मंगलवार, 17 फ़रवरी 2026

फ़िरोज़ गाँधी की दास्तान

एक दो दिन से *कांग्रेस के मणिशंकर अय्यर* बहुत चर्चा में है, उन्होंने कांग्रेस प्रवक्ताओं को विशेषकर *पवन बखेड़ा* को *चमचा* कहा जैसा बाक़ी सभी भक्त लोग सम्माननीय कांग्रेसियों को कहते हैं।
*भारतीय राजनीति और संस्कृति में चमचो का अलग ही स्थान है, हमारे समाज में भी कुछ लोग चुनाव हराकर भी पद प्राप्त करने में कामयाब हो जाते हैं सिर्फ़ चमचागिरी करके, किंतु कांग्रेस में हमेशा ऐसा नहीं रहा।*
राहुल गाँधी के दादा जी *स्वर्गीय फिरोज गांधी* भारतीय राजनीति के इतिहास के वे *दामाद* थे, जिन्होंने *ससुराल में सोफ़े पर बैठकर चाय पीने के बजाय, ससुराल की ही ईंट से ईंट बजाना बेहतर समझा।*
उन्होंने नेहरू को 'ससुर' और गांधी को 'नाम' के रूप में चुना—एक ने उन्हें सत्ता के गलियारे दिए, दूसरे ने उन गलियारों में आग लगाने की हिम्मत!
*कल्पना कीजिए, आज के दौर में कोई दामाद अपने ससुर की कंपनी के घोटालों की फाइलें लेकर प्रेस कॉन्फ्रेंस कर दे?* फिरोज गांधी ने 1957 में यही किया था। नेहरू जी तब देश के निर्विवाद नायक थे, लेकिन फिरोज ने संसद में खड़े होकर *मुंद्रा कांड* की ऐसी परतें खोलीं कि नेहरू जी को समझ नहीं आ रहा था कि वे सदन के नेता के रूप में जवाब दें या ससुर के रूप में गुस्सा करें।
*मुंद्रा कांड (1957): LIC का वो 'पहला पाप'*
यह वह समय था जब नेहरू का नाम ही कानून था, लेकिन फिरोज ने दिखाया कि लोकतंत्र में 'जनता का पैसा' किसी भी रिश्ते से ऊपर है।
*हरिदास मुंद्रा नाम के एक शातिर सट्टेबाज ने नेहरू सरकार के कुछ अधिकारियों और वित्त मंत्री टी.टी. कृष्णमाचारी के साथ मिलकर एक योजना बनाई। LIC (भारतीय जीवन बीमा निगम), जो उस समय जनता के भरोसे का प्रतीक था, उसे मजबूर किया गया कि वह मुंद्रा की छह डूबती हुई कंपनियों के रद्दी शेयर खरीदे।*
16 दिसंबर 1957 को संसद में फिरोज गांधी ने जब फाइलें खोलीं, तो सन्नाटा पसर गया। उन्होंने तीखा व्यंग्य करते हुए पूछा— *”क्या यह सरकार का काम है कि वह सट्टेबाजों के कचरे को जनता की गाढ़ी कमाई से साफ करे?"*
यह शायद इतिहास का पहला उदाहरण था जहाँ डाइनिंग टेबल पर बैठा व्यक्ति (दामाद) सुबह संसद में जाकर अपने ही मेजबान (ससुर) की सरकार का 'कबाड़ा' कर रहा था। मुंद्रा कांड ने नेहरू को इतना मजबूर कर दिया कि उन्हें अपने सबसे प्रिय वित्त मंत्री की बलि देनी पड़ी और सट्टेबाज मुद्रा को जेल भेजना पड़ा
उन्होंने LIC के पैसे के दुरुपयोग को ऐसे पकड़ा जैसे कोई अनुभवी जासूस। नतीजा? वित्त मंत्री का इस्तीफा हो गया और ससुर-दामाद के बीच डिनर टेबल पर सन्नाटा छा गया। फिरोज गांधी ने साबित किया कि "ससुराल गेंदा फूल" हो सकता है, लेकिन भ्रष्टाचार "कांटों की सेज" ही होगा।

*यह फिरोज गांधी ही थे जिन्होंने भारतीय राजनीति को सिखाया कि "देशभक्ति का मतलब सरकार की जी-हुजूरी करना नहीं, बल्कि जनता के पैसे की चौकीदारी करना है।"*

फिरोज गांधी का व्यक्तित्व बहुत गहरा और गंभीर था। वे केवल एक 'विद्रोही' नहीं थे, वे एक बेहद पढ़ा-लिखा और मेहनती सांसद थे। वे आंकड़ों के जादूगर थे। *लेकिन दुख की बात है की राहुल गांधी में उनके DNA का कुछ भी नहीं है।*
फिरोज गांधी सत्ता के सबसे करीब रहकर भी सत्ता की चापलूसी नहीं की।
फिरोज और इंदिरा का रिश्ता किसी ग्रीक ट्रेजेडी (Greek Tragedy) जैसा था। वे एक-दूसरे से प्यार तो करते थे, लेकिन फिरोज की 'आजाद खयाली' और इंदिरा की 'सत्ता की मजबूरी' के बीच एक गहरी खाई थी।
          आज के दौर में जहाँ लोग 'टिकट' के लिए अपनी विचारधारा बदल लेते हैं, फिरोज गांधी ने अपनी विचारधारा के लिए अपना 'घर' (तीन मूर्ति भवन) तक छोड़ दिया और एक छोटे से सरकारी बंगले में रहने चले गए।

फिरोज गांधी को इतिहास ने थोड़ा भुला दिया। शायद इसलिए क्योंकि वे "फिट" नहीं बैठते थे। न वे पूरी तरह कांग्रेस के 'दरबारी' बन पाए, और न ही विपक्ष के 'मोहरे'।
*उनकी मौत 48 साल की उम्र में हुई। शायद उनका दिल इतना बड़ा था कि उसमें नेहरू की नाराजगी, इंदिरा का प्रेम और देश के घोटालों का बोझ—तीनों एक साथ नहीं समा सके।*
आज अगर फिरोज गांधी जीवित होते तो शायद वो अपना सरनेम बदलकर *मोदी* अवश्य कर लेते और राहुल गाँधी को देखते ही दादाजी थप्पड़ रसीद करने से भी बाज नहीं आते।
✍️विकास जैन

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