उस दिन अगर वो गद्दारी न हुई होती... तो 1915 में ही हम आज़ाद हो गए होते और 'राष्ट्रपिता' ये व्यक्ति होता 👇!"
खून खौल उठता है यह सोचकर कि जिस शेर ने अकेले दम पर रॉयल बंगाल टाइगर के जबड़े फाड़ दिए थे, उसे हम हिंदुस्तानियों ने ही अकेला छोड़ दिया। हम 1947 की आज़ादी की सालगिरह मनाते हैं, लेकिन उस 10 सितंबर 1915 की उस काली दोपहर को भूल गए, जब एक महानायक का सपना अपनों की ही मुखबिरी की भेंट चढ़ गया।
आज दिल बहुत भारी है यह सोचकर कि हमारे देश का इतिहास कितना अलग होता, अगर उस दिन अपनों ने ही पीठ में छुरा न घोंपा होता। हम 1947 की आजादी का जश्न मनाते हैं, लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि एक शख्स ऐसा भी था जिसने 1915 में ही भारत को आजाद कराने का पूरा ब्लूप्रिंट तैयार कर लिया था।
मैं बात कर रहा हूँ जतीन्द्रनाथ मुखर्जी की, जिन्हें दुनिया 'बाघा जतिन' के नाम से जानती है।
सोचिए, वो कैसा फौलादी इंसान रहा होगा जिसने बिना किसी बंदूक के, सिर्फ एक छोटी सी खुखरी से रॉयल बंगाल टाइगर को ढेर कर दिया था। लेकिन उनका असली मुकाबला उन 'सफेद भेड़ियों' से था जिन्होंने हमारी मां भारती को जकड़ रखा था। जतिन दा का एक ही मंत्र था "देश के लिए मरना सीखो, ताकि देश जी सके।"
मुझे उनकी वो बातें आज भी झकझोर देती हैं
साहस का वो मंजर जब अंग्रेजों ने गाड़ी की छत पर बैठकर भारतीय महिलाओं का अपमान किया, तो जतिन दा अकेले उन पर टूट पड़े और तब तक मारा जब तक कि अंग्रेज पैरों में नहीं गिर गए। उस दौर में, जहाँ लोग अंग्रेजों के साये से डरते थे, जतिन दा उन्हें बीच सड़क पर पीट दिया करते थे।
विवेकानंद का वो प्रभाव जो स्वामी जी ने उन्हें सिखाया था कि लोहे की मांसपेशियों में ही वज्र जैसा संकल्प रहता है। और जतिन दा ने उसे जी कर दिखाया।
गद्दारी की वो चोट जब उन्होंने जर्मनी से हथियार मंगाकर पूरे देश में एक साथ बगावत की योजना बनाई थी। चेक जासूस रॉस हेडविक ने खुद लिखा था कि अगर वह प्लान कामयाब हो जाता, तो आज राष्ट्रपिता बाघा जतिन होते। पर अफ़सोस, एक गद्दार की मुखबिरी ने हमें 32 साल और गुलामी की आग में झोंक दिया।
10 सितंबर 1915 को जब उन्होंने अस्पताल में आखिरी सांस ली, तो उनका शरीर गोलियों से छलनी था, लेकिन चेहरे पर हार का गम नहीं, बल्कि भारत माता के प्रति समर्पण की चमक थी।आज समय है यह पूछने का कि क्या हमारी देशभक्ति सिर्फ 15 अगस्त और 26 जनवरी के स्टेटस तक सीमित है? बाघा जतिन और उनके साथियों ने जब बूढ़ी बालम की तट पर आखिरी गोलियां झेली थीं, तो उनके सामने कोई निजी स्वार्थ नहीं था। उन्हें पता था कि वह शाम उनकी आखिरी शाम है, फिर भी उन्होंने समर्पण के बजाय संघर्ष को चुना।
इतिहास गवाह है कि हम दुश्मनों से कभी नहीं हारे, हम तब-तब हारे जब घर के ही किसी भेदी ने दरवाज़ा खोल दिया। आज बाघा जतिन को सच्ची श्रद्धांजलि यह नहीं होगी कि हम उनकी तस्वीर पर फूल चढ़ाएं, बल्कि यह होगी कि:
हम अपने इतिहास के उन विस्मृत नायकों (Forgotten Heroes) को पहचानें।
राष्ट्रहित को व्यक्तिगत लाभ से ऊपर रखें, ताकि फिर कभी कोई 'मुखबिरी' किसी क्रांतिकारी के सपने को न कुचल सके।
अपनी आने वाली पीढ़ियों को बताएं कि आज़ादी केवल अहिंसा के चरखे से नहीं, बल्कि जतिन दा जैसे शेरों के लहू से भी सींची गई है।
याद रखिये, जो राष्ट्र अपने बलिदानियों को भूल जाता है, उसका भूगोल बदल जाता है। जतिन दा का शरीर उस दिन गोलियों से छलनी हुआ था, लेकिन उनकी रूह आज भी हर उस हिंदुस्तानी में ज़िंदा है जो अन्याय के खिलाफ खड़ा होने का हौसला रखता है।
उठो! और अपने अंदर के उस 'बाघा' को जगाओ, जो देश के लिए मरने से पहले, देश के लिए जीना जानता हो।"
आज जब हम आजादी की खुली हवा में सांस लेते हैं, तो एक पल के लिए रुक कर सोचिएगा जरूर... क्या हम उन बलिदानों के लायक बन पाए हैं? जतिन दा जैसे नायक इतिहास की किताबों के किसी कोने में खो गए हैं, लेकिन हमारे दिलों में उनकी मशाल जलती रहनी चाहिए।
बाघा जतिन जैसे महान क्रांतिकारी के चरणों में मेरा कोटि-कोटि नमन।
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