कल निर्जला एकादशी पर नगर में जगह - जगह छबील लगाकर मीठा शरबत, गन्ने का रस आदि पिलाया गया।
लेकिन ऐसा पुण्य कमाने वाले थोड़ा ध्यान बाद में सड़को पर फैले गिलासो पर भी देते और एक प्लास्टिक का बैग ही एक तरफ रख देते और सभी को शरबत पीने के बाद गिलास बैग में डालने को कहते तो काफ़ी हद तक समस्या का समाधान हो जाता।
इससे भी ज्यादा गलत बात तो यह है की प्लास्टिक के पतले गिलास जिन पर पाबन्दी है उनमें शरबत पिलाया जाना ठीक नहीं है। कुछ जगहों पर तो पेपर के गिलास इस्तेमाल किये गये लेकिन वे भी सड़को पर बिखरे रहें। और जहां प्लास्टिक के पतले गिलास इस्तेमाल हुए वहाँ का तो बुरा हाल ही था।
दरअसल स्वछता के प्रति आम लोगों की लापरवाही के कारण नगर की नालियों में प्लास्टिक कचरा यानि थैलिया, पाउच, छोटी बोतले अटकी पड़ी रहती हैं। जिसके कारण नाले भी ऐसे कचरे से अटे रहते हैं।
वैसे तो पतली प्लास्टिक की थैलिया, कैरी बैग, प्लास्टिक के गिलासो पर पाबंदी है लेकिन ये आज भी बाजार में आसानी से उपलब्ध है। जनमानस को खुद ही सोचना चाहिए की ये सभी हमारे लिए नुकसान दायक हैं।
सुनील जैन राना
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