर कण्ठ से वेदमन्त्र उच्चारित होते थे, 
गलियों में यज्ञध्रुम की सुगन्ध पसरी रहती थी। 
"वसुधैव कुटुंकम" की अवधारणा को जन्म देने वाली उस पूण्य भूमि पर सौ वर्ष पूर्व तक सनातन धर्म पूरी प्रतिष्ठा के साथ खड़ा था। 
पर आज का सत्य यह है कि अफगानिस्तान से महाविनायक पर लेख लिख कर जब उस युवक ने भारत भेजा तो पत्रिका के सम्पादक ने भय के मारे लेख में उनका नाम तक नहीं जोड़ा, कि कहीं उन्हें अफगानिस्तान में इसका दण्ड न भोगना पड़े।

सभ्यताओं के चिन्ह कैसे मरते हैं देखें। 
काबुल में एक अत्यंत प्राचीन तीर्थस्थल है 'आशा माई'। 
पस्तो प्रभाव के कारण वहां के लोग उस स्थान को 'कोही आस्माई' कहते थे, मतलब आशामाई की पहाड़ी। 
बीस वर्ष पूर्व सरकार ने उस पहाड़ी पर टेलीविजन का टावर लगा दिया, लोग धीरे धीरे उस स्थान को "कोही टेलीविजन" कहने लगे। 
आशामाई का नाम मिट गया।
काबुल में ही एक सड़क थी, देवगनाना रोड। 
देवगनाना संस्कृत के "देवगणानाम" का अपभ्रंस है। 
अब उस सड़क का नाम है, दे-अफ़ग़ान रोड। 
सभ्यता के चिन्ह ऐसे मरते हैं।

देश में लोकतंत्र का महापर्व चल रहा है। मत देना हमारा कर्तव्य भी है, और हमारी आवश्यकता भी। अपने घरों से निकलिए, और मत देते समय इतना अवश्य याद रखिए कि अब हमारे पास धरती का यही एक टुकड़ा है जहाँ हम अपनी परम्पराओं को निभा सकते हैं, महाविनायक की अर्चना कर सकते हैं। 
ऐसा ना हो कि सौ पचास वर्षों बाद किसी दूसरे Lalit Kumar को इसी तरह दिल्ली, आगरा, मथुरा या कानपुर में अपने चिन्ह खोजने आना पड़े। 
यकीन मानिए 200 वर्ष पहले काबुल के हिंदुओं ने भी ऐसा नहीं सोचा होगा कि 200 वर्ष बाद हमारा कोई बच्चा जब काबुल आएगा तो उसे अपने पूर्वजों के चिन्ह इस दशा में मिलेंगे। 
1946 ईस्वी तक सिंध के लोगों ने यह नहीं सोचा होगा कि पचास वर्ष बाद ही उनसे उनकी सम्पति, उनका धर्म, उनकी बेटियां, उनके बेटे सबकुछ छीन लिए जाएंगे।

हम सभ्यताओं के युद्ध में जी रहे हैं। 
हमको छोड़कर हर सभ्यता हमारी परम्पराओं को अपराध और हराम बताती है, और मूर्ति तथा मूर्तिपूजकों की समाप्ति को ही अपना परम् उद्देश्य मानती है।

उनकी तलवार हमारी गर्दन पर है... यही है हमारा आज का सत्य।
मैं यह नहीं कह रहा कि आप फलाँ दल को वोट दीजिये। 
मैं क्यों कहूँ? 
मैं बस यह कह रहा हूँ कि मत देते समय ध्यान रखिये कि मत अपने देश के लिए देना है। 

मत इसलिए देना है ताकि देश मे फिर कोई हत्यारा गुरु गोविंद सिंह जी के साहिबजादों को दीवाल में न चुनवा सके। 

मत इसलिए देना है ताकि फिर किसी बिरसा मुंडा को अपनी संस्कृति के लिए प्राण न देना पड़े।
मत इसलिए देना है ताकि फिर किसी पद्मावती को अग्नि में न उतरना पड़े। 

मत इसलिए देना है ताकि अयोध्या, मथुरा, काशी, कांची, पूरी, अवंतिका बनी रहे। 

मत इसलिए देना है ताकि हजार वर्षों बाद भी जब हमारा कोई बेटा इस मिट्टी को सूँघे तो उसे इस मिट्टी में हमारी गन्ध मिल सके। 

मत इसलिए देना है ताकि हमारा देश हमारा ही रहे। 
अपना देश रहेगा तभी हम रहेंगे।

खत्म होता इतिहास

आंख खोलकर पढ़िये....!!

ईशा की पांचवी सदी में शाही राजा खिंगल ने अफगानिस्तान के गर्देज स्थान पर महाविनायक की प्राण प्रतिष्ठा कराई थी। 
समय के साथ सभ्यता के ऊपर धूल चढ़ती गई और महाविनायक की प्रतिमा मिट्टी में कहीं दब गई।

युगों बाद खुदाई में जब वह प्रतिमा मिली तो उसे काबुल में "दरगाह पीर रतन नाथ" के पास स्थापित किया गया। दरगाह पीर रतन नाथ की कहानी किसी दूसरे दिन सुनाएंगे। 
आज कहानी महाविनायक की।

दो वर्ष पूर्व बिहार का एक युवक अफगानिस्तान में भारतीय दूतावास में नौकरी करने पहुँचा। 
स्वयं को यायावर कहने वाले उस युवक को अफगानिस्तान के प्राचीन महाविनायक के सम्बंध में पता था, सो वे महाविनायक के चिन्ह खोजने निकले। 
पर अफगानिस्तान में सनातन के चिन्ह जितने ही सुलभ हैं, उन्हें खोज लेना उतना ही दुर्लभ। 
कई दिनों नहीं कई महीनों के बाद उन्हें पीर रतन नाथ दरगाह का पता चला तो वे एक दिन पहुंचे तो एक ऐसा घर मिला जिसे भारत में मंदिर नहीं कह सकते। उस मंदिर में प्रतिमा स्थापित नहीं थी, बस रामायण महाभारत और गीता आदि पुस्तके रखी हुई थीं।

युवक ने सेवादार से जब महाविनायक की प्रतिमा के बारे में पूछा तो बुजुर्ग सेवादार आश्चर्य में डूब गया। क्या कोई दूर देश से मात्र एक प्रतिमा के लिए आया है? कौन है यह?
भावुक हो चुके सेवादार ने एक बन्द कमरे में रखी महाविनायक की प्रतिमा दिखाई... 
युगों बाद किसी ने श्रद्धा से महाविनायक को देखा, युगों बाद महाविनायक की प्रतिमा ने अपने किसी श्रद्धालु को वात्सल्य की दृष्टि से देखा। 
उस दिन युगों बाद किसी ने अभिशप्त महाविनायक के चरणों में प्रणाम किया, प्रतिमा पोंछी और बीस रुपये वाले माला से उनका श्रृंगार किया।

जानते हैं, ढाई हजार वर्ष पूर्व अफगानिस्तान के हर कण्ठ से वेदमन्त्र उच्चारित होते थे, 
गलियों में यज्ञध्रुम की सुगन्ध पसरी रहती थी। 
"वसुधैव कुटुंकम" की अवधारणा को जन्म देने वाली उस पूण्य भूमि पर सौ वर्ष पूर्व तक सनातन धर्म पूरी प्रतिष्ठा के साथ खड़ा था। 
पर आज का सत्य यह है कि अफगानिस्तान से महाविनायक पर लेख लिख कर जब उस युवक ने भारत भेजा तो पत्रिका के सम्पादक ने भय के मारे लेख में उनका नाम तक नहीं जोड़ा, कि कहीं उन्हें अफगानिस्तान में इसका दण्ड न भोगना पड़े।

सभ्यताओं के चिन्ह कैसे मरते हैं देखें। 
काबुल में एक अत्यंत प्राचीन तीर्थस्थल है 'आशा माई'। 
पस्तो प्रभाव के कारण वहां के लोग उस स्थान को 'कोही आस्माई' कहते थे, मतलब आशामाई की पहाड़ी। 
बीस वर्ष पूर्व सरकार ने उस पहाड़ी पर टेलीविजन का टावर लगा दिया, लोग धीरे धीरे उस स्थान को "कोही टेलीविजन" कहने लगे। 
आशामाई का नाम मिट गया।
काबुल में ही एक सड़क थी, देवगनाना रोड। 
देवगनाना संस्कृत के "देवगणानाम" का अपभ्रंस है। 
अब उस सड़क का नाम है, दे-अफ़ग़ान रोड। 
सभ्यता के चिन्ह ऐसे मरते हैं।

देश में लोकतंत्र का महापर्व चल रहा है। मत देना हमारा कर्तव्य भी है, और हमारी आवश्यकता भी। अपने घरों से निकलिए, और मत देते समय इतना अवश्य याद रखिए कि अब हमारे पास धरती का यही एक टुकड़ा है जहाँ हम अपनी परम्पराओं को निभा सकते हैं, महाविनायक की अर्चना कर सकते हैं। 
ऐसा ना हो कि सौ पचास वर्षों बाद किसी दूसरे Lalit Kumar को इसी तरह दिल्ली, आगरा, मथुरा या कानपुर में अपने चिन्ह खोजने आना पड़े। 
यकीन मानिए 200 वर्ष पहले काबुल के हिंदुओं ने भी ऐसा नहीं सोचा होगा कि 200 वर्ष बाद हमारा कोई बच्चा जब काबुल आएगा तो उसे अपने पूर्वजों के चिन्ह इस दशा में मिलेंगे। 
1946 ईस्वी तक सिंध के लोगों ने यह नहीं सोचा होगा कि पचास वर्ष बाद ही उनसे उनकी सम्पति, उनका धर्म, उनकी बेटियां, उनके बेटे सबकुछ छीन लिए जाएंगे।

हम सभ्यताओं के युद्ध में जी रहे हैं। 
हमको छोड़कर हर सभ्यता हमारी परम्पराओं को अपराध और हराम बताती है, और मूर्ति तथा मूर्तिपूजकों की समाप्ति को ही अपना परम् उद्देश्य मानती है।

उनकी तलवार हमारी गर्दन पर है... यही है हमारा आज का सत्य।
मैं यह नहीं कह रहा कि आप फलाँ दल को वोट दीजिये। 
मैं क्यों कहूँ? 
मैं बस यह कह रहा हूँ कि मत देते समय ध्यान रखिये कि मत अपने देश के लिए देना है। 

मत इसलिए देना है ताकि देश मे फिर कोई हत्यारा गुरु गोविंद सिंह जी के साहिबजादों को दीवाल में न चुनवा सके। 

मत इसलिए देना है ताकि फिर किसी बिरसा मुंडा को अपनी संस्कृति के लिए प्राण न देना पड़े।
मत इसलिए देना है ताकि फिर किसी पद्मावती को अग्नि में न उतरना पड़े। 

मत इसलिए देना है ताकि अयोध्या, मथुरा, काशी, कांची, पूरी, अवंतिका बनी रहे। 

मत इसलिए देना है ताकि हजार वर्षों बाद भी जब हमारा कोई बेटा इस मिट्टी को सूँघे तो उसे इस मिट्टी में हमारी गन्ध मिल सके। 

मत इसलिए देना है ताकि हमारा देश हमारा ही रहे। 
अपना देश रहेगा तभी हम रहेंगे।

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शनिवार, 4 अप्रैल 2026

मोदीजी के खिलाफ षड्यंत्र

कोई नहीं जानता है कि *ये देश जस्टिस एमबी सोनी का भी कर्जदार है।*

नरेंद्र मोदी को जेल मे सड़ाने की प्लानिंग किसकी थी...?

और इस षड्यंत्र से कैसे नरेंद्र मोदी बच सके...?

*_षड्यंत्र कितने खतरनाक!!!😳_*

*_आप अंदाज नहीं लगा सकते!!!🫣_*

*_अगर वो सफल हो जाते!!! तो हम क्या खो देते...?_*
*_और नरेंद्र मोदी का हश्र क्या होता...?_*

कांग्रेस राज में कोई भी केस सुप्रीम कोर्ट में जाने के पहले ही सब कुछ मैनेज हो जाता था।

कि केस किस जज की बेंच में जायेगा और वो जज क्या फैसला देंगे...

कांग्रेस की 70 सालों की सफलता का यही सबसे बड़ा राज ये है कि, उसने मीडिया और न्यायपालिका सबको मैनेज करके अपना राज स्थापित किया।

गुजरात हाईकोर्ट के रिटायर जज जस्टिस एमबी सोनी ने इसका खुलासा तब किया, जब उन्होंने पाया की गुजरात दंगो के सम्बन्धित कोई भी याचिका, जो तीस्ता सीतलवाड सुप्रीम कोर्ट में दायर करती है वो सिर्फ जस्टिस आफताब आलम के बेंच में ही क्यों जाती है, जबकि रोस्टर के अनुसार वो किसी और के बेंच में जानी चाहिए थी।

फिर उन्होंने और तहकीकात की तो पता चला कि रजिस्ट्रार को ऊपर से आदेश था कि तीस्ता का केस जस्टिस आफ़ताब आलम के बेंच में ही भेजा जाए और इसके लिए मस्टर रोल और रोस्टर को बदल दिया जाये।

फिर उन्होंने और तहकीकात की तो पता चला कि....

जस्टिस आफताब आलम की सगी बेटी अरुसा आलम, तीस्ता के एनजीओ सबरंग में पार्टनर है और...

उस समय के केबिनेट मंत्री और सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल की पत्नी भी उसी एनजीओ में है...

यह सब जानकर उन्होंने इसके खिलाफ चीफ जस्टिस को पत्र भेजा, और जस्टिस आफ़ताब आलम, कांग्रेस नेता और हिमाचल के मुख्यमंत्री की बेटी (जस्टिस अभिलाषा कुमारी) के 10 फैसलों की बकायदा आठ हजार पन्नों में विस्तृत बिवेचना करके भेजी....

और कहा कि इन लोगों ने खुलेआम न्यायव्यवस्था का बलात्कार किया है।

इसके बाद ही इस गैंग को गुजरात के हर एक मामले से अलग किया गया।

*_अगर जस्टिस एम बी सोनी नहीं होते तो कांग्रेस सरकार नरेंद्र मोदी को दंगों के मामलों में फंसाने की पूरी प्लानिंग कर चुकी थी।_*

*क्या कभी आपने राहुल गांधी, लालू यादव, सीताराम येचुरी, मायावती, अखिलेश, ममता, महबूबा, और विपक्ष के नेताओं को एक दूसरे को चोर बोलते सुना है...?🤔*

नहीं ना...🤨

*जबकि इनमें से कुछ को सजा भी हो चुकी है, कोई जेल में है, कोई बेल पर है और कुछ पर कोर्ट में मुकदमे है !*

*मगर ये लोग एक दूसरे को चोर कभी नहीं बोलते? परन्तु मोदी पर कोई भी आधिकारिक आरोप नहीं है, कोई FIR नहीं है, कोई मुकदमा भी नहीं चल रहा है और किसी कोर्ट ने किसी जाँच का आदेश भी नहीं दिया, उसे ये चोर बोलते हैं?*

*_हिमाद्रि तुंग शृंग से प्रबुद्ध शुद्ध भारती।।_*

*_स्वयं प्रभा समुज्ज्वला स्वतंत्रता पुकारती।।_*

*_अमर्त्य वीर पुत्र हो, दृढ़- प्रतिज्ञ सोच लो।।_*

*_प्रशस्त पुण्य पंथ है, बढ़े चलो, बढ़े चलो।।_*

*_-साभार 🙏_*

पुस्तकों के अंश

महात्मा गांधी के यौन जीवन की अनकही कहानी। (अपनी पोती (मनु) और अन्य महिलाओं के साथ नग्न सोते थे।)

लंदन के प्रतिष्ठित अखबार "द टाइम्स" के अनुसार, 82 वर्षीय गांधीवादी इतिहासकार कुसुम वदगामा, जो कभी गांधी को भगवान की तरह पूजती थीं, ने कहा कि गांधी को यौन की बुरी लत थी और वे आश्रम में कई महिलाओं के साथ नग्न सोते थे।
वे इतने कामुक थे कि ब्रह्मचर्य के प्रयोग और संयम की परीक्षा के बहाने उन्होंने अपने चाचा अमृतलाल तुलसीदास गांधी की पोती और जयसुखलाल की बेटी मनुबेन गांधी के साथ सोना शुरू कर दिया।
ये आरोप बहुत सनसनीखेज हैं क्योंकि कुसुम अपनी किशोरावस्था में गांधी की अनुयायी भी रही हैं। प्रसिद्ध ब्रिटिश इतिहासकार जेड एडम्स ने पंद्रह वर्षों के गहन अध्ययन और शोध के बाद 2010 में "गांधी: नेकेड एम्बिशन" लिखकर सनसनी मचा दी थी।

किताब में गांधी को असामान्य यौन व्यवहार वाला एक 'सेमी-रिप्रेस्ड सेक्स-मेनियाक' (अर्ध-दमित यौन-उन्मादी) कहा गया है। यह पुस्तक राष्ट्रपिता के जीवन में आने वाली लड़कियों के साथ उनके अंतरंग और मधुर संबंधों पर विशेष प्रकाश डालती है।
उदाहरण के लिए, गांधी लड़कियों और महिलाओं के साथ नग्न सोते थे और नग्न स्नान भी करते थे। देश के सबसे सम्मानित लाइब्रेरियन गिरिजा कुमार ने गांधी से संबंधित दस्तावेजों के गहन अध्ययन और शोध के बाद डेढ़ दर्जन महिलाओं का विवरण दिया है।

जो 2006 में "ब्रह्मचर्य गांधी एंड हिज विमेन एसोसिएट्स" में ब्रह्मचारी सहयोगी थीं। वे गांधी के साथ नग्न सोती थीं, उन्हें स्नान कराती थीं और मालिश करती थीं। इनमें मनु, आभा गांधी, आभा की बहन बीना पटेल, सुशीला नैयर, प्रभावती (जयप्रकाश नारायण की पत्नी), राजकुमारी अमृत कौर,
बीबी अमतुसलाम, लीलावती असर, प्रेमाभन कंटक, मिली ग्राहम पोलक, कंचन शाह, रेहाना तैयबजी शामिल हैं। प्रभावती अपने पति जेपी को छोड़कर आश्रम में रहने चली आई थीं। इस कारण जेपी का गांधी से विशेष विवाद भी हुआ था।

निर्मल कुमार बोस, जो लगभग दो दशकों तक महात्मा गांधी के निजी सहायक थे, ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक "माय डेज विद गांधी" में राष्ट्रपिता के आश्रम की महिलाओं के साथ नग्न सोने और अपने आत्म-नियंत्रण के परीक्षण के लिए मालिश करवाने का उल्लेख किया है।
नोआखली की एक विशेष घटना का जिक्र करते हुए निर्मल बोस ने लिखा, "एक सुबह जब मैं गांधी के बेडरूम में पहुँचा, तो मैंने सुशीला नैयर को रोते हुए और महात्मा को दीवार पर अपना सिर पटकते हुए देखा।"
उसके बाद बोस ने गांधी के ब्रह्मचर्य के अभ्यास का खुलकर विरोध किया। जब गांधी ने उनकी बात नहीं मानी, तो बोस ने खुद को उनसे अलग कर लिया।

एडम्स के अनुसार, गांधी ने स्वयं लिखा है, जब सुशीला स्नान करते समय मेरे सामने नग्न होती हैं, तो मेरी आँखें कसकर बंद हो जाती हैं। मुझे कुछ दिखाई नहीं देता। मुझे केवल साबुन लगाने की आवाज सुनाई देती है। मुझे अंदाज़ा नहीं होता कि वह कब पूरी तरह नग्न है और कब वह सिर्फ अपने अंडरवियर में है।
दरअसल, जब पंचगनी में गांधी के महिलाओं के साथ नग्न सोने की बात फैलने लगी, तो वहाँ नाथूराम गोडसे के नेतृत्व में विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए। इसके कारण गांधी को प्रयोग रोकना पड़ा और वहाँ से अपना बोरिया-बिस्तर समेटना पड़ा।

बाद में, गांधी हत्या के मुकदमे के दौरान, गोडसे के विरोध को गांधी की हत्या के कई प्रयासों में से एक माना गया।
एडम्स का दावा है कि सुशीला, मनु, आभा और अन्य महिलाएं जो गांधी के साथ सोती थीं, उन्होंने हमेशा गांधी के साथ अपने शारीरिक संबंधों के बारे में अस्पष्ट और गोलमोल बातें कीं। जब भी उनसे पूछा गया, उन्होंने केवल यही कहा कि यह सब ब्रह्मचर्य के सिद्धांतों का अभिन्न अंग था।
गांधी की हत्या के बाद उनके यौन प्रयोगों को भी लंबे समय तक दबा दिया गया। उन्हें महिमामंडित करने और राष्ट्रपिता बनाने के लिए उन दस्तावेजों, तथ्यों और सबूतों को नष्ट कर दिया गया, जो यह साबित कर सकते थे कि संत गांधी, वास्तव में, एक 'सेक्स-मेनियाक' थे।

कांग्रेस भी स्वार्थवश गांधी के यौन-प्रयोग से जुड़े सच को छुपाती रही है। गांधी की हत्या के बाद मनु को अपना मुंह बंद रखने का सख्त निर्देश दिया गया था। उन्हें गुजरात के एक बहुत ही दूरदराज के इलाके में भेज दिया गया था।
सुशीला भी इस मुद्दे पर हमेशा चुप रहीं। सबसे दुखद बात यह है कि गांधी के ब्रह्मचर्य के प्रयोग में शामिल लगभग सभी महिलाओं का वैवाहिक जीवन बर्बाद हो गया।

एक ब्रिटिश इतिहासकार के अनुसार, जवाहरलाल नेहरू गांधी को उनके ब्रह्मचर्य के कारण एक अप्राकृतिक और असामान्य व्यक्ति मानते थे। सरदार पटेल और जे.बी. कृपलानी ने उनके व्यवहार के कारण उनसे दूरी बना ली थी।
गिरिजा कुमार के अनुसार, पटेल ने गांधी के ब्रह्मचर्य को अधर्म कहना शुरू कर दिया था। यहाँ तक कि बेटे देवदास गांधी सहित परिवार के सदस्य और अन्य राजनीतिक सहयोगी भी नाराज थे।

बी.आर. अंबेडकर, विनोबा भावे, डी.बी. केलकर, छगनलाल जोशी, किशोरलाल मशरूवाला, मथुरादास त्रिकुमजी, वेद मेहता, आर.पी. परशुराम, जयप्रकाश नारायण भी गांधी के ब्रह्मचर्य के प्रयोग का खुलकर विरोध कर रहे थे।
अब तक बापू की छवि गोल फ्रेम का चश्मा पहने एक ऐसे बूढ़े व्यक्ति की रही है, जो दो युवतियों को लाठी के सहारे की तरह इस्तेमाल करते हुए घूमते हैं। अंतिम समय तक गांधी ऐसे ही राजसी वातावरण में रहे।
साभार 

गुरुवार, 2 अप्रैल 2026

युद्ध जीतकर भी हार गए

1971 की लड़ाई में इंदिरा गांधी की तारीफ तो हम सब करते हैं, लेकिन पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी के संसद में दिए उस धमाकेदार बयान को पढ़ना जरूरी है, जो शिमला समझौते की सच्चाई उजागर करता है।

युद्ध की पृष्ठभूमि
1971 के युद्ध में पाकिस्तान के 93,000 से अधिक सैनिक भारतीय कैद में थे, जिनमें 3,000 से ज्यादा अधिकारी शामिल थे।

भारतीय सेना ने सिंध के थारपारकर जिले के बड़े हिस्से पर कब्जा कर लिया था और उसे गुजरात का नया जिला घोषित करने की घोषणा की थी।

मुजफ्फराबाद में भी तिरंगा फहराया गया था, लेकिन ये सारी जीत मैदान में हुई—मेज पर कुछ और ही हुआ।

शिमला समझौते का खेल
जुल्फिकार अली भुट्टो अपनी बेटी बेनजीर भुट्टो को लेकर शिमला आए, जहां इंदिरा गांधी ने कश्मीर की मांग रखी—93000 सैनिकों के बदले कश्मीर दो।

 भुट्टो ने साफ इनकार कर दिया: "कश्मीर नहीं देंगे, सैनिक रख लो।" जिनेवा कन्वेंशन के तहत युद्धबंदियों की गरिमा बनाए रखना भारत पर था, जिसका बोझ इंदिरा नहीं झेल सकीं।

भुट्टो की कूटनीति
भुट्टो ने बेनजीर से कहा कि भारत की कमर टूट चुकी—शरणार्थियों का बोझ, अर्थव्यवस्था चरमराई, 93000 सैनिक पालना असंभव।

 उन्होंने इंदिरा को घेर लिया, जैसे सांप के गले में छछूंदर फंस जाए। पुपुल जयकर और कुलदीप नैयर की किताबों में लिखा है कि इंदिरा के पास कूटनीतिक दांव का ज्ञान नहीं था, वो मौके चूक गईं।

समझौते का नतीजा
शिमला समझौते (1972) में इंदिरा ने कश्मीर मुद्दा द्विपक्षीय रखा, 93000 पाक सैनिक लौटा दिए, थारपारकर (जहां 1971 में हिंदू बहुल आबादी थी) पाकिस्तान को वापस कर दिया।

 भारत के 54-56 सैनिक पाक जेलों में, मरते रहे।

सेना प्रमुख का गुस्सा
तत्कालीन सेना प्रमुख ने रिटायरमेंट के बाद किताब में लिखा: "मैदान में हम जीते, लेकिन राजनेताओं ने मेज पर हरा दिया—वो इंदिरा गांधी थीं।"

 आसिफ जरदारी ने संसद में कहा कि भुट्टो ने इंदिरा से जमीन वापस ले ली, जबकि 90,000 कैदी भारत के पास थे।

कांग्रेस का इतिहास यही बताता है—युद्ध जीता, लेकिन कूटनीति में बर्बादी। ये दमदार सबक है कि ताकत मैदान तक सीमित न रहे।

सोमवार, 23 मार्च 2026

देश के लाल

जब शास्त्री जी का निधन हुआ,
देश रोया…लेकिन असली दर्द तो तब लगा
जब उनका बैंक बैलेंस निकला। क्या मिला? 

👉बैंक का कर्ज! 
👉 कुछ कपड़े
👉 कुछ पुरानी किताबें
👉 और किराए की पावती
जो अपने परिवार के लिए भी कर्ज छोड़ गया था।

लाल बहादुर शास्त्री..
उन्होंने अपने लिए पहली कार खरीदनी चाही — एक साधारण Fiat.
बैंक में करीब ₹7,000 थे, पर कार की कीमत लगभग ₹12,000।
इसलिए उन्होंने PNB से ₹5,000 का लोन लिया।
हाँ, देश का प्रधानमंत्री… अपनी कार के लिए बैंक से क़र्ज़ ले रहा था।

और दिल टूट जाता है ये जानकर कि
1966 में उनके निधन के समय वह लोन बाकी था।
किसी उद्योगपति ने, किसी मंत्री ने, किसी बड़े नेता ने वह लोन नहीं चुकाया।
वो क़र्ज़ उनकी पत्नी ने अपनी पेंशन से पूरा चुकाया।

ये होती है ईमानदारी।
ये होती है राजनीति नहीं, सेवा।

ना करोड़ों की संपत्ति…
ना हवेली…
ना जमा खाते…
बस एक सादगी भरी ज़िंदगी, और करोड़ों लोगों के दिलों में जगह।

बस इतना ही नहीं..

प्रधानमंत्री थे…
लेकिन जाते-जाते भी
अपने बच्चों को कर्ज छोड़ गए।
सम्पत्ति नहीं।

कभी सोचा है?
इतिहास में ऐसे लोग रोज़ नहीं मिलते।
शायद शताब्दी में एक बार आते हैं।

“सादगी जिसका गहना थी, ईमानदारी जिसकी पहचान थी वो चला गया, लेकिन हमें बता गया कि कुर्सियाँ नहीं—कर्म महान होते हैं।
लाल बहादुर शास्त्री… एक नाम नहीं, एक मानक थे।”

यह जानकारी दिल को छू गई हो तो एक लाइक जरूर करें और अगर शास्त्री जी के लिए सम्मान है,
तो “जय जवान जय किसान”
कमेंट में खुद-ब-खुद उतर जाएगा।
#LalBahadurShastri #जय_जवान_जय_किसान 

बुधवार, 18 मार्च 2026

जब अटल सरकार को गिराया था

जूते में दाल बंट रही है
भाजपा  कॉंग्रेस को उसके स्टाइल में ही जवाब दे रही है

बस उसी जूते से मार रहे हैं जिस जूते से कभी कांग्रेस ने अटल जी को मारा था आज मोदी शाह उसी जूते से कांग्रेस को दाल परोस रहे हैं।

इसे ही कहते हैं'मीयां की जूती मीयां के सर।'

आज कांग्रेसी नेताओं को सुनेंगे तो यह कहेंगे बीजेपी में नैतिकता नहीं है।
बीजेपी विधायक खरीद रही है।
बीजेपी सांसद खरीद रही है।
बीजेपी सरकार गिरा रही है।ब्ला ब्ला प्याँ प्याँ 

अटल जी के साथ इस सोनिया गांधी और उसके सलाहकार अहमद पटेल ने जो कुछ किया था पत्रकार स्वप्नदास गुप्ता के अनुसारः-'अटल जी के आंखों में आंसू आ गए थे और वहां मौजूद कई लोगों ने अटल जी को रोते देखा था।'16 अप्रैल 1999 को अटल जी के सरकार का बहुमत परीक्षण होने वाला था अटल जी आश्वस्त थे कि वह बहुमत साबित कर देंगे।

कांग्रेस ने इतना गंदा खेल खेला की एनडीए में शामिल अकाली दल के सांसद इंद्रकुमार गुजराल को तोड़ा और गुजराल ने ह्विप का उल्लंघन करके अटल जी के खिलाफ वोट डाला।

इसके अलावा उस वक्त फारुख अब्दुल्ला की पार्टी नेशनल कांफ्रेंस जो NDA में शामिल थी।

उस नेशनल कांफ्रेंस के सैफुद्दीन सोज को अहमद पटेल ने कुरान की कसम देकर अटल जी के सरकार के खिलाफ वोट देने को कहा था। यह सब तो ठीक था ।

उससे भी बढ़कर नीचता देखकर उस वक्त सब चौंक गए कि जब 15 फरवरी को ही उड़ीसा के मुख्यमंत्री का शपथ ले चुके गिरधर गोमांग सदन में आ गये थे।
नैतिकता के अनुसार जब वह मुख्यमंत्री पद का शपथ ले लिए तब उन्हें संसद से इस्तीफा दे देना चाहिए था। लेकिन फरवरी में वह मुख्यमंत्री बने और अप्रैल तक उन्होंने सांसद पद से इस्तीफा नहीं दिया।

यह तो अटल जी की महानता थी कि उन्होंने सदन में खड़े होकर कहा थाः
'मैं सोनिया गांधी और गिरधर गोमांग के विवेक पर छोड़ता हूं कि क्या वह जो कर रहे हैं वह नैतिक रूप से ठीक है और मुझे विश्वास है कि अपनी अंतरात्मा की आवाज मानते हुए गिरधर गोमांग सदन की वोटिंग में हिस्सा नहीं लेंगे क्योंकि वह एक मुख्यमंत्री बने हैं।'

लेकिन उसके बावजूद भी भारत के लोकतंत्र का बलात्कार करते हुए सोनिया गांधी ने गिरधर गोमांग से वोट दिलवाया था और मात्र एक वोट से अटल जी की सरकार गिर गयी थी।बाद में लॉबी में सारे पत्रकार थे और अटल जी की आंखें आंसुओं से भरी हुई थी

क्योंकि अटल जी को विश्वास था की सोनिया गांधी और गिरधर गोमांग देश के लोकतंत्र का सम्मान करेंगे।

एक जमाना था जब बीजेपी में नैतिकता उदारवादी बहुत चलती थी और जिसका फायदा इन कांग्रेसियों ने उठाया।

अब मोदी और अमित शाह कांग्रेस को एक-एक वोट के लिए एक-एक सरकार के लिए तरसा दे रहे हैं। 

जब भी कोई कांग्रेस की सरकार गिरती है तो कसम से मेरे दिल को बड़ा सुकून मिलता है।
   🚩🇮🇳🚩

देश में गद्दार

भारत कभी विकसित या विश्वगुरु नहीं बन सकता क्योंकि भारत में गद्दारों की कमी नहीं है, भारत में देशद्रोही कांग्रेस को सपोर्ट करने वाले गद्हे है,

ये कांग्रेसी LPG गैस सिलेंडर के नाम पर ऐसे रंडी रोना रो रहे है, जैसे सामूहिक शोक हो गया हो

दूसरे देशों में युद्ध छिड़ा है तो भारत के कांग्रेसी सपाई राजद आप और कम्युनिस्टों का गैस के नाम पर रो-रोकर बुरा हाल है
जरा सोचिए कि अगर अपना देश महीने भर के लिए युद्ध में चला जाए तो ये लोग क्या करेंगे ?

अमेरिका, इजरायल, ईरान में युद्ध हो रहा है तो मोदी क्या करे ? सेना लेकर कूद जाए कि हमारे तेल के भेजो, बाद में फिर लड़ लेना क्योंकि हमारे विपक्षीयों को सिलेंडर सुलगाकर उस पर पिछवाड़ा सेंकना है
जरा भी कॉमनसेंस और देश के प्रति वफादारी नहीं है ईन गद्दारों के पास अरे ये समस्या सिर्फ भारत का नहीं है, पुरा विश्व इस संकट से जूझ रहा है,
जब भारत LPG का 60% हिस्सा आयात करता है और खाड़ी देशों में युद्ध छिड़ा है तो थोड़ा बहुत क्राइसिस होगा ही,
फिर गैस एजेंसिया क्राइसिस को बढ़ावा देंगी, फिर विपक्षी नेता इस क्राइसिस को और बढ़ावा देंगे और जनता LPG के नाम पर हाय हाय मोदी मर जा तू कहते हुए दहाड़ें मारकर रोएगी

कुछ वर्ष पूर्व भारत में अफ़वाह उड़ी कि नमक खत्म हो गया तो पुरा भारत किराना की दुकानों पर लाइन में लग गई थी और 50-50 किलो नमक ख़रीदकर घरों में रख लिया था,

हम नमक के लिए रोने लगते हैं, प्याज के नाम पर रोते हैं, LPG के लिए रो रहे हैं और फिर भी कहते हैं कि हम तो विश्वगुरु और विकसित बनेंगे,

भारत कृषि प्रधान देश है लेकिन चूतियों पाकप्रस्त और दोगले सेकुलरों से परेशान है

भारत में दोगले लोग ईरान का समर्थन कर रहे हैं जहां भयानक महंगाई है, जरूरत की कोई वस्तु वहां नहीं मिल रही हैं.
इनको ईरान का समर्थन करना है, जो ईरान ताबड़तोड़ बम और मिसाइलें मार रहा है, भयानक तबाही मची है. लेकिन LPG संकट के नाम पर रंडी रोना भी करना है

भाई, भारत ही नहीं बल्कि दुनिया के हर देश में ईरान युद्ध के कारण ऊर्जा पदार्थों का संकट आया है तो इस समय रोने की नहीं धैर्य की जरूरत है



वैसे इसमें एक वर्ग उन लोगों का भी है, जिनके पास 5/7 साल पहले तक गैस सिलेंडर नहीं थे, मोदी जी ने ही इन्हें उज्ज्वला गैस सिलेंडर दिए और मोदी के दिए हुए सिलेंडर ही मोदी पर भारी पड़ रहे हैं,

अरे धैर्य रखो यार सिलेंडर तो मिल ही जायेगा तब तक इंडेक्शन ले लो, नहीं तो चूल्हे पर पका लेना

देश के प्रति कुछ तो दायित्व निभाओ
ये देश सिर्फ उनका ही नहीं है जो सीमा पर लड़कर मर जाते हैं, ये देश आपका भी है और सिर्फ वोट देकर आप अपने दायित्व की इतिश्री नहीं कर सकते,

जब संकट भी घड़ी हो आपको भी सैनिक बनकर किसी युद्ध लड़ना पड़ सकता है,
ऐसा युद्ध वतन की ख़ातिर सबको लड़ना पड़ सकता है
संकट की घड़ियों में सबको सैनिक बनना पड़ता है

सोमवार, 16 मार्च 2026

मोदीजी हैं तो मुमकिन है

......आज से 25-30 साल बाद...जब दुनिया का इतिहास लिखा जाएगा...उस समय के नेता जब  दुनिया मे कूटनीति का उदाहरण देंगे...तब ये बताया और पढाया जाएगा कि....

* जब Strait Of Hormuz के एक तरफ के देश...सऊदी अरब...कुवैत...UAE...बहरीन....दूसरी तरफ के देश...ईरान के साथ युद्ध लड़ रहे थे...और Strait Of Hormuz से कोई जहाज नहीं निकल पा रहा था....तब दुनिया मे एक नेता था....जो अपने देश के लिए...अरब...UAE और कुवैत से तेल और गैस खरीद रहा था....और ईरान उसके जहाज को Strait Of Hormuz से सुरक्षित निकाल रहा था.

* जब रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध चल रहा था...तब दुनिया मे एक नेता ऐसा था...जो यूक्रेन से अपने देशवासियों को सुरक्षित निकाल रहा था...और रूस ने सिर्फ उसके लिए युद्ध रोक दिया था.

* जब रूस यूक्रेन युद्ध की वजह से अमेरिका और यूरोप ने रूस पर प्रतिबंध लगा दिए थे.....तब दुनिया मे एक ऐसा नेता था....जो रूस से तेल खरीद रहा था....और यूरोप को बेच रहा था...ताकि उनकी ऊर्जा जरूरतें पूरी हो सकें.

* जब फिलिस्तीन और इजराइल मे युद्ध चल रहा था....तब दुनिया मे एक ऐसा नेता था....जिसे फिलिस्तीन और इजराइल दोनों ने अपना सर्वोच्च सम्मान दिया.

* जब अमेरिका- यूरोप...और...रूस- चीन एक दूसरे के दुश्मन थे...तब दुनिया मे एक ऐसा नेता था...जो रूस से भी मजबूत दोस्ती रखता था...अमेरिका से भी मजबूत दोस्ती रखता था...और यूरोप और चीन से भी व्यापार कर रहा था.

* उस नेता का नाम नरेंद्र मोदी था....और वो भारत के प्रधानमंत्री थे.....जिन्होंने 20 साल (2014-2034) तक भारत की सेवा की...और उनके शासन में भारत दुनिया का सबसे चहेता देश था....जिससे सब दोस्ती करना चाहते थे.

नमो नमः 🙏🚩
Nation First 🇮🇳🚩

रविवार, 1 मार्च 2026

अगर - मगर न होता तो

कांग्रेसी नेता राजीव शुक्ला ने कहा था कि नरेंद्र मोदी ''अगर '' प्रधानमंत्री नहीं होते तो अमेरिका उन्हें अपने यहां कभी नहीं बुलाता....!!

माननीय शुक्ला जी और कांग्रेसियों अब मैं तुम्हे इस   "अगर"   की कहानी सुनाता हूँ...

1)  अगर राहुल गांधी, सोनिया का बेटा नहीं होता तो आज किसी 0ffice में चपरासी होता...!!😂😂

2) अगर सोनिया राजीव की पत्नी नहीं होती तो यूरोप के किसी बार की रिटायर्ड बार बाला होती...!!😂😂

3) अगर राजीव , इंदिरा गांधी का बेटा नहीं होता तो एक ''पायलट'' ही रह कर दिन गुजारता...!!😂😂

4) अगर इंदिरा गांधी , नेहरू की बेटी न होती , तो एक सामान्य गृहिणी बनी रहती...!!😂😂
 5) अगर गांधी - नेहरू ने जिन्ना के साथ मिलकर सत्ता के लालच में भारत की जनता से गद्दारी न की होती आज अखंड भारत एक होता....!!. 😂😂

6) “अगर " नेहरू बेइमानी करके सरदार वल्लभ भाई पटेल की जगह प्रधानमंत्री नहीं बनता तो आज चीन इतना प्रभावी नही होता , और न ही पाकिस्तान का जन्म होता , न ही ये कश्मीर समस्या होती...!!😂😂

   7) और "अगर " ये कांग्रेस ही नहीं होती , तो फिर ये नकली गांधी परिवार भी नहीं होता. पूरा देश इन गद्दारों और घोटालेबाजों के चंगुल में फंसकर भाई-भतीजा वाद और साम्प्रदायिक हिंसा में बर्बाद न हुआ होता. बल्कि भारत विश्व के समस्त देशों का सरताज  होता...!!😂😂

   "राजीव शुक्ला जी...." 
“अगर " नरेंद्र मोदी भारत के प्रधानमंत्री नहीं होते तो अमेरिका के प्रमुख की आंखों में आंखें मिला कर बात करने वाला भारत का और कोई प्रधानमंत्री नहीं होता...!! 😂😂

जय हिन्द__जय भारत 🙏🏼🙏🏼

गुरुवार, 26 फ़रवरी 2026

जतीन्द्र नाथ मुखर्जी / बाघा जतिन

उस दिन अगर वो गद्दारी न हुई होती... तो 1915 में ही हम आज़ाद हो गए होते और 'राष्ट्रपिता' ये व्यक्ति होता 👇!"
खून खौल उठता है यह सोचकर कि जिस शेर ने अकेले दम पर रॉयल बंगाल टाइगर के जबड़े फाड़ दिए थे, उसे हम हिंदुस्तानियों ने ही अकेला छोड़ दिया। हम 1947 की आज़ादी की सालगिरह मनाते हैं, लेकिन उस 10 सितंबर 1915 की उस काली दोपहर को भूल गए, जब एक महानायक का सपना अपनों की ही मुखबिरी की भेंट चढ़ गया।
आज दिल बहुत भारी है यह सोचकर कि हमारे देश का इतिहास कितना अलग होता, अगर उस दिन अपनों ने ही पीठ में छुरा न घोंपा होता। हम 1947 की आजादी का जश्न मनाते हैं, लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि एक शख्स ऐसा भी था जिसने 1915 में ही भारत को आजाद कराने का पूरा ब्लूप्रिंट तैयार कर लिया था।
​मैं बात कर रहा हूँ जतीन्द्रनाथ मुखर्जी की, जिन्हें दुनिया 'बाघा जतिन' के नाम से जानती है।

​सोचिए, वो कैसा फौलादी इंसान रहा होगा जिसने बिना किसी बंदूक के, सिर्फ एक छोटी सी खुखरी से रॉयल बंगाल टाइगर को ढेर कर दिया था। लेकिन उनका असली मुकाबला उन 'सफेद भेड़ियों' से था जिन्होंने हमारी मां भारती को जकड़ रखा था। जतिन दा का एक ही मंत्र था "देश के लिए मरना सीखो, ताकि देश जी सके।"
​मुझे उनकी वो बातें आज भी झकझोर देती हैं
​साहस का वो मंजर जब अंग्रेजों ने गाड़ी की छत पर बैठकर भारतीय महिलाओं का अपमान किया, तो जतिन दा अकेले उन पर टूट पड़े और तब तक मारा जब तक कि अंग्रेज पैरों में नहीं गिर गए। उस दौर में, जहाँ लोग अंग्रेजों के साये से डरते थे, जतिन दा उन्हें बीच सड़क पर पीट दिया करते थे।
​विवेकानंद का वो प्रभाव जो स्वामी जी ने उन्हें सिखाया था कि लोहे की मांसपेशियों में ही वज्र जैसा संकल्प रहता है। और जतिन दा ने उसे जी कर दिखाया।
​गद्दारी की वो चोट जब उन्होंने जर्मनी से हथियार मंगाकर पूरे देश में एक साथ बगावत की योजना बनाई थी। चेक जासूस रॉस हेडविक ने खुद लिखा था कि अगर वह प्लान कामयाब हो जाता, तो आज राष्ट्रपिता बाघा जतिन होते। पर अफ़सोस, एक गद्दार की मुखबिरी ने हमें 32 साल और गुलामी की आग में झोंक दिया।
​10 सितंबर 1915 को जब उन्होंने अस्पताल में आखिरी सांस ली, तो उनका शरीर गोलियों से छलनी था, लेकिन चेहरे पर हार का गम नहीं, बल्कि भारत माता के प्रति समर्पण की चमक थी।आज समय है यह पूछने का कि क्या हमारी देशभक्ति सिर्फ 15 अगस्त और 26 जनवरी के स्टेटस तक सीमित है? बाघा जतिन और उनके साथियों ने जब बूढ़ी बालम की तट पर आखिरी गोलियां झेली थीं, तो उनके सामने कोई निजी स्वार्थ नहीं था। उन्हें पता था कि वह शाम उनकी आखिरी शाम है, फिर भी उन्होंने समर्पण के बजाय संघर्ष को चुना।
इतिहास गवाह है कि हम दुश्मनों से कभी नहीं हारे, हम तब-तब हारे जब घर के ही किसी भेदी ने दरवाज़ा खोल दिया। आज बाघा जतिन को सच्ची श्रद्धांजलि यह नहीं होगी कि हम उनकी तस्वीर पर फूल चढ़ाएं, बल्कि यह होगी कि:
हम अपने इतिहास के उन विस्मृत नायकों (Forgotten Heroes) को पहचानें।
राष्ट्रहित को व्यक्तिगत लाभ से ऊपर रखें, ताकि फिर कभी कोई 'मुखबिरी' किसी क्रांतिकारी के सपने को न कुचल सके।
अपनी आने वाली पीढ़ियों को बताएं कि आज़ादी केवल अहिंसा के चरखे से नहीं, बल्कि जतिन दा जैसे शेरों के लहू से भी सींची गई है।
याद रखिये, जो राष्ट्र अपने बलिदानियों को भूल जाता है, उसका भूगोल बदल जाता है। जतिन दा का शरीर उस दिन गोलियों से छलनी हुआ था, लेकिन उनकी रूह आज भी हर उस हिंदुस्तानी में ज़िंदा है जो अन्याय के खिलाफ खड़ा होने का हौसला रखता है।
उठो! और अपने अंदर के उस 'बाघा' को जगाओ, जो देश के लिए मरने से पहले, देश के लिए जीना जानता हो।"
​आज जब हम आजादी की खुली हवा में सांस लेते हैं, तो एक पल के लिए रुक कर सोचिएगा जरूर... क्या हम उन बलिदानों के लायक बन पाए हैं? जतिन दा जैसे नायक इतिहास की किताबों के किसी कोने में खो गए हैं, लेकिन हमारे दिलों में उनकी मशाल जलती रहनी चाहिए।
​बाघा जतिन जैसे महान क्रांतिकारी के चरणों में मेरा कोटि-कोटि नमन।

बुधवार, 25 फ़रवरी 2026

राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह

दोस्तों ज्ञानी जैल सिंह भारत के पूर्व राष्ट्रपति थे और उन्हें 
Z ±security मिली थी और अब उन्होंने दिल्ली में घोषणा कर दी की कल मैं चंडीगढ़ पहुंचने पर बोफोर्स धोटाले के सारे राज खोलने वाला हूं,,,,,,

 तो हुआ ये की दिल्ली-चंडीगढ़ मार्ग पर सामने से एक ट्रक आया और दनदनाता हुआ ज्ञानी जैलसिंह की कार को कुचल हुए आगे निकल गया और उनका वहीं रामनाम सत्य हो गया,,,,,,
और उस दुर्घटना की कोई जांच नहीं हुई,,,,,

दोस्तों एक बार राजेश पायलट ने कांग्रेस नेत्री की सलाह को ना मानते हुए एक घोषणा कर दी की कल मैं कांग्रेस अध्यक्ष पद हेतु नामांकन भरूँगा,,,,,

बस फिर क्या था, सामने से एक बस आई और उनकी कार को लपेटती हुई चली गई और उनका वही रामनाम सत्य हो गया,,,,,

श्रीमन्त माधवराव शिन्दे (सिंधिया) को तो आप लोग जानते ही होंगे लोकसभा चुनाव के पहले कांग्रेस के सबसे लोकप्रिय वा कर्मठ नेता थे और वो लोकसभा के लिए लगातार 9वीं बार चुने गए थे तथा लोकसभा में विपक्ष के नेता भी थे,,,,,,

कांग्रेस राजमाता ने उत्तर प्रदेश के कांग्रेस अध्यक्ष को कहा की मैं प्रचार करने आ रही हूँ लेकिन प्रदेश अध्यक्ष निर्भीक था उसने कहा आप मत आइए बल्कि माधवराव जी को भेज दीजिए,,,,,

यहां वो ही वोट दिलवा सकते हैं बस फिर क्या था माधवराव जी को आदेश आया की आप अपने निजी विमान से ना जाकर इस दूसरे विमान से जाएंगे,,,,,,,

उस समय एक चश्मदीद किसान ने भी बयान दिया था विमान में पहले बम विस्फोट हुआ उसके बाद आग लगी और विमान में सवार आठों लोगों का रामनाम सत्य हो गया,,,,,,,

लेकिन इसकी कोई जांच नही हुई और थोड़े समय के बाद कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष भी रामनाम सत्य हुए पाए गए,,,,,

और क्रमशः इसी तरह से 1965 की लड़ाई के विजेता प्रधानमंत्री श्री लाल बहादुर शास्त्री जी,,डॉ होमी जहांगीर भाभा के साथ करीब 2500 से भी ज्यादा इसरो और डीआरडीओ के वैज्ञानिक और टॉप इंजीनियरों का भी बहुत ही संदेहपूर्ण स्थिति में रामनाम सत्य हो गया,,,,,जिसकी भी कोई जांच तक नही की गई,,,,

राजीव गांधी ने अपने जीवन काल मे टोटल 181 रैलिया की थीं और जिसमें से 180 रैलियों मे सोनिया गांधी भी उसके साथ थी बस उस 181वीं रैली मे वो राजीव गांधी के साथ नही थी,,,,
और उसी रैली मे उनका रामनाम सत्य हो गया,,,,,, 

 राजीव गांधी की हत्या के समय वहां मौजूद 14 अन्य लोगों की भी मौत हुई थी मगर सबसे खास बात ये हुई की उन 14 मरने वालों मे एक भी कोंग्रेसी नेता नहीं था मतलब जो भी मरे वो आम लोग ही थे,,,, 

ऐसा कैसे हो सकता है की प्रधानमंत्री रैली कर रहा हो और पार्टी का अन्य कोई नेता वहां मौजूद ना हो,,,,,,,

राजीव गांधी के साथ बड़ा या छोटा कोई कांग्रेसी नेता नहीं मरा और ना ही सोनिया गांधी जो की हर सभा में राजीव गांधी जी के साथ रहतीं थीं और उस दिन होटल में सरदर्द के कारण रुक गईं थी 

अब ये संयोग हो सकता है लेकिन बात कुछ हजम नही होती,,,,,

और बाद में जब स्वयं प्रियंका गांधी ने अपने पिता राजीव के कातिल को कोर्ट में माफ करने की अपील कर दी थी,,,,
तब से बात और नही हजम हो रही,,,,,,

अब ये समझ लीजिए की जब से चमचों की राजमाता इस परिवार की बहू बनकर आई हैं तब से आज तक गांधी परिवार के एक भी सदस्य को प्राकृतिक मृत्यु का सौभाग्य प्राप्त नहीं हुआ है,,,,,

इंदिरा गांधी के पुत्र संजय गांधी के ससुर कर्नल आनंद अपने ही फार्म हाउस के पास थोड़ी दूरी पर गोली लगने से मरे पाये गये थे,,

और संजय गांधी,,, बताओ हवाई जहाज से नीचे गिर गये और उनका रामनाम सत्य हो गया,,,,,,

अब इंदिरा गांधी का कैसे रामनाम सत्य हुआ वो तो सब जानते ही हैं,,,,

प्रियंका गांधी के ससुर राजेन्द्र वाड्रा दिल्ली के एक गेस्ट हाउस मे पाये गये उनका रामनाम सत्य हो गया था,,तथा ननद का जयपुर दिल्ली हाइवे में कार दुर्घटना में रामनाम सत्य हो गया और देवर मुरादाबाद के एक होटल में रामनाम सत्य हुआ पाया जाता है,,,,,

राजेश पायलट एक सड़क दुर्घटना में लपेट दिया जाता है और माधवराव सिंधिया जहाज दुर्घटना में लपेट दिए जाते है,,,,,,

अब इन सब बातों मे जो सबसे खास बात है वो ये है की जब संसद पर हमला होता है तो मां बेटे दोनो अनुपस्थित थे मतलब राहुल जी और सोनिया जी दोनो ने एक साथ छुट्टी मार दी और संसद मे नही गये,,,,,,,
अब मेरा कहने का मतलब ये कतई नही है की ये सब कांड किसी साजिश तहत हुए,,,, लेकिन बहुत गजब के संयोग बने थे,,,,,,

#rashtriya #sanatan #sangh #highlight #viralphoto #follower #nonfollower #friend

राजीव गाँधी?

राजीव गांधी को भूल कर भी मत भूलिएगा

भगवान का शुक्र है कि उस दौर में सोशल मीडिया नहीं था नहीं तो राहुल गांधी से भी बड़े थे राजीव गांधी।

आज कुछ किस्से मै आपको बताने जा रहा हूं जिसे पढ़कर आप दंग रह जाएंगे कि राजीव गांधी जैसे लोग भी इतने बड़े देश के प्रधानमंत्री बन गए!!!

राजीव गांधी के पास सिर्फ एक ही योग्यता थी कि वो फिरोज गांधी के बेटे थे... और उससे भी ज्यादा जरूरी... वो पंडित नेहरू के नाती थे।

राजीव गांधी पढ़ाई लिखाई में फिसड्डी थे। 5 Star Doon School से स्कूलिंग के बाद 1961 में उन्हें इंजियनीरिंग पढ़ने लन्दन के ट्रिनिटी कॉलेज कैब्रिज भेजा गया।

यहीं पर राजीव से एडवीज अंतोनियो अल्बिना माइनो जिन्हें आज हम सोनिया गांधी के नाम से जानते हैं के सम्पर्क में आये।

1965 तक वो Antonio Mayno के प्यार में डूबे रहे और निरंतर फेल होते रहे और पास नहीं हो सके जिसके बाद कॉलेज ने राजीव को निकाल दिया।

फिर राजीव ने 1966 में लन्दन स्थित इम्पीरियल कॉलेज में मैकेनिकल इंजीनियरिंग में दाखिला लिया, किन्तु वहां भी फेल हुए।

उसी वर्ष राजीव की मां इंदिरा प्रधानमंत्री बनी और राजीव भारत आ गए, 1966 में दिल्ली फ्लाइंग क्लब ज्वाइन किया और प्लेन उड़ाना सीखने लगे।

अब 1970 में प्रधानमंत्री इंदिरा ने जुगाड़ लगवा कर राजीव को सरकारी एयरलाइंस एयर इंडिया में कमर्शियल पायलट के तौर पर नौकरी में लगवा दिया।

1971 में भारत पाक युद्ध हुआ भारतीय सेना व् वायु सेना को लाजिस्टिक स्पोर्ट के लिए पायलट्स की आवश्यकता थी और एयर इंडिया के कमर्शियल पायलट्स को रसद एवं हथियार एयर ड्राप करने हेतु बुलाया गया।

सारे के सारे पायलट्स तुरन्त युद्ध क्षेत्र में सेवाएं देने को आ गये सिवाय एक के और वो राजीव गांधी थे जो डर के मारे सोनिया गांधी संग दिल्ली में इटली के दूतावास में जा छिपे थे।

1980 में संजय गांधी की मृत्यु के बाद राजीव राजनीती में आये।

1984 में इंदिरा गांधी को उनके अंगरक्षकों ने दोपहर में गोली मार दी। राजीव गांधी ने मां की मृत्यु के शोक संताप में समय लगाने के बजाय उसी दिन शाम को भारत के प्रधानमंत्री की कुर्सी पर अपनी तशरीफ़ रख दी।

और कांग्रेसियों को सिखों का नरसंहार करने का आदेश दे डाला, कांग्रेसियों ने स्कूलों के रजिस्टरों और वोटर लिस्ट निकाल निकाल कर सिखों के घर खोजे और घरों में घुसकर हजारों सिखों को काटा। सिख महिलाओं से दुष्कर्म किया।

कई गर्भवती महिलाओं को जीवित ही जला दिया।

सिखों को और उनके बच्चो को, उनकी सम्पत्तियों को फूंकने हेतु कांग्रेस नेताओं के पेट्रोल पंपों से पेट्रोल सप्पलाई किया गया। सड़क चलते सिखों के गले में टायर डालकर जला दिया गया।

यहाँ तक कि तत्कालीन राष्ट्रपति जैल सिंह को भी नहीं बख्शा गया और जब वो गाड़ी में थे तो उनपर भी कांग्रेसियों ने हमला किया। गाड़ी के कांच तोड़ दिए गए।

दिल्ली में कांग्रेसियों का हिंसा का तांडव शुरू हुआ और शीघ्र ही ये देश के कोने कोने में फ़ैल गया।

और राजीव गांधी ने इंदिरा की मृत्यु का बदला देश भर में हजारों निर्दोष सिखों को मौत के घाट उतरवाकर लिया।

और बाद में राजीव गांधी ने उसे “बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती हिलती है” वाला ब्यान देकर उसे न्यायोचित ठहरा दिया।

खैर अगले चुनाव हुए और जनता ने राजीव द्वारा करवाये सिख नरसंहार को महत्व दिए बिना राजीव को इंदिरा की सहानुभूति के नाम पर 411 सीटें देकर असीम शक्ति दे दी..

और राजीव ने निरंकुश होकर उस बहुमत का दुरूपयोग किया,

1985 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा शाहबानो को न्याय देकर मुस्लिम महिलाओं के लिए तीन तलाक से बचने और गुजारे भत्ते का जो मार्ग खोला था उसपर आतातायी राजीव ने अपनी अक्ल पर पड़ा बड़ा वाला भीमकाय पत्थर दे मारा।

और अपुर्व बहुमत का प्रयोग कर मुस्लिम तुष्टिकरण का नया अध्याय लिखा और सुप्रीम कोर्ट का निर्णय पलटकर मुस्लिम महिलाओं को पुनः गुलाम बना दिया।

भोपाल गैस कांड हुआ हजारों निर्दोष लोगों के हत्यारे यूनियन कार्बाइड के मालिक वारेन एंडरसन को राजीव ने अमेरिकी सरकार से सौदेबाजी कर सुरक्षित अमरीका भेज दिया।

राजीव में न वैश्विक कूटनीति की समझ थी, न सैन्य शक्ति के सदुपयोग की समझ थी। अतः अपने सीमित विवेक क्षमता से ग्रस्त राजीव गांधी ने श्रीलंका में LTTE से लड़ने भारतीय सेना जबर्दस्ती भेज दी। और इंडियन पीस कीपिंग फोर्सेस के 1400 सैनिक मरवाये और 3000 सैनिक घायल करवाये

हलांकि बाद में राजीव को थूककर चाटना पड़ा और सैनिकों को वापस बुलाना पड़ा। राजीव को अपनी उस गलती के कारण ही श्रीलंका दौरे पर श्रीलंकाई सैनिक द्वारा हमला किया गया था।

वो पहले व् एकमात्र प्रधानमंत्री बने जिन्हें विदेशी धरती पर विदेशी सैनिक द्वारा अपमानित होना पडा!

1989 में बोफोर्स का घोटाला खुला जिसमे पता चला की राजीव गांधी ने सोनिया के “करीबी” जिसे सोनिया अपने संग इटली से दहेज़ में लायी थी और जो सोनिया राजीव के घर में ही रहता था उस ओटावियो कवात्रोची के द्वारा बोफोर्स सौदे में राजीव ने दलाली खायी थी।

1991 में Schweizer Illustrierte नामक स्विस मैगज़ीन ने काले धन वाले उन लोगों के नाम का खुलासा किया जिनका अवैध धन स्विट्ज़रलैंड के बैंकों में जमा था।

और उसमें राजीव गांधी का भी नाम था। मैगज़ीन ने खुलासा किया कि राजीव गांधी के 2.5 बिलियन स्विस फ्रैंक स्विट्ज़रलैंड के बैंक के एक अकाउंट में जमा हैं

1992 में टाइम्स ऑफ़ इंडिया और द हिन्दू ने खबरें छापीं की राजीव गांधी को सोवियत ख़ुफ़िया एजेंसी KGB से निरंतर धन मिलता था। रूस ने इस खबर की पुष्टि भी की थी और सफाई में कहा था कि सोवियत विचारधारा के हितों की रक्षा हेतु ये पैसे दिए जाते रहे हैं।

1994 में येवगिनिया अल्बट्स और कैथरीन फिट्ज़पेट्रिक ने KGB प्रमुख विक्टोर चेब्रिकोव के हस्ताक्षर युक्त पत्र प्रस्तुत कर ये खुलासा किया कि राजीव के बाद राजीव के परिवार, सोनिया और राहुल को KGB की ओर से धन उपलब्ध करवाया जाता रहा और KGB गांधी परिवार से निरन्तर संपर्क में रहती थी।

अब यदि आप पूरा आकलन करें तो पाएंगे कि राजीव एक औसत से कम समझदार वो व्यक्ति थे जिसने

निर्दोष सिख मरवाये,

भोपाल गैस कांड में हजारों निर्दोषों के हत्यारे को भगाया।

मुस्लिमों महिलाओं का जीवन नर्क बनाया।

रक्षा सौदों में दलाली खायी।

KGB जैसी एजेंसी के वो खुद एजेंट थे और उससे पैसे लेते थे, कूटनीति की समझ नहीं थी।

और मूर्खतावश श्रीलंका में 1400 भारतीय सैनिकों की बलि चढ़वाई और देश का नाम कलंकित किया।# #viralreelsシ #foryouシpage #viralvideoシ #ViralStoryTime #foryoupageシ #foryouシ #reels #stories #story #storytime

बुधवार, 18 फ़रवरी 2026

NPA 56लाख करोड़ था

आप कहाँ-कहाँ गड्ढे खोदकर गये हो जी ??
अब समझ में आ रही है नोट बंदी ???
कांग्रेस के अर्थशास्त्री PM मनमोहन सिंह जी ने बैंकों के एनपीए 37% बताये थे, जो वस्तुतः 82% थे !
कितना बड़ा झूठ ....
बैंकें डूबने की कगार पर थीं ...
कुल एनपीए था 56 लाख करोड़ रुपये ...
कल्पना कीजिये जब ये सच्चाई नव नियुक्त पीएम के सामने आयी होगी तो उन पर क्या बीती होगी, अगर बैंकें फेल हो जातीं तो देश किस हालत में होता ? ...
आर्थिक अराजकता सामाजिक अराजकता में बदल चुकी होती, देश भयंकर संकटों में घिर चुका होता ...
नया पीएम उसकी भेंट चढ़ गया होता और आंकड़ों की भूलभुलैया में यही विपक्ष अपने पाप को मोदी के सर मढ रहा होता ...

नोटबंदी ने इस दुष्चक्र से बाहर निकाल दिया ....
बैंकों के पास तत्काल ढ़ेर सारा कैश आ गया !
फिर बैंक डिफाल्टरो पर नकेल कसने का काम शुरू हुआ और हजारों, लाखों करोड़ की संपत्तियां जब्त हुई !

लोग मोदी से तमाम मुद्दों पर क्षुब्ध रहते हैं, उन्हें  अंदाजा ही नहीं है कि देश कितना खोखला कर दिया गया था । 
डिफेंस आतंरिक सुरक्षा विदेशनीति ,आर्थिक अव्यवस्था , सामाजिक विग्रह, आस्तीन के सांप इन सबसे एक साथ निपटना बहुत दुष्कर, विवेकपूर्ण और राजनैतिक इच्छाशक्ति का काम है !

हम मोदी शासन के कारण देशद्रोहियों की गहरी जड़ों को कुछ कुछ देख पा रहे हैं, मिडिया शिक्षा संस्थान, न्यायपालिका सब जगह आज भी विषधर बैठे हुए हैं ....
इन सबके बीच अपने को सुरक्षित रखते हुए देश को सुरक्षित करने का काम मोदी जी  कर रहे हैं ...
हमें पूरा विश्वास है कि मोदी हमारी आशाओं आकांक्षाओं को निश्चित ही पूरा करेंगे ...
ये दौर इन विषधरों के दांत तोड़ने का है !

मोदी को हमारे सार्थक समर्थन की आवश्यकता है,
धैर्य के साथ मोदी के साथ खड़े होने की आवश्यकता है,
अधैर्य से हम मोदी को ही नहीं खोएंगे, अपितु उन्ही दरिंदों के हाथों में देश और अपनी संतानों के भविष्य को सौंप देंगे
सत्ता की ताक में बैठे बहेलिये यही चाहते हैं और हमें गुमराह कर रहे हैं ! दुश्मन जो चाहता है अगर वैसा ही करेंगे, तो पराजय और दुर्भाग्य तो निश्चित है .....

काले कारनामें

लगभग 1500 भारतीय~हिन्दू, वैज्ञानिकों की हत्या, अपहरण:  
जिन बैज्ञानिकों की हत्याएं और अपहरण बाबर बंशी मियां नेहरू, नकली गांधीयों के शासनकाल में हुई, ऊनमें  भी सबसे ज्यादा  हत्या,अपहरण अब्दुल कलाम (ISRO), हामिद अंसारी ( उपराष्ट्रपति), और Antonia (के गुलाम मनमोहन) के समय हुई। ये बाबर बंशी नेहरू,नकली गांधी खानदान भारत,हिन्दुओं का सबसे बड़ा गद्दार है,हर भारतीय को इसे समझना चाहिए, इन्होंने CIA से लेकर ISI,तक को जानकारियां दी है सहयोग किया है। भारत में सैंकड़ों आतंकी घटनाओं में इस खानदान का हाथ रहा है,चाहे 26/11 हो या 1990 का कश्मीरी हिंदुओं का नरसंहार, या 1948 चित्त पावन ब्राह्मणों की हत्या, 1984 सिक्खों का या पुलवामा... या दूसरे सैंकड़ों आतंकी हमले 

भारतीय वैज्ञानिकों की रहस्यमयी मौतें और RAW के नेटवर्क को ध्वस्त करना ये साजिश हर भारतीय जानना चाहता है। यह बाबर बंशी मियां नेहरू, नकली गांधीयों का परिवार वैज्ञानिकों को मरवा देते या गायब थे यह एक बड़ा रहस्य है जो उजागर होना चाहिए क्यों वैज्ञानिक मारें गये , लापता हुवे, और आत्महत्या तक करने को मजबुर हुए इस रहस्य को उजागर करना चाहिए।
कांग्रेस के राज में 1500 जीतने  वैज्ञानिकों की संदिग्ध हालात में मौतें , अपहरण, आत्म हत्याएं हुई, कुछ पाकिस्तान में brain 🧠 dead अवस्था में मिले, किसी की कोई जांच नहीं हुई सब ठंडे बस्ते में चली गई, ऐसा हि हुआ था हमारे दुसरे प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री जी के साथ उनका रहस्यमय परिस्थितियों में मरना ( हत्या ) ऐक पहेली बनकर रह गया हे, आज भी कई रहस्यों पर पर्दा पडा हुआ हे जो शायद अब सबुतो के अभाव के कारण सुलझ नहीं पाएंगे।🥲

5वी फेल Antonia 13 जनवरी 1968 को भारत आई , जिसकी शादी 25 फरवरी 1968 को राजीव खान गांधी से हुई,जो एक एस्कॉर्ट सर्विस चलाती थी और खुद भी धंधेवाली थी #एंटोनियामाइनो जिसको भारत आते ही सैटेलाइट और अंतरिक्ष विज्ञान में रुचि हो गई। है न घोर आश्चर्य की बात ?
जिस धंधेवाली को Resister, Capacitor, IC and Diode का मुंह किधर है और G किधर होता है पता ही नहीं है वो अंतरिक्ष विज्ञान समझ रही है 😜उसकी आंखों में कुटिलता देखिए,(फोटो)सब समझ आ जाएगा....
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अप्रैल, 1968: विक्रम साराभाई Antonia ~सोनिया खान गांधी को अहमदाबाद में प्रायोगिक उपग्रह संचार का अर्थ स्टेशन का कामकाज समझाते हुए।( चित्र संलग्न) अप्रैल 1968 में लिया गया यह चित्र ISRO के अहमदाबाद सेंटर का है। वैज्ञानिक विक्रम साराभाई सोनिया  को भारत की उपग्रह परियोजना की जानकारी दे रहे हैं। जनवरी में भारत आई, दो महीने पहले ही फरवरी 1968 में सोनिया राजीव का विवाह उसने भारत की नागरिकता भी नहीं ली थी। और पहुंच गई अति महत्वपूर्ण संस्थान की जानकारी लेने के लिये ??? क्यूं??? 

संयोग है कि कुछ समय बाद ही विक्रम साराभाई केरल मे एक रिजॉर्ट के कमरे में रहस्यमय ढंग से मृत पाए गए। बिना पोस्टमार्टम के ही घोषणा कर दी गई थी कि मृत्यु हार्ट अटैक से हुई है।

कोई भी विदेशी भारत वर्ष का हितैषी नहीं हो सकता दाल में कुछ काला नहीं बल्कि पूरी दाल  काली है.. आज ये, उस इटालियन धंधेवाली Antonia का नाजायज पिल्ला पप्पू, पिंकी खान वाड्रा,रॉबर्ट वाड्रा सब देश को भांडने, फूट डालने, बिगाड़ने में लगे हैं।देश का सबसे बड़ा गद्दार बाबर बंशी मियां नेहरू,नकली गांधीयों का खानदान है।

जिस हामिद अंसारी को इस कांग्रेस ने उपराष्ट्रपति बनाया उसके ईरान, ISI पाकिस्तान से सम्बन्ध सभी जानते हैं, पर जो हिंदू ये बोलते नहीं थकते कि मुस्लिम हो तो अब्दुल कलाम जैसा वे हिन्दू अलतकिया अब्दुल कलाम का अ और क भी नहीं जानते। 

अब्दुल कलाम के समय ISRO से करीब 67 बैज्ञानिक गायब हुवे, जिसमें ना जाने कितने पाकिस्तान पहुंचाए गए पर 3 जो brain 🧠 dead अवस्था में पाकिस्तान में मिले वह मृत्यु तुल्य अवस्था थी, शायद 32 की लाशे मिली थी बाकी का आज तक कोई सुराग नहीं, शायद पाकिस्तान ही पहुंचाए गए थे।RTI से ये जानकारी आप ले सकते है। इसी अब्दुल कलाम ने नियम, कानून विपरीत मुल्लों के लिए राष्ट्रपति भवन के अंदर किया किया बनाए आप RTI से जानकारी ले सकते हैं।

इसी अब्दुल कलाम के समय ISRO में एक जॉब vacancy थी 66 लोगों के लिए, जिसमें 8800 एप्लीकेशन पड़ी थी, और उस अब्दुल कलाम ने सारी 66 जॉब छांट छांट कर मुल्लों को दी थी। बहुत बड़ा बवाल हुआ था पर कांग्रेस ने सब शांत कर छुपा दिया।  साउथ इंडिया के लोग ये कांड अच्छी तरह जानते है और मुझे इसकी जानकारी साउथ इंडिया के ही लोगों ने दी थी ( 2012 में ) किसी भी मुल्ले पर बिस्वास करना एक महा पाप है, चाहे वो वैज्ञानिकों का हत्यारा अब्दुल कलाम हो या मूर्खो का चहेता फैज खान, या यूसुफ खान ( दिलीप कुमार) या मूर्खो का सड़क छाप सड़ खान सड़ .. 

होमी जहांगीर भावा की हत्या में इसी बाबर बंशी मियां नेहरू खानदान की मेमुना बेगम उर्फ इंदिरा खान का हाथ था तो बिक्रम साराभाई की हत्या में पूरी तरह  Antonia का हाथ था 

कितने षड्यंत्र किए इस बाबर बंशी मियां नेहरू खानदान ने कितनी हत्याएं,कितनी लूट, 2014 में अगर मोदी जी न आते तो किसी को कुछ पता भी ना चलता।

विक्रम साराभाई ,डॉक्टर होमी जहांगीर भाभा  आज होते तो भारत दुनिया का बाप होता। 

She came to India only because as spy, by profession she was running an Escort service from a bar, was a prostitute , her partner n supplier of Girls/teens was a Islamabadi rich muslim, qualifications 5th standard fail but what an interesting she went to observe I S R O  ! Soon after she came to Bharat ( married to Rajiv Khan Gandhi) 
      LATER ON  Dr sarabhai was found dead 
She stayed in india as spy ~of CIA,KgB , is also an agent for Pop ( convert apx 6,65,000 Hindus to Christianity)

     After long years she took  Indian citizen ship , sources of incomes Nil was NiL, but  now a days she is 4th richest woman in the world

Whenever a politician visits such an esteemed organization, the scientists should not come forward to explain the project or workings, they are useless fellows and come to shine their report card only.

Antonio has damaged India like any thing and now his son is also doing the same

बहुत कुछ तो रहस्य है लेकिन किसी की हिम्मत क्यों नहीं है इस इटालियन को छूने की???इस spy इटालियन के रहस्य ~ जिस जिस ने जाने   वे सब रहस्यमयी मौत को प्राप्त हुए है चाहे राजीव खान गांधी हो, या माधव राव सिंधिया,राजेश पायलट या रॉबर्ट वाड्रा का खानदान.....

गलती विक्रम साराभाई की नहीं थी उस समय भारत के लोगों की मानसिकता ही कुछ ऐसी थी कि बाबर बंशी मियां नेहरू, नकली गांधी परिवार को भारत का मालिक समझते थे और ये परिवार भारत को अपनी बापौती समझ कर लुटता,रहा हजारों नहीं लाखों हत्याएं, करोड़ो पाकिस्तानी, बांग्लादेशी  मुल्लों को  लाकर बसाया। 

देश को खत्म करना ही कांग्रेस और इस मुल्ले नकली गांधी परिवार का शुरू से मकसद रहा है और आज भी  एंटोनिया, पिंकिखान वाड्रा, राहुल खान गांधी देश भर मे झूठ बोल कर इसी प्लानिंग पर काम कर रहा है

मतलब ये पनौती जब से भारत आई,तब से महत्वपूर्ण पदों पर विराजमान महानुभावों की जीवनलीला पर ग्रहण लगने लगा। संजय खान गांधी, इंदिरा खानगांधी , राजीव खान गांधी जैसे परिवारों के लोग मारे गए।
परन्तु जब से बागडोर संभाली तब से परिवार सुरक्षित और पुराने कांग्रेसी साइड। नटवर सिंह जी को कैसे धक्के मारकर बाहर किया। फिर भी पुराने कांग्रेसी इनके और परिवार का गुणगान करते नहीं थकते। परिवार को शहीद कहते हैं लेकिन कोई ये नहीं कहता कि हत्या हुई है। राजेश पायलट ,माधवराज सिंधिया , जगदीश पायलट   रॉबर्ट वाड्रा का प्रायः पूरा खानदान , जैसे खास लोगों को क्या हुआ कोई नहीं बताता। 
जब वैज्ञानिक तक नहीं छोड़ा तो औरों को क्या बखसेंगे।

अभी ग़ुलामी निकली नहीं न हिन्दू जागा है, बस पैसे दे दो कुछ भी करो , कॉग्रेस का मतलब ही "एक आतंकवादी गद्दारों का संगठन"  है और इसके जो इंडी ठग बंधन है वो भी मेम्बर है इन्हें सबको जेल भेज दे या सालो को ऊपर हूरो से मिलवा दो । ये ही इन गद्दारों की  बीमारी का सही इलाज है ।

भला हो वर्तमान सरकार का और सोशल मीडिया का जिसने भारत के सही इतिहास को सामने लाया, और इस परिवार की असलियत धीरे धीरे खुल कर सामने आ गई। 
मोदी जी के शासन में वैज्ञानिक सुरक्षित हैं और नई नई खोजों में लगे हैं । भारत नई ऊंचाइयों को छू रहा है ♥️🚩🇮🇳

उसके बाद क्या हुआ हमारे साराभाई और कितने वैज्ञानिकों कि हत्या हुई ?? 

भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम के पितामह विक्रम साराभाई जिन्होंने रखी थी ISRO की नींव । भारत का अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन अतंरिक्ष के क्षेत्र में ऊंचे शिखर पर है जिसका पूरा श्रेय ‘भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम के पितामह’ विक्रम साराभाई को जाता है।

साल 1975 में भारत ने एक रूसी कॉस्मोड्रोम से ‘आर्यभट्ट’ उपग्रह को सफलतापूर्वक प्रक्षेपित कर दुनिया को चकित कर डाला.  यह विक्रम भाई की परियोजना की सफलता थी। 

मई, 1966 में उन्होंने परमाणु ऊर्जा आयोग के अध्यक्ष पद का कार्यभार संभाला। साल 1919 में 12 अगस्त को अहमदाबाद के स्वतंत्रता आन्दोलन को समर्पित एक प्रगतिशील विचारों वाले उद्योगपति परिवार में जन्मे थे तो वहीं पर देश की प्रसिद्ध शख्सियत  सरोजिनी नायडू, अन्य से नाता रहा।
साल 1962 में उन्होंने शांतिस्वरूप भटनागर पदक प्राप्त किया, तो 1966 में पद्मभूषण. मरणोपरांत उन्हें 1972 में पद्म विभूषण सम्मान से सम्मानित किया गया।साल 2019 में उनकी जन्म शताब्दी पर इसरो ने विक्रम साराभाई पत्रकारिता पुरस्कार भी शुरू करने की घोषणा की।

भारत के चंद्र मिशन चंद्रयान-2 के लैंडर (जिसको 20 सितंबर, 2019 को चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के पास उतरना था) का नाम भी विक्रम रखा गया।
साराभाई की मौत एक रहस्य
आम दिनों की ही तरह 30 दिसंबर, 1971 का भी दिन था। लेकिन उस दिन को खास बना दिया एक घटना ने। और वह घटना थी देश के महान वैज्ञानिक विक्रम साराभाई का इस दुनिया से चले जाना। किसी को यकीन नहीं था कि भारत के स्पेस प्रोग्राम के पिता कहे जाने वाले विक्रम साराभाई हमें यूं छोड़कर चले जाएंगे। एक दिन पहले तो सबकुछ ठीक-ठाक था। उन्होंने वैज्ञानिकों के साथ बैठकें की थीं और अहम विषयों पर चर्चाएं भी हुई थीं। ऐसे कोई लक्षण नहीं दिख रहे थे जिससे लगे कि उनकी तबीयत खराब है। लेकिन अगली सुबह केरल के तटीय शहर कोवलाम के एक होटल रूम में उनका शव मिला। उनकी इस अचानक मौत ने सबको झिंझोड़ कर रख दिया था।

​नांबी नारायण की आत्मकथा और साजिश का शक
जासूसी के गलत मामले में फंसाए गए पूर्व अंतरिक्ष वैज्ञानिक नांबी नारायणन की मानें तो साराभाई अंतरराष्ट्रीय साजिश का शिकार हुए। इसरो के जासूसी मामले में फंसे और फिर बाद में बेदाग साबित हुए एस.नांबी नारायणन की 2017 में मलयाली भाषा में आत्मकथा आई थी जिसका नाम Ormakalude Bhramanapatham है। उस किताब से विक्रम साराभाई की मौत के रहस्य पर फिर से चर्चा गर्माया।

​मौत पर यकीन नहीं
नांबी नारायणन ने साराभाई के साथ मिलकर उनके जूनियर के तौर पर इसरो में काम किया है और उनके काफी करीब रहे हैं। उन्होंने अपनी आत्मकथा में लिखा है, 'उनकी मौत से कई सवाल उठे हैं। अगर उनकी मौत साजिश थी तो पूरी संभावना है कि उसके पीछे अंतरराष्ट्रीय शक्तियों का हाथ हो। नहीं तो उनके जैसे वैज्ञानिक का इस तरह अचानक निधन कैसे हो सकता है?'

सेहत पर देते थे बहुत ध्यान
नांबी नारायणन ने अपनी आत्मकथा में एक पूरा चैप्टर साराभाई के निधन को समर्पित किया है। उन्होंने इसमें उनके निधन पर कई सवाल खड़े किए हैं। उनका कहना है कि साराभाई अपनी सेहत का बहुत ध्यान रखते थे। नांबी लिखते हैं, 'एक आदमी जिसने जिंदगी में कभी सिगरेट को छुआ तक नहीं। फिर उनकी ऐसे मौत कैसे हो गई? यह जानते हुए भी कि मृतक एक महान वैज्ञानिक थे, उनका अंतिम संस्कार उनकी ऑटोप्सी कराए बगैर क्यों किया गया?'

 उन्होंने कहा कि साराभाई के निधन को प्रसिद्ध भौतिकशास्त्री होमी जहांगीर भाभा की मौत से जोड़कर देखा जाना चाहिए जिनका 1966 में एक विमान दुर्घटना में निधन हो गया था। CIA ~ सीआईए का हाथ?
उन्होंने पत्रकार ग्रेगरी डगलस की किताब Conversations with the Crow का हवाला दिया है जिसमें सीआईए अफसर रॉबर्ट क्रॉली ने भाभा की मौत के पीछे सीआईए के हाथ होने के संकेत दिए थे। किताब में क्रॉली के हवाले से लिखा है, '1965 में भारत-पाकिस्तान के युद्ध में भारत की जीत से अमेरिका बेचैन हो गया। भारत को एक न्यूक्लियर ताकत के तौर पर उभरते हुए देखने से भी अमेरिका की चिंता बढ़ गई।'👇👇

इन कांग्रेसी कुत्तों ने सबसे अंत में नम्बी नारायण जी को शिकार बनाया था, परंतु उनका सौभाग्य था कि उनके जेल में रहते हुए सत्ता परिवर्तन हो गया, नयी सरकार ने दुबारा जांच बिठा दिया तो इसरो के महान वैज्ञानिक नम्बी नारायण जी निर्दोष पाए गए और सुप्रीम कोर्ट ने नारायणन जी से माफी मांगते हुए सम्मान बरी कर दिया तथा उनका जो बकाया धनराशि ब्याज सहित उनको प्रदान किया गया।
 एक अभिनंदन समारोह में उन्होंने रूंधे गले से साक्षात्कार दिया था कि यदि सत्ता में मोदीजी नहीं आते तो मेरा जीवित जेल से निकलना असंभव था, जो पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार ने मेरे उपर देशके प्रति गद्दारी का काला धब्बा थोप दिया था वो धब्बा भी मिटना मुश्किल था, मैं बहुत प्रसन्न हूं कि मुझे दूसरा जन्म मिल गया।......

डॉ होमी जेन्हागीर भाभा (1909-1966) एक भारतीय भौतिक विज्ञानी थे जिन्हें अक्सर भारतीय परमाणु कार्यक्रम का जनक माना जाता है ।

भाभा का जन्म मुंबई के एक धनी परिवार में हुआ था। 1927 में वे इंग्लैंड के कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में पढ़ने गए। हालाँकि उन्होंने परिवार की इच्छा के अनुसार इंजीनियरिंग की पढ़ाई शुरू की, लेकिन भाभा जल्द ही भौतिकी की ओर आकर्षित हो गए।  1932 में भाभा ने लिखा , “मैं आपसे स्पष्ट रूप से कहता हूँ कि व्यवसाय या इंजीनियर के रूप में नौकरी मेरे लिए नहीं है। यह मेरे स्वभाव से बिल्कुल अलग है और मेरे मिजाज और विचारों के बिल्कुल विपरीत है। भौतिकी ही मेरा क्षेत्र है। मुझे पता है कि मैं इसमें महान कार्य करूँगा।” भाभा ने 1934 में परमाणु भौतिकी में पीएचडी की उपाधि प्राप्त की।

द्वितीय विश्व युद्ध से पहले भाभा भारत लौट आए और भारतीय विज्ञान संस्थान में शामिल हो गए, जहाँ उन्होंने कॉस्मिक रे रिसर्च इंस्टीट्यूट की स्थापना की। 1945 में, उन्होंने टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च की स्थापना की, जहाँ भारत के परमाणु कार्यक्रम के लिए प्रारंभिक शोध कार्य शुरू हुआ। 1947 में भारत की स्वतंत्रता के तुरंत बाद,  भाभा ने प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को पत्र लिखकर तर्क दिया कि "अगले कुछ दशकों में, परमाणु ऊर्जा देशों की अर्थव्यवस्था और उद्योग में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी और यदि भारत दुनिया के औद्योगिक रूप से उन्नत देशों से और भी पीछे नहीं रहना चाहता है, तो विज्ञान की इस शाखा को विकसित करना आवश्यक होगा।"

1954 में, भाभा ने ट्रॉम्बे में एक परमाणु अनुसंधान केंद्र की स्थापना की, जिसका नाम बाद में भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र (BARC) रखा गया। परमाणु ऊर्जा के प्रबल समर्थक भाभा ने 1955 में परमाणु ऊर्जा के शांतिपूर्ण उपयोग पर पहले संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन का आयोजन किया। वे अपनी मृत्यु तक भारत के परमाणु कार्यक्रम के प्रमुख रहे।

होमी भाभा की मृत्यु 24 जनवरी, 1966 को जिनेवा जाते समय एक विमान दुर्घटना में हो गई थी। इनकी मृत्यु का शक CIA और मेमुना बेगम उर्फ इंदिरा खान गांधी पर किया जाता है। 11 जनवरी 1966 को ही मेमुना बेगम उर्फ इंदिरा खान ने रूस में श्री लाल बहादुर शास्त्री जी को मुस्लिम रसोइए से उनके खाने में जहर देकर उनकी हत्या करवाई थी, और 24 जनवरी को डॉ होमी जहांगीर भावा की भी हत्या में CIA और मेमुना बेगम उर्फ इंदिरा खान का हाथ था। 

Dr. Homi Jehangir Bhabha (1909–1966) was a pioneering Indian nuclear physicist and the "father of the Indian nuclear programme". He founded key research institutions, including the Tata Institute of Fundamental Research (TIFR) and the Atomic Energy Establishment, Trombay (AEET), now named the Bhabha Atomic Research Centre (BARC) in his honor. A Cambridge-educated visionary, he championed India's self-reliance in nuclear energy, initiating its three-stage nuclear power program.

बहुत बड़ी कीमत चुकायी है देश ने  इस बाबर बंशी मियां नेहरू,नकली गाँधी परिवार की वजह से.🤔😷😡

इसके बाद भी हिंदुस्तान की जनता की आंखें नहीं खुल रही हैं विशेष कर  सनातनी हिंदू असावधान भाइयों की। 

राजीव खान गांधी,Antonia, राउल विंची कोढ़ उर्फ पप्पू, अमिताभ श्रीवास्तव बच्चन परिवार ने कैसे भारतीय सेना के संसाधनों INS Vikrant जैसे युद्ध पोत, , सेना की जहाजों का छुट्टियां , पिकनिक, व्यक्तिगत  अय्याशी,एशो आराम, चुनाव तक में दुरुपयोग किया हर हिन्दू को हर भारतीय को सत्य समझना चाहिए

एक चुड़ैल Antonio Maino आज भी भारत के टुकड़े करने में षड्यंत्र कर रही है वह है एंटोनिया माइनो उसका नाजायज कपूत पप्पू खान गांडी,पिंकी खान वाड्रा, रॉबर्ट वाड्रा सब के सब लुटेरे, हत्यारे, ड्रामा बाज ,अय्याश नित नए प्रोपगेंडा भड़काना बवाल मचाना । हर हिन्दू को इस गद्दार नकली परिवार  से सावधान रहना चाहिए, #कांग्रेस_मुक्तहो_अपनाभारत✊✊

मोदीजी का दृढ़ निश्चय है की 
भारतीय सेना, भारतीय अंतरिक्ष विज्ञान को मजबूत बनाना,साथ ही देश में इंफ्रास्ट्रक्चर ~निर्माण,  संसाधनों का उपयोग कर भारत को भारतीयों को आत्म निर्भर बनाए। जिसमें देश के हर सदस्य का सहयोग अपेक्षित है।

अपने देश अपने सनातन से प्यार करें।  
Keep open your eyes 👀 Love you nation Bharat ⛳ 
#NationFirst ♥️🚩🇮🇳

Raveena Zen Raunak Jain

हमले नहीँ होते थे - राहुल

जब कांग्रेस सत्ता में थी तब राहुल गांधी कहते थे की आतं की हमलो को रोक पाना संभव नहीं है आपको आतंकी हमलो  की आदत डालनी होगी यह देखिए जब राहुल...