रविवार, 15 जून 2025

महा कंजूस निज़ाम

साल 1911 में उस्मान अली खान हैदराबाद के निजाम बने। तब निजाम की कुल नेट वर्थ 17.47 लाख करोड़ यानी दो सौ तीस बिलियन डॉलर की आंकी गई थी।निजाम की कुल संपत्ति उस समय अमेरिका की कुल जीडीपी की दो फीसदी के बराबर बैठती थी।निजाम के पास अपनी करेंसी थी।सिक्का ढालने के लिए अपना टकसाल था।सौ मिलियन पाउंड का सोना, चार सौ  मिलियन पाउंड के जवाहरात थे।निजाम के पास जैकब डायमंड भी था। निज़ाम हैदराबाद दुनिया के इस सबसे बड़े ,शुतुरमुर्ग के अंडे के बराबर 282 कैरेट के इस हीरे को ,जिसकी कीमत उस वक्त ही नौ सौ करोड़ रूपये थी,साबुनदानी में रखते थे और कभी-कभी पेपरवेट की तरह इस्तेमाल करते थे। उनके बगीचे में दर्जन भर ट्रक खड़े थे, जो लदे हुए माल के वजन के कारण, कीचड़ में बुरी तरह धंसे जा रहे थे।माल था- सोने की ठोस ईंटे। महल के तलघरों मे मुक्ता, नीलम, पुखराज आदि के टोकरे भर-भर कर इस तरह रखे जाते थे जैसे कि कोयले के टोकरे भरे हुए हों। निजाम के पास अनगिनत करोड़ रुपए की ऐसी नगदी थी जो पुराने अखबारों में लिपटी,तहखानों और धूल से अटे पड़े कोनों में पड़ी रहती थी और इसमें से कई हजार पौंड और रुपए तो हर साल चूहे कुतर जाते थे।

ऊपर वाला किस हद तक मज़ाक़िया हो सकता है ,निजाम इसकी मिसाल थे।एटीएम मशीन के चौकीदार सी किस्मत लिखी खुदा ने इनकी।दुनिया का यह सबसे अमीर आदमी ,दुनिया का सबसे बडा कंजूस भी था। दीवान जर्मनी दास ने अपनी मशहूर किताब 'महाराजा' में लिखा है ,जब भी वो किसी को अपने यहाँ बुलाते थे, उनको बहुत कम खाना परोसा जाता था।चाय पर भी सिर्फ़ दो बिस्कुट खाने के लाए जाते थे।एक उनके लिए और दूसरा मेहमान के लिए।जब भी निज़ाम को उनके जानने वाले अमरीकी, ब्रिटिश या तुर्क़ सिगरेट पीने के लिए ऑफ़र करते थे, तो वो सिगरेट के पैकेट से ,एक के बजाय चार-पाँच सिगरेट निकाल कर अपने सिगरेट केस में रख लिया करते थे।उनकी अपनी सिगरेट सस्ती चारमिनार हुआ करती थी, जिसका उस ज़माने में दस सिगरेटों का पैकेट बारह पैसे में आया करता था।

डॉमिनिक लापियरे और लैरी कॉलिंस ने अपनी किताब 'फ़्रीडम एट मिडनाइट' में एक दिलचस्प किस्सा लिखा है, ''हैदराबाद में रस्म थी कि साल में एक बार रियासत के कुलीन लोग निज़ाम को सोने का एक सिक्का भेट करते थे जिन्हें वो बस छू कर उन्हें वापस लौटा देता था।लेकिन आखिरी निज़ाम उन सिक्कों को लौटाने के बजाए अपने सिंहासन पर रखे एक कागज़ के थैले में डालते जाते थे।एक बार जब एक सिक्का ज़मीन पर गिर गया तो निज़ाम उसे ढ़ूढ़ने के लिए अपने हाथों और पैरों के बल ज़मीन पर बैठ गए और लुढ़कते हुए सिक्के के पीछे तब तक भागते रहे जब तक वो उनके हाथ में नहीं आ गया। 

निजाम ने अपने कमरे का बिजली कनेक्शन इसलिए कटवा रखा था, ताकि बिजली का बिल ज्यादा न आए।निजाम का बेडरूम चरम सीमा की गरीबी और बदहाली की कहानी कहता था।यहाँ जो गृहस्थी मौजूद थी उनकी,उसमें एक बेहद पुराना पलंग, टूटी टेबल, सड़ी हुई तीन कुर्सियां, राख से लदी ऐश-ट्रे, कचरे से सनी रद्दी की टोकरियां, शाही कागजात के धूल-सने ढेर, कोने-कोने में मकड़ी के जालों का जंगल और रद्दी की टोकरियाँ शामिल थी। उनके कमरे में एक ऐश-ट्रे भी थी जो साल में सिर्फ एक बार निजाम के जन्म दिन पर साफ की जाती थी। 

डोमिनिक लैपीयरे और लैरी कॉलिन्स लिखते है ,निजाम अपने बेडरूम मे बिछी दरी पर बैठकर ,मामूली टिन-प्लेटों में भोजन किया करते थे।उनके महल की पचासों आबनूसी अलमारियाँ बेशक़ीमती कपडों से भरी हुई थी ,पर वो बिना इस्तरी किया सूती पायजामा पहना करते थे। वह खुद के बुने मोजे पहनते थे और फटे कुर्तों को सिलकर पहन लेते वह महीनों तक इन कपड़ों को बदलते भी नहीं थे।उनके सिर पर,पैंतीस सालों तक एक ही मैलीकुचैली फफूँद लगी टोपी मौजूद बनी रही,और उनके पैरों मे हमेशा लोकल बाजार से मामूली दाम पर खरीदी गई घटिया चप्पलें हुआ करती थी। अब ऐसे आदमी के साथ कौन रहे ,सो उनकी सारी ही बेगमें वक्त रहते अपना चौका चूल्हा अलग कर चुकी थीं,लिहाज़ा निज़ाम बुढ़ापे में एक मामूली से बरामदे में सोते थे जिसमें बकरी भी बंधी होती थी।

और सबसे दिलचस्प सूचना सबसे आखिर मे। पोस्ट के साथ चिपकाई गई फोटो ,अमीरी और कंजूसी की अति वाले इस अनोखे आदमी और उनकी बेगम की नही है। 

मुकेश नेमा

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

राजीव गाँधी?

राजीव गांधी को भूल कर भी मत भूलिएगा भगवान का शुक्र है कि उस दौर में सोशल मीडिया नहीं था नहीं तो राहुल गांधी से भी बड़े थे राजीव गांधी। आज कु...