मंगलवार, 21 अप्रैल 2026

हिंसा - बलात्कार और नेहरू

विभाजन के बाद 1947 में पाकिस्तान में हिंदुओं की ह'त्याओं, लड़कियों से बला'त्कार का नंगा नाच हो रहा था। लाहौर से हर ट्रैन में ला"शें और उन पर मंडराते कुत्ते, गिद्ध दिखाई दे रहे थे तब लेहरू ने रेडियो पर शरणार्थी शिविरों में रह रहे हिंदुओं से धैर्य और शांति बनाये रखने की अपील की। 
दूसरे दिन वो शिविरों में इंदिरा  के साथ गए। वहां नेहरू तक अपनी बात पहुंचाने की कोशिश में एक 80 वर्षीय वृद्ध ने इंदिरा को स्पर्श कर दिया। नेहरू ने तुरंत ही उसे तमाचा जड़ दिया। वो वृद्ध लाहौर का प्रसिद्ध व्यापारी था जिस पर वक़्त की मार पड़ रही थी। 
तमाचा खा कर वो जोर से हंसा और बोला, "इंदिरा मेरी पोती समान है क्योंकि आप खुद मेरे बेटे की उम्र के हैं। मेरा हाथ लग जाने भर से आप क्रोधित हो गए और मेरी 3 जवान पोतियों को मु@सलमान मेरे सामने उठा ले गए फिर भी आप कहते हैं सब भुला दूं।" नेहरू ये सुनकर वहां से इंदिरा को साथ लेकर निकल गए।

-अश्व घोष की पुस्तक "द कु'रान एंड द का'फिर" के अंश..

सोमवार, 20 अप्रैल 2026

DRDO की जादुई तकनीक

भारतीय रेलवे का यह बायो-टॉयलेट मिशन स्वच्छता की दिशा में एक भयंकर और जादुई क्रांति है! जिसे लोग केवल एक नया 'डिब्बा' समझते हैं, वह असल में पटरियों को जंग से बचाने और पर्यावरण को शुद्ध रखने वाली DRDO की फौलादी तकनीक है।

1. अवायवीय बैक्टीरिया (Anaerobic Bacteria) का जादू
इन टैंकों के अंदर DRDO द्वारा विकसित विशेष बैक्टीरिया छोड़े जाते हैं, जो अंटार्कटिका जैसे भयंकर ठंडे इलाकों से लाए गए थे।

• बिना ऑक्सीजन के काम: ये बैक्टीरिया बिना ऑक्सीजन के जीवित रहते हैं और मल को जादुई रफ़्तार से खाना शुरू कर देते हैं।
• पूर्ण निपटान: ये बैक्टीरिया मल को तब तक तोड़ते हैं जब तक कि वह केवल पानी और गैस (मीथेन) में न बदल जाए।

2. तीन चरणों वाला फौलादी फ़िल्ट्रेशन
बायो-डाइजेस्टर टैंक को अंदर से कई हिस्सों में बांटा गया है ताकि सफाई जादुई रूप से सटीक हो:

• पहला चरण: मल को बैक्टीरिया द्वारा लिक्विड में बदलना।
• दूसरा चरण: क्लोरिनेशन के ज़रिए हानिकारक कीटाणुओं का भयंकर खात्मा।
• तीसरा चरण: अंत में जो पानी बाहर निकलता है, वह पूरी तरह रंगहीन और गंधहीन होता है, जिससे पटरियों पर जंग लगने का खतरा शून्य हो जाता है।

3. पटरियों की फौलादी उम्र और बचत
रेलवे पटरियों में जंग लगना केवल सफाई का मुद्दा नहीं था, बल्कि यह एक भयंकर आर्थिक नुकसान भी था।

• अरबों की बचत: पटरियों के गलने के कारण उन्हें बार-बार बदलना पड़ता था। बायो-टॉयलेट तकनीक ने पटरियों की उम्र को जादुई तरीके से बढ़ा दिया है, जिससे रेलवे के करोड़ों रुपये बच रहे हैं।
• स्टेशन की स्वच्छता: पहले ट्रेनों के रुकने पर स्टेशनों पर जो भयंकर बदबू आती थी, वह अब इस फौलादी तकनीक की वजह से इतिहास बन चुकी है।

4. बायो-टॉयलेट की 'जादुई' विशेषताएँ
• रखरखाव में आसान: इन बैक्टीरिया को बार-बार डालने की ज़रूरत नहीं होती, ये खुद को जादुई रूप से रीजेनरेट करते रहते हैं।
• तापमान सहनशीलता: ये बैक्टीरिया -20°C से लेकर 50°C तक के भयंकर तापमान में भी अपना काम फौलादी तरीके से करते हैं। #lifestyle

जीव रक्षा केंद्र, सहारनपुर

गुरुवार, 16 अप्रैल 2026

नेहरू जी को भारत रत्न क्यों?

13 जुलाई 1955 को जब पण्डित नेहरू जी यूरोप और सोवियत रूस के दौरे से वापस आए तब उनके वैचारिक विरोधी तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद जी सभी प्रोटोकॉल तोड़कर दिल्ली एयरपोर्ट उनका स्वागत करने पहुंचे।

राजेन्द्र प्रसाद जी ने राष्ट्रपति भवन में भोज का आयोजन किया सभी महान हस्तियों की उपस्थिति में राजेंद्र प्रसाद जी ने पण्डित नेहरू जी को लेकर कहा - "यह हमारे समय के शांति के सबसे बड़े वास्तुकार हैं।" और मैंने पण्डित नेहरू जी को भारत रत्न देने का फैसला किया है।
राष्ट्रपति ने कहा कि पण्डित नेहरू के प्रयासों से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत मजबूत रूप से खड़ा हुआ है।

उन्होंने आगे कहा यह कदम मैंने अपने स्वविवेक से लिया है,अपने प्रधानमंत्री की अनुशंसा के बगैर इसलिए यह कहा जा सकता है कि यह निर्णय अवैधानिक है लेकिन मैं यह जानता हूँ कि मेरे इस फैसले का स्वागत होगा।

7 सितंबर 1955 को राष्ट्रपति भवन में आयोजित नेहरू के भारत रत्न सम्मान समारोह में तत्कालीन केंद्रीय गृह सचिव एवी पाई ने सम्मान पाने वाली विभूतियों के नाम पुकारे, लेकिन नेहरू का प्रशस्ति-पत्र नहीं पढ़ा गया था। किदवई के अनुसार प्रशस्तियों की आधिकारिक पुस्तिका में प्रधानमंत्री का महज नाम दर्ज है। इसमें उनके द्वारा की गई सेवाओं का वहां कोई जिक्र नहीं है। सामान्य रूप से यह उल्लेख परम्परागत रूप से उस पुस्तिका में किया जाता है। उस समय के लोगों का कहना था कि देश और समाज के लिए नेहरू के अप्रतिम योगदान का चंद पैराग्राफ में जिक्र करना कठिन होगा, इसलिए उसे छोड़ दिया गया।

ऐसी शख्शियत जिसके विरोधी भी उन्हें सम्मान करते थे क्योंकि पण्डित नेहरू अपने विरोधियों को भी समान आदर करते थे आलोचकों को भी उतना ही स्थान मिला पण्डित नेहरू जी के दौर में जितना प्रसंशकों को।

©...✍️ Pramod Singh

मंगलवार, 14 अप्रैल 2026

इथेनोल की साज़िश

क्या आपने कभी सोचा है कि जिस गाड़ी को आपने अपनी खून-पसीने की कमाई से खरीदा, वह अचानक 'कबाड़' (Scrap) कैसे घोषित की जा सकती है? 

जबकि जापान और अमेरिका जैसे विकसित देशों में 40 साल पुरानी गाड़ियाँ भी फिट होने पर सड़कों पर दौड़ती हैं, तो भारत में ही यह 'जबरन कबाड़' नीति क्यों?

​आज हम उन 'डॉट्स' को कनेक्ट करेंगे जिन्हें मुख्यधारा का मीडिया आपसे छिपा रहा है।

​1. E20 पेट्रोल: आपके इंजन के लिए 'धीमा जहर' 🧪

​1 अप्रैल 2026 से देशभर में E20 (20% एथेनॉल मिश्रण) अनिवार्य हो रहा है।

    2023 से पहले के इंजन शुद्ध पेट्रोल के लिए बने थे। एथेनॉल एक अल्कोहल है जो आपके पुराने इंजन की रबर सील और पाइपों को गला देता है और अंदर जंग (Corrosion) पैदा करता है।

​     यह आपके वाहन के खिलाफ एक 'साइलेंट सॉफ्टवेयर अपडेट' जैसा है। जब ईंधन ही आपके इंजन को चोक कर देगा, तो आप मजबूरन अपनी गाड़ी कबाड़ में देंगे।

​2. दिल्ली की नई EV नीति: निजी स्वामित्व का अंत? 🚫

​दिल्ली इलेक्ट्रिक वाहन नीति 2.0 के मसौदे के अनुसार:
​1 अप्रैल 2027 से तिपहिया और 1 अप्रैल 2028 से पेट्रोल टू-व्हीलर का नया रजिस्ट्रेशन बंद हो सकता है।
​नवीनीकरण (Renewal) की संभावना लगभग खत्म की जा रही है।

​     क्या यह जनता की भलाई के लिए है या ऑटोमोबाइल कंपनियों की तिजोरियां भरने के लिए?

​3. 'एजेंडा 2030' और भारत: एक बड़ी लैबोरेटरी 🌍

​वैश्विक संस्थाओं (WEF/UN) का नारा है— "2030 तक आपके पास कुछ नहीं होगा और आप खुश रहेंगे।"

 
 भारत को इस 'ग्रेट रीसेट' का टेस्टिंग ग्राउंड बनाया जा रहा है।

​     पुराने मैकेनिकल वाहनों को ट्रैक करना मुश्किल है। लेकिन नई 'स्मार्ट' और 'इलेक्ट्रिक' गाड़ियाँ पूरी तरह इंटरनेट से जुड़ी हैं।

     सरकार एक बटन दबाकर आपकी गाड़ी को कहीं भी 'डिसेबल' कर सकती है। यह 'ग्रीन एनर्जी' के नाम पर आपकी 'आर्थिक आजादी' पर ताला है।

​4. 'यूज एंड थ्रो' का नया मॉडल ♻️

​वर्तमान की EV तकनीक 'यूज एंड थ्रो' है। बैटरी का खर्च गाड़ी की आधी कीमत के बराबर है और रीसेल वैल्यू शून्य।

​पहले हमारा कल्चर 'रिपेयर' (मरम्मत) का था, जो हमें आत्मनिर्भर बनाता था।
​अब हमें 'रिप्लेस' (बदलाव) के चक्रव्यूह में फंसाया जा रहा है ताकि हम जीवन भर किश्तें (EMI) भरते रहें और कभी भी पूरी तरह किसी संपत्ति के मालिक न बन सकें।

​5. क्यों चुप हैं जिम्मेदार? 🤐

​सड़क परिवहन मंत्री एथेनॉल का प्रचार करते हैं, लेकिन पेट्रोलियम मंत्रालय पुराने वाहन मालिकों को होने वाले नुकसान पर चुप है। 

क्या यह कॉर्पोरेट घरानों और वैश्विक एजेंडे के बीच की एक गुप्त सांठगांठ है?

​📢 जागरूक बनें, केवल दर्शक नहीं!
​यह केवल पर्यावरण का मुद्दा नहीं है, यह आपकी संपत्ति के अधिकार (Property Rights) पर हमला है।

    अगर आपकी 15 साल पुरानी गाड़ी फिट है और धुआं नहीं दे रही, तो उसे छीनने का हक किसी को नहीं होना चाहिए।

​अपनी राय कमेंट में जरूर बताएं— क्या आप इस 'जबरन कबाड़ नीति' और 'ईंधन के खेल' को समझ पा रहे हैं?

सोमवार, 13 अप्रैल 2026

भारत की रक्षा तकनीक

यह वाकई में भारत की रक्षा तकनीक (Defense Tech) में एक क्रांतिकारी कदम है। डीआरडीओ (DRDO) द्वारा विकसित यह हाई पावर माइक्रोवेव (HPM) तकनीक 'एंटी-ड्रोन' सिस्टम के क्षेत्र में गेम-चेंजर मानी जा रही है। 
यहाँ इस तकनीक की कुछ खास बातें हैं:
सॉफ्ट किल क्षमता: यह तकनीक किसी मिसाइल या गोली का इस्तेमाल करने के बजाय विद्युत चुंबकीय तरंगों (Electromagnetic Waves) का उपयोग करती है। यह ड्रोन के अंदर के इलेक्ट्रॉनिक्स और सर्किट को एक झटके में ठप कर देती है।
एक साथ कई निशाने: जैसा कि आपने बताया, यह सिस्टम एक ही पल्स या शॉट में 49 ड्रोनों के झुंड (Swarm) को निष्क्रिय करने की क्षमता रखता है।
कम लागत: पारंपरिक हथियारों के मुकाबले इसमें प्रति शॉट खर्चा बहुत कम आता है।
आनंद महिंद्रा की सराहना: उद्योगपति आनंद महिंद्रा ने भी इसे भारत के भविष्य के लिए एक बड़ी उपलब्धि बताया है, जो आधुनिक युद्ध के दौर में "ड्रोन स्वार्म" हमलों से बचने में मदद करेगी।

रहस्यमय मौतें?

1968 का वो खतरनाक फोटो सामने आया… 

ISRO के अंदर इटली की  महिला को भारत का सबसे गुप्त उपग्रह प्रोजेक्ट दिखा रहे थे विक्रम साराभाई!

अप्रैल 1968… अहमदाबाद का ISRO सेंटर।

वैज्ञानिक विक्रम साराभाई एक विदेशी महिला को अत्यंत संवेदनशील सैटेलाइट प्रोजेक्ट की पूरी जानकारी दे रहे हैं।

  ये कोई साधारण महिला नहीं… 

इटली की एंटोनियो एडवीज अल्बिना मायनो – 

जिसने महज दो महीने पहले फरवरी 1968 में भारत के प्रधानमंत्री के बेटे राजीव गांधी से शादी कर ली थी।

नागरिकता बदली?

 नहीं बदली!

फिर भी विदेशी नागरिक को ISRO जैसे टॉप-सीक्रेट रिसर्च सेंटर में घुसने की इजाजत? 

नियमों का सीधा उल्लंघन!इटली की ये 8वीं पास महिला अचानक सैटेलाइट और अंतरिक्ष विज्ञान की दीवानी हो गई…

 हैरान करने वाली बात!  

रुकिए… अब शुरू होता है असली सनसनीखेज राज!

जैसे ही ये इटालियन महिला गांधी परिवार में घुसी, परिवार के बाकी 4 सदस्य थे –

 इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, संजय गांधी और मेनका गांधी। 

 फिर एक-एक करके शुरू हुईं रहस्यमय मौतों की बाढ़…  

इंदिरा गांधी – अपने ही घर में अपने बॉडीगार्ड्स द्वारा गोली मार दी गई।  

संजय गांधी – प्लेन क्रैश में मारे गए।  

राजीव गांधी – बम ब्लास्ट में टुकड़े-टुकड़े हो गए।

और राजीव के सबसे करीबी दोस्त?  

राजेश पायलट – कार दुर्घटना में मारे गए।  

माधवराव सिंधिया – प्लेन क्रैश में मारे गए।

संजय गांधी के ससुर लेफ्टिनेंट कर्नल टी.एस. आनंद – 

दिल्ली के फार्महाउस के पास मृत पाए गए। 

 विक्रम साराभाई – दिसंबर 1971 में केरल के कोवलम रिजॉर्ट के कमरे में रहस्यमय ढंग से मृत पाए गए। 

बिना पोस्टमार्टम के बस हार्ट अटैक बता दिया गया!

  मेनका गांधी – परिवार, सत्ता और दिल्ली की राजनीति से बाहर फेंक दी गईं। 

 प्रियंका गांधी की सास-ससुर की साइड: 

 राजेंद्र वाड्रा – गेस्ट हाउस में मृत पाए गए।  

ननद – जयपुर-दिल्ली हाईवे पर कार दुर्घटना में मारी गई।  

देवर – मुरादाबाद के होटल में मृत पाए गए।

सारे “संयोग”… एक-एक करके सब खत्म!

आस-पास कोई नहीं बचा… सब मारे गए, 

दुर्घटना में मरे, गोली खाकर मरे, बम से उड़ गए…  

बस एक इटालियन महिला बची रही – एंटोनियो एडवीज अल्बिना मायनो उर्फ सोनिया गांधी!

ये संयोग हैं… या साजिश का सबसे बड़ा राज?   

अब खुद सोचिए… इतने सारे “संयोग” एक इटालियन महिला के आने के बाद क्यों? 

 सनसनीखेज सच… जो छुपाया नहीं जा सकता!
साभार 

रविवार, 12 अप्रैल 2026

वीर सावरकर / नेहरू

पहली तस्वीर स्वतंत्रवीर सावरकर की है, जिसे बीबीसी ने 1924 में खींचा था।

यह तस्वीर 14 वर्षों की अमानवीय और यातनापूर्ण "काला पानी" जेल से रिहाई के बाद ली गई थी।

तस्वीर में उनके हाथों में हथकड़ी और पैरों में बेड़ियां हैं।

अंडमान की सेलुलर जेल से रिहा होने के बाद, अंग्रेजों ने उन्हें अगले 13 वर्षों तक नजरबंद रखा।

दूसरी तस्वीर चिचा लेहरू की है - उनके हाथों में भी हथकड़ी है।

देश के लाल

जब 11 जनवरी 1966 की रात ताशकंद में लाल बहादुर शास्त्री जी की मौत हुई 😢🇮🇳, तो पूरा देश सदमे में था।

 लेकिन असली 'तमाशा' तो तब हुआ जब उनकी मौत के बाद उनकी संपत्ति का हिसाब लगाया गया।

लोग हैरान थे कि वह शख्स जो देश का 'प्रधान' था 👑, जो करोड़ों के बजट और फाइलों पर हस्ताक्षर करता था 📑✍️, उसने अपने पीछे क्या वसीयत छोड़ी है? 🤔

लेकिन जब अलमारियां और बैंक खाते देखे गए 🏦, तो सबकी आंखों में आंसू आ गए 😢:
कोई बंगला नहीं: दिल्ली की कोठियों में रहने वाले नेता के नाम अपनी एक इंच जमीन नहीं थी। 🏠❌

पुराना फटा कुर्ता: उनकी अलमारी में बस कुछ जोड़ी खादी के कुर्ते मिले 👕, जिनमें से कुछ तो फटे हुए थे जिन्हें उनकी पत्नी ललिता शास्त्री जी ने रफू (Stitch) किया था 🪡🧵।
बैंक बैलेंस 00.00: उनके खाते में इतने पैसे भी नहीं थे कि एक पुरानी कार की किश्त (EMI) चुकाई जा सके 💸❌।

हैरानी की बात जानते हैं? 😲 शास्त्री जी ने बच्चों के कहने पर एक  'फिएट कार' (Fiat Car) 🚗 लोन लेकर खरीदी थी। उनकी मृत्यु के बाद उस कार का 5,000 रुपये का कर्ज बाकी था 💔, जिसे बाद में उनकी पत्नी ने अपनी पेंशन के पैसों से तिल-तिल कर चुकाया।

जिस इंसान के एक इशारे पर पूरा देश "एक वक्त का उपवास" (Fast) रखने लगा था 🙏, उस इंसान ने अपने बच्चों के लिए विरासत में एक 'सिक्का' तक नहीं छोड़ा 🤲✨।

आज हम छोटी सी नौकरी पाकर या थोड़ा सा पैसा कमाकर घमंड में चूर हो जाते हैं 😔💭। लेकिन शास्त्री जी ने सिखाया कि "पद और प्रतिष्ठा से इंसान बड़ा नहीं होता, चरित्र से होता है।" 💡🪞

वो चाहते तो अरबों की संपत्ति बना सकते थे 💰, लेकिन उन्होंने 'ईमानदारी' को अपनी संपत्ति चुना 🤍✨। आज के दौर में जहाँ भ्रष्टाचार और दिखावा चरम पर है ⚠️, क्या हमें ऐसे नेताओं की याद नहीं आती? ❤️🇮🇳

इस 'नन्हे' कद वाले महान इंसान की सादगी को एक 'नमन' तो बनता है! 🙏🚩

इस पोस्ट को इतना शेयर करो कि आज के 'दिखावे' वाले समाज को अपनी असलियत का आईना दिखे 📲🔥।
क्या आपको लगता है कि आज के दौर में ऐसा नेता मिलना मुमकिन है? 🤔💭
हाँ (Yes) 👍 / नहीं (No) 👎 कमेंट में अपनी राय दें।

🚩 नोट: यह जानकारी विभिन्न ऐतिहासिक स्रोतों और प्रचलित कथनों पर आधारित है 📚। हमारा उद्देश्य किसी भी व्यक्ति या नेता की तुलना करना नहीं है 🙏, बल्कि केवल Lal Bahadur Shastri जी के सादगीपूर्ण जीवन और ईमानदारी को सम्मान देना है ❤️🇮🇳

बुधवार, 8 अप्रैल 2026

खड़गे का नीच बयान

आंख खोलकर पढ़िये....!!

ईशा की पांचवी सदी में शाही राजा खिंगल ने अफगानिस्तान के गर्देज स्थान पर महाविनायक की प्राण प्रतिष्ठा कराई थी। 
समय के साथ सभ्यता के ऊपर धूल चढ़ती गई और महाविनायक की प्रतिमा मिट्टी में कहीं दब गई।

युगों बाद खुदाई में जब वह प्रतिमा मिली तो उसे काबुल में "दरगाह पीर रतन नाथ" के पास स्थापित किया गया। दरगाह पीर रतन नाथ की कहानी किसी दूसरे दिन सुनाएंगे। 
आज कहानी महाविनायक की।

दो वर्ष पूर्व बिहार का एक युवक अफगानिस्तान में भारतीय दूतावास में नौकरी करने पहुँचा। 
स्वयं को यायावर कहने वाले उस युवक को अफगानिस्तान के प्राचीन महाविनायक के सम्बंध में पता था, सो वे महाविनायक के चिन्ह खोजने निकले। 
पर अफगानिस्तान में सनातन के चिन्ह जितने ही सुलभ हैं, उन्हें खोज लेना उतना ही दुर्लभ। 
कई दिनों नहीं कई महीनों के बाद उन्हें पीर रतन नाथ दरगाह का पता चला तो वे एक दिन पहुंचे तो एक ऐसा घर मिला जिसे भारत में मंदिर नहीं कह सकते। उस मंदिर में प्रतिमा स्थापित नहीं थी, बस रामायण महाभारत और गीता आदि पुस्तके रखी हुई थीं।

युवक ने सेवादार से जब महाविनायक की प्रतिमा के बारे में पूछा तो बुजुर्ग सेवादार आश्चर्य में डूब गया। क्या कोई दूर देश से मात्र एक प्रतिमा के लिए आया है? कौन है यह?
भावुक हो चुके सेवादार ने एक बन्द कमरे में रखी महाविनायक की प्रतिमा दिखाई... 
युगों बाद किसी ने श्रद्धा से महाविनायक को देखा, युगों बाद महाविनायक की प्रतिमा ने अपने किसी श्रद्धालु को वात्सल्य की दृष्टि से देखा। 
उस दिन युगों बाद किसी ने अभिशप्त महाविनायक के चरणों में प्रणाम किया, प्रतिमा पोंछी और बीस रुपये वाले माला से उनका श्रृंगार किया।

जानते हैं, ढाई हजार वर्ष पूर्व अफगानिस्तान के हर कण्ठ से वेदमन्त्र उच्चारित होते थे, 
गलियों में यज्ञध्रुम की सुगन्ध पसरी रहती थी। 
"वसुधैव कुटुंकम" की अवधारणा को जन्म देने वाली उस पूण्य भूमि पर सौ वर्ष पूर्व तक सनातन धर्म पूरी प्रतिष्ठा के साथ खड़ा था। 
पर आज का सत्य यह है कि अफगानिस्तान से महाविनायक पर लेख लिख कर जब उस युवक ने भारत भेजा तो पत्रिका के सम्पादक ने भय के मारे लेख में उनका नाम तक नहीं जोड़ा, कि कहीं उन्हें अफगानिस्तान में इसका दण्ड न भोगना पड़े।

सभ्यताओं के चिन्ह कैसे मरते हैं देखें। 
काबुल में एक अत्यंत प्राचीन तीर्थस्थल है 'आशा माई'। 
पस्तो प्रभाव के कारण वहां के लोग उस स्थान को 'कोही आस्माई' कहते थे, मतलब आशामाई की पहाड़ी। 
बीस वर्ष पूर्व सरकार ने उस पहाड़ी पर टेलीविजन का टावर लगा दिया, लोग धीरे धीरे उस स्थान को "कोही टेलीविजन" कहने लगे। 
आशामाई का नाम मिट गया।
काबुल में ही एक सड़क थी, देवगनाना रोड। 
देवगनाना संस्कृत के "देवगणानाम" का अपभ्रंस है। 
अब उस सड़क का नाम है, दे-अफ़ग़ान रोड। 
सभ्यता के चिन्ह ऐसे मरते हैं।

देश में लोकतंत्र का महापर्व चल रहा है। मत देना हमारा कर्तव्य भी है, और हमारी आवश्यकता भी। अपने घरों से निकलिए, और मत देते समय इतना अवश्य याद रखिए कि अब हमारे पास धरती का यही एक टुकड़ा है जहाँ हम अपनी परम्पराओं को निभा सकते हैं, महाविनायक की अर्चना कर सकते हैं। 
ऐसा ना हो कि सौ पचास वर्षों बाद किसी दूसरे Lalit Kumar को इसी तरह दिल्ली, आगरा, मथुरा या कानपुर में अपने चिन्ह खोजने आना पड़े। 
यकीन मानिए 200 वर्ष पहले काबुल के हिंदुओं ने भी ऐसा नहीं सोचा होगा कि 200 वर्ष बाद हमारा कोई बच्चा जब काबुल आएगा तो उसे अपने पूर्वजों के चिन्ह इस दशा में मिलेंगे। 
1946 ईस्वी तक सिंध के लोगों ने यह नहीं सोचा होगा कि पचास वर्ष बाद ही उनसे उनकी सम्पति, उनका धर्म, उनकी बेटियां, उनके बेटे सबकुछ छीन लिए जाएंगे।

हम सभ्यताओं के युद्ध में जी रहे हैं। 
हमको छोड़कर हर सभ्यता हमारी परम्पराओं को अपराध और हराम बताती है, और मूर्ति तथा मूर्तिपूजकों की समाप्ति को ही अपना परम् उद्देश्य मानती है।

उनकी तलवार हमारी गर्दन पर है... यही है हमारा आज का सत्य।
मैं यह नहीं कह रहा कि आप फलाँ दल को वोट दीजिये। 
मैं क्यों कहूँ? 
मैं बस यह कह रहा हूँ कि मत देते समय ध्यान रखिये कि मत अपने देश के लिए देना है। 

मत इसलिए देना है ताकि देश मे फिर कोई हत्यारा गुरु गोविंद सिंह जी के साहिबजादों को दीवाल में न चुनवा सके। 

मत इसलिए देना है ताकि फिर किसी बिरसा मुंडा को अपनी संस्कृति के लिए प्राण न देना पड़े।
मत इसलिए देना है ताकि फिर किसी पद्मावती को अग्नि में न उतरना पड़े। 

मत इसलिए देना है ताकि अयोध्या, मथुरा, काशी, कांची, पूरी, अवंतिका बनी रहे। 

मत इसलिए देना है ताकि हजार वर्षों बाद भी जब हमारा कोई बेटा इस मिट्टी को सूँघे तो उसे इस मिट्टी में हमारी गन्ध मिल सके। 

मत इसलिए देना है ताकि हमारा देश हमारा ही रहे। 
अपना देश रहेगा तभी हम रहेंगे।

खत्म होता इतिहास

आंख खोलकर पढ़िये....!!

ईशा की पांचवी सदी में शाही राजा खिंगल ने अफगानिस्तान के गर्देज स्थान पर महाविनायक की प्राण प्रतिष्ठा कराई थी। 
समय के साथ सभ्यता के ऊपर धूल चढ़ती गई और महाविनायक की प्रतिमा मिट्टी में कहीं दब गई।

युगों बाद खुदाई में जब वह प्रतिमा मिली तो उसे काबुल में "दरगाह पीर रतन नाथ" के पास स्थापित किया गया। दरगाह पीर रतन नाथ की कहानी किसी दूसरे दिन सुनाएंगे। 
आज कहानी महाविनायक की।

दो वर्ष पूर्व बिहार का एक युवक अफगानिस्तान में भारतीय दूतावास में नौकरी करने पहुँचा। 
स्वयं को यायावर कहने वाले उस युवक को अफगानिस्तान के प्राचीन महाविनायक के सम्बंध में पता था, सो वे महाविनायक के चिन्ह खोजने निकले। 
पर अफगानिस्तान में सनातन के चिन्ह जितने ही सुलभ हैं, उन्हें खोज लेना उतना ही दुर्लभ। 
कई दिनों नहीं कई महीनों के बाद उन्हें पीर रतन नाथ दरगाह का पता चला तो वे एक दिन पहुंचे तो एक ऐसा घर मिला जिसे भारत में मंदिर नहीं कह सकते। उस मंदिर में प्रतिमा स्थापित नहीं थी, बस रामायण महाभारत और गीता आदि पुस्तके रखी हुई थीं।

युवक ने सेवादार से जब महाविनायक की प्रतिमा के बारे में पूछा तो बुजुर्ग सेवादार आश्चर्य में डूब गया। क्या कोई दूर देश से मात्र एक प्रतिमा के लिए आया है? कौन है यह?
भावुक हो चुके सेवादार ने एक बन्द कमरे में रखी महाविनायक की प्रतिमा दिखाई... 
युगों बाद किसी ने श्रद्धा से महाविनायक को देखा, युगों बाद महाविनायक की प्रतिमा ने अपने किसी श्रद्धालु को वात्सल्य की दृष्टि से देखा। 
उस दिन युगों बाद किसी ने अभिशप्त महाविनायक के चरणों में प्रणाम किया, प्रतिमा पोंछी और बीस रुपये वाले माला से उनका श्रृंगार किया।

जानते हैं, ढाई हजार वर्ष पूर्व अफगानिस्तान के हर कण्ठ से वेदमन्त्र उच्चारित होते थे, 
गलियों में यज्ञध्रुम की सुगन्ध पसरी रहती थी। 
"वसुधैव कुटुंकम" की अवधारणा को जन्म देने वाली उस पूण्य भूमि पर सौ वर्ष पूर्व तक सनातन धर्म पूरी प्रतिष्ठा के साथ खड़ा था। 
पर आज का सत्य यह है कि अफगानिस्तान से महाविनायक पर लेख लिख कर जब उस युवक ने भारत भेजा तो पत्रिका के सम्पादक ने भय के मारे लेख में उनका नाम तक नहीं जोड़ा, कि कहीं उन्हें अफगानिस्तान में इसका दण्ड न भोगना पड़े।

सभ्यताओं के चिन्ह कैसे मरते हैं देखें। 
काबुल में एक अत्यंत प्राचीन तीर्थस्थल है 'आशा माई'। 
पस्तो प्रभाव के कारण वहां के लोग उस स्थान को 'कोही आस्माई' कहते थे, मतलब आशामाई की पहाड़ी। 
बीस वर्ष पूर्व सरकार ने उस पहाड़ी पर टेलीविजन का टावर लगा दिया, लोग धीरे धीरे उस स्थान को "कोही टेलीविजन" कहने लगे। 
आशामाई का नाम मिट गया।
काबुल में ही एक सड़क थी, देवगनाना रोड। 
देवगनाना संस्कृत के "देवगणानाम" का अपभ्रंस है। 
अब उस सड़क का नाम है, दे-अफ़ग़ान रोड। 
सभ्यता के चिन्ह ऐसे मरते हैं।

देश में लोकतंत्र का महापर्व चल रहा है। मत देना हमारा कर्तव्य भी है, और हमारी आवश्यकता भी। अपने घरों से निकलिए, और मत देते समय इतना अवश्य याद रखिए कि अब हमारे पास धरती का यही एक टुकड़ा है जहाँ हम अपनी परम्पराओं को निभा सकते हैं, महाविनायक की अर्चना कर सकते हैं। 
ऐसा ना हो कि सौ पचास वर्षों बाद किसी दूसरे Lalit Kumar को इसी तरह दिल्ली, आगरा, मथुरा या कानपुर में अपने चिन्ह खोजने आना पड़े। 
यकीन मानिए 200 वर्ष पहले काबुल के हिंदुओं ने भी ऐसा नहीं सोचा होगा कि 200 वर्ष बाद हमारा कोई बच्चा जब काबुल आएगा तो उसे अपने पूर्वजों के चिन्ह इस दशा में मिलेंगे। 
1946 ईस्वी तक सिंध के लोगों ने यह नहीं सोचा होगा कि पचास वर्ष बाद ही उनसे उनकी सम्पति, उनका धर्म, उनकी बेटियां, उनके बेटे सबकुछ छीन लिए जाएंगे।

हम सभ्यताओं के युद्ध में जी रहे हैं। 
हमको छोड़कर हर सभ्यता हमारी परम्पराओं को अपराध और हराम बताती है, और मूर्ति तथा मूर्तिपूजकों की समाप्ति को ही अपना परम् उद्देश्य मानती है।

उनकी तलवार हमारी गर्दन पर है... यही है हमारा आज का सत्य।
मैं यह नहीं कह रहा कि आप फलाँ दल को वोट दीजिये। 
मैं क्यों कहूँ? 
मैं बस यह कह रहा हूँ कि मत देते समय ध्यान रखिये कि मत अपने देश के लिए देना है। 

मत इसलिए देना है ताकि देश मे फिर कोई हत्यारा गुरु गोविंद सिंह जी के साहिबजादों को दीवाल में न चुनवा सके। 

मत इसलिए देना है ताकि फिर किसी बिरसा मुंडा को अपनी संस्कृति के लिए प्राण न देना पड़े।
मत इसलिए देना है ताकि फिर किसी पद्मावती को अग्नि में न उतरना पड़े। 

मत इसलिए देना है ताकि अयोध्या, मथुरा, काशी, कांची, पूरी, अवंतिका बनी रहे। 

मत इसलिए देना है ताकि हजार वर्षों बाद भी जब हमारा कोई बेटा इस मिट्टी को सूँघे तो उसे इस मिट्टी में हमारी गन्ध मिल सके। 

मत इसलिए देना है ताकि हमारा देश हमारा ही रहे। 
अपना देश रहेगा तभी हम रहेंगे।

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शनिवार, 4 अप्रैल 2026

मोदीजी के खिलाफ षड्यंत्र

कोई नहीं जानता है कि *ये देश जस्टिस एमबी सोनी का भी कर्जदार है।*

नरेंद्र मोदी को जेल मे सड़ाने की प्लानिंग किसकी थी...?

और इस षड्यंत्र से कैसे नरेंद्र मोदी बच सके...?

*_षड्यंत्र कितने खतरनाक!!!😳_*

*_आप अंदाज नहीं लगा सकते!!!🫣_*

*_अगर वो सफल हो जाते!!! तो हम क्या खो देते...?_*
*_और नरेंद्र मोदी का हश्र क्या होता...?_*

कांग्रेस राज में कोई भी केस सुप्रीम कोर्ट में जाने के पहले ही सब कुछ मैनेज हो जाता था।

कि केस किस जज की बेंच में जायेगा और वो जज क्या फैसला देंगे...

कांग्रेस की 70 सालों की सफलता का यही सबसे बड़ा राज ये है कि, उसने मीडिया और न्यायपालिका सबको मैनेज करके अपना राज स्थापित किया।

गुजरात हाईकोर्ट के रिटायर जज जस्टिस एमबी सोनी ने इसका खुलासा तब किया, जब उन्होंने पाया की गुजरात दंगो के सम्बन्धित कोई भी याचिका, जो तीस्ता सीतलवाड सुप्रीम कोर्ट में दायर करती है वो सिर्फ जस्टिस आफताब आलम के बेंच में ही क्यों जाती है, जबकि रोस्टर के अनुसार वो किसी और के बेंच में जानी चाहिए थी।

फिर उन्होंने और तहकीकात की तो पता चला कि रजिस्ट्रार को ऊपर से आदेश था कि तीस्ता का केस जस्टिस आफ़ताब आलम के बेंच में ही भेजा जाए और इसके लिए मस्टर रोल और रोस्टर को बदल दिया जाये।

फिर उन्होंने और तहकीकात की तो पता चला कि....

जस्टिस आफताब आलम की सगी बेटी अरुसा आलम, तीस्ता के एनजीओ सबरंग में पार्टनर है और...

उस समय के केबिनेट मंत्री और सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल की पत्नी भी उसी एनजीओ में है...

यह सब जानकर उन्होंने इसके खिलाफ चीफ जस्टिस को पत्र भेजा, और जस्टिस आफ़ताब आलम, कांग्रेस नेता और हिमाचल के मुख्यमंत्री की बेटी (जस्टिस अभिलाषा कुमारी) के 10 फैसलों की बकायदा आठ हजार पन्नों में विस्तृत बिवेचना करके भेजी....

और कहा कि इन लोगों ने खुलेआम न्यायव्यवस्था का बलात्कार किया है।

इसके बाद ही इस गैंग को गुजरात के हर एक मामले से अलग किया गया।

*_अगर जस्टिस एम बी सोनी नहीं होते तो कांग्रेस सरकार नरेंद्र मोदी को दंगों के मामलों में फंसाने की पूरी प्लानिंग कर चुकी थी।_*

*क्या कभी आपने राहुल गांधी, लालू यादव, सीताराम येचुरी, मायावती, अखिलेश, ममता, महबूबा, और विपक्ष के नेताओं को एक दूसरे को चोर बोलते सुना है...?🤔*

नहीं ना...🤨

*जबकि इनमें से कुछ को सजा भी हो चुकी है, कोई जेल में है, कोई बेल पर है और कुछ पर कोर्ट में मुकदमे है !*

*मगर ये लोग एक दूसरे को चोर कभी नहीं बोलते? परन्तु मोदी पर कोई भी आधिकारिक आरोप नहीं है, कोई FIR नहीं है, कोई मुकदमा भी नहीं चल रहा है और किसी कोर्ट ने किसी जाँच का आदेश भी नहीं दिया, उसे ये चोर बोलते हैं?*

*_हिमाद्रि तुंग शृंग से प्रबुद्ध शुद्ध भारती।।_*

*_स्वयं प्रभा समुज्ज्वला स्वतंत्रता पुकारती।।_*

*_अमर्त्य वीर पुत्र हो, दृढ़- प्रतिज्ञ सोच लो।।_*

*_प्रशस्त पुण्य पंथ है, बढ़े चलो, बढ़े चलो।।_*

*_-साभार 🙏_*

पुस्तकों के अंश

महात्मा गांधी के यौन जीवन की अनकही कहानी। (अपनी पोती (मनु) और अन्य महिलाओं के साथ नग्न सोते थे।)

लंदन के प्रतिष्ठित अखबार "द टाइम्स" के अनुसार, 82 वर्षीय गांधीवादी इतिहासकार कुसुम वदगामा, जो कभी गांधी को भगवान की तरह पूजती थीं, ने कहा कि गांधी को यौन की बुरी लत थी और वे आश्रम में कई महिलाओं के साथ नग्न सोते थे।
वे इतने कामुक थे कि ब्रह्मचर्य के प्रयोग और संयम की परीक्षा के बहाने उन्होंने अपने चाचा अमृतलाल तुलसीदास गांधी की पोती और जयसुखलाल की बेटी मनुबेन गांधी के साथ सोना शुरू कर दिया।
ये आरोप बहुत सनसनीखेज हैं क्योंकि कुसुम अपनी किशोरावस्था में गांधी की अनुयायी भी रही हैं। प्रसिद्ध ब्रिटिश इतिहासकार जेड एडम्स ने पंद्रह वर्षों के गहन अध्ययन और शोध के बाद 2010 में "गांधी: नेकेड एम्बिशन" लिखकर सनसनी मचा दी थी।

किताब में गांधी को असामान्य यौन व्यवहार वाला एक 'सेमी-रिप्रेस्ड सेक्स-मेनियाक' (अर्ध-दमित यौन-उन्मादी) कहा गया है। यह पुस्तक राष्ट्रपिता के जीवन में आने वाली लड़कियों के साथ उनके अंतरंग और मधुर संबंधों पर विशेष प्रकाश डालती है।
उदाहरण के लिए, गांधी लड़कियों और महिलाओं के साथ नग्न सोते थे और नग्न स्नान भी करते थे। देश के सबसे सम्मानित लाइब्रेरियन गिरिजा कुमार ने गांधी से संबंधित दस्तावेजों के गहन अध्ययन और शोध के बाद डेढ़ दर्जन महिलाओं का विवरण दिया है।

जो 2006 में "ब्रह्मचर्य गांधी एंड हिज विमेन एसोसिएट्स" में ब्रह्मचारी सहयोगी थीं। वे गांधी के साथ नग्न सोती थीं, उन्हें स्नान कराती थीं और मालिश करती थीं। इनमें मनु, आभा गांधी, आभा की बहन बीना पटेल, सुशीला नैयर, प्रभावती (जयप्रकाश नारायण की पत्नी), राजकुमारी अमृत कौर,
बीबी अमतुसलाम, लीलावती असर, प्रेमाभन कंटक, मिली ग्राहम पोलक, कंचन शाह, रेहाना तैयबजी शामिल हैं। प्रभावती अपने पति जेपी को छोड़कर आश्रम में रहने चली आई थीं। इस कारण जेपी का गांधी से विशेष विवाद भी हुआ था।

निर्मल कुमार बोस, जो लगभग दो दशकों तक महात्मा गांधी के निजी सहायक थे, ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक "माय डेज विद गांधी" में राष्ट्रपिता के आश्रम की महिलाओं के साथ नग्न सोने और अपने आत्म-नियंत्रण के परीक्षण के लिए मालिश करवाने का उल्लेख किया है।
नोआखली की एक विशेष घटना का जिक्र करते हुए निर्मल बोस ने लिखा, "एक सुबह जब मैं गांधी के बेडरूम में पहुँचा, तो मैंने सुशीला नैयर को रोते हुए और महात्मा को दीवार पर अपना सिर पटकते हुए देखा।"
उसके बाद बोस ने गांधी के ब्रह्मचर्य के अभ्यास का खुलकर विरोध किया। जब गांधी ने उनकी बात नहीं मानी, तो बोस ने खुद को उनसे अलग कर लिया।

एडम्स के अनुसार, गांधी ने स्वयं लिखा है, जब सुशीला स्नान करते समय मेरे सामने नग्न होती हैं, तो मेरी आँखें कसकर बंद हो जाती हैं। मुझे कुछ दिखाई नहीं देता। मुझे केवल साबुन लगाने की आवाज सुनाई देती है। मुझे अंदाज़ा नहीं होता कि वह कब पूरी तरह नग्न है और कब वह सिर्फ अपने अंडरवियर में है।
दरअसल, जब पंचगनी में गांधी के महिलाओं के साथ नग्न सोने की बात फैलने लगी, तो वहाँ नाथूराम गोडसे के नेतृत्व में विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए। इसके कारण गांधी को प्रयोग रोकना पड़ा और वहाँ से अपना बोरिया-बिस्तर समेटना पड़ा।

बाद में, गांधी हत्या के मुकदमे के दौरान, गोडसे के विरोध को गांधी की हत्या के कई प्रयासों में से एक माना गया।
एडम्स का दावा है कि सुशीला, मनु, आभा और अन्य महिलाएं जो गांधी के साथ सोती थीं, उन्होंने हमेशा गांधी के साथ अपने शारीरिक संबंधों के बारे में अस्पष्ट और गोलमोल बातें कीं। जब भी उनसे पूछा गया, उन्होंने केवल यही कहा कि यह सब ब्रह्मचर्य के सिद्धांतों का अभिन्न अंग था।
गांधी की हत्या के बाद उनके यौन प्रयोगों को भी लंबे समय तक दबा दिया गया। उन्हें महिमामंडित करने और राष्ट्रपिता बनाने के लिए उन दस्तावेजों, तथ्यों और सबूतों को नष्ट कर दिया गया, जो यह साबित कर सकते थे कि संत गांधी, वास्तव में, एक 'सेक्स-मेनियाक' थे।

कांग्रेस भी स्वार्थवश गांधी के यौन-प्रयोग से जुड़े सच को छुपाती रही है। गांधी की हत्या के बाद मनु को अपना मुंह बंद रखने का सख्त निर्देश दिया गया था। उन्हें गुजरात के एक बहुत ही दूरदराज के इलाके में भेज दिया गया था।
सुशीला भी इस मुद्दे पर हमेशा चुप रहीं। सबसे दुखद बात यह है कि गांधी के ब्रह्मचर्य के प्रयोग में शामिल लगभग सभी महिलाओं का वैवाहिक जीवन बर्बाद हो गया।

एक ब्रिटिश इतिहासकार के अनुसार, जवाहरलाल नेहरू गांधी को उनके ब्रह्मचर्य के कारण एक अप्राकृतिक और असामान्य व्यक्ति मानते थे। सरदार पटेल और जे.बी. कृपलानी ने उनके व्यवहार के कारण उनसे दूरी बना ली थी।
गिरिजा कुमार के अनुसार, पटेल ने गांधी के ब्रह्मचर्य को अधर्म कहना शुरू कर दिया था। यहाँ तक कि बेटे देवदास गांधी सहित परिवार के सदस्य और अन्य राजनीतिक सहयोगी भी नाराज थे।

बी.आर. अंबेडकर, विनोबा भावे, डी.बी. केलकर, छगनलाल जोशी, किशोरलाल मशरूवाला, मथुरादास त्रिकुमजी, वेद मेहता, आर.पी. परशुराम, जयप्रकाश नारायण भी गांधी के ब्रह्मचर्य के प्रयोग का खुलकर विरोध कर रहे थे।
अब तक बापू की छवि गोल फ्रेम का चश्मा पहने एक ऐसे बूढ़े व्यक्ति की रही है, जो दो युवतियों को लाठी के सहारे की तरह इस्तेमाल करते हुए घूमते हैं। अंतिम समय तक गांधी ऐसे ही राजसी वातावरण में रहे।
साभार 

गुरुवार, 2 अप्रैल 2026

युद्ध जीतकर भी हार गए

1971 की लड़ाई में इंदिरा गांधी की तारीफ तो हम सब करते हैं, लेकिन पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी के संसद में दिए उस धमाकेदार बयान को पढ़ना जरूरी है, जो शिमला समझौते की सच्चाई उजागर करता है।

युद्ध की पृष्ठभूमि
1971 के युद्ध में पाकिस्तान के 93,000 से अधिक सैनिक भारतीय कैद में थे, जिनमें 3,000 से ज्यादा अधिकारी शामिल थे।

भारतीय सेना ने सिंध के थारपारकर जिले के बड़े हिस्से पर कब्जा कर लिया था और उसे गुजरात का नया जिला घोषित करने की घोषणा की थी।

मुजफ्फराबाद में भी तिरंगा फहराया गया था, लेकिन ये सारी जीत मैदान में हुई—मेज पर कुछ और ही हुआ।

शिमला समझौते का खेल
जुल्फिकार अली भुट्टो अपनी बेटी बेनजीर भुट्टो को लेकर शिमला आए, जहां इंदिरा गांधी ने कश्मीर की मांग रखी—93000 सैनिकों के बदले कश्मीर दो।

 भुट्टो ने साफ इनकार कर दिया: "कश्मीर नहीं देंगे, सैनिक रख लो।" जिनेवा कन्वेंशन के तहत युद्धबंदियों की गरिमा बनाए रखना भारत पर था, जिसका बोझ इंदिरा नहीं झेल सकीं।

भुट्टो की कूटनीति
भुट्टो ने बेनजीर से कहा कि भारत की कमर टूट चुकी—शरणार्थियों का बोझ, अर्थव्यवस्था चरमराई, 93000 सैनिक पालना असंभव।

 उन्होंने इंदिरा को घेर लिया, जैसे सांप के गले में छछूंदर फंस जाए। पुपुल जयकर और कुलदीप नैयर की किताबों में लिखा है कि इंदिरा के पास कूटनीतिक दांव का ज्ञान नहीं था, वो मौके चूक गईं।

समझौते का नतीजा
शिमला समझौते (1972) में इंदिरा ने कश्मीर मुद्दा द्विपक्षीय रखा, 93000 पाक सैनिक लौटा दिए, थारपारकर (जहां 1971 में हिंदू बहुल आबादी थी) पाकिस्तान को वापस कर दिया।

 भारत के 54-56 सैनिक पाक जेलों में, मरते रहे।

सेना प्रमुख का गुस्सा
तत्कालीन सेना प्रमुख ने रिटायरमेंट के बाद किताब में लिखा: "मैदान में हम जीते, लेकिन राजनेताओं ने मेज पर हरा दिया—वो इंदिरा गांधी थीं।"

 आसिफ जरदारी ने संसद में कहा कि भुट्टो ने इंदिरा से जमीन वापस ले ली, जबकि 90,000 कैदी भारत के पास थे।

कांग्रेस का इतिहास यही बताता है—युद्ध जीता, लेकिन कूटनीति में बर्बादी। ये दमदार सबक है कि ताकत मैदान तक सीमित न रहे।

हिंसा - बलात्कार और नेहरू

विभाजन के बाद 1947 में पाकिस्तान में हिंदुओं की ह'त्याओं, लड़कियों से बला'त्कार का नंगा नाच हो रहा था। लाहौर से हर ट्रैन में ला...