शनिवार, 22 जुलाई 2023

75 करोड़ पौधे रोपें जाएंगे

75 करोड़ पौधारोपण का लक्ष्य लखनऊ, प्रदेश सरकार द्वारा इस वर्ष पूरे प्रदेश भर में तीन हज़ार करोड़ रुपये व्यय कर 75 करोड़ पौधे रोपने का प्लान बनाया है। सहारनपुर जनपद में इस वर्ष 34 लाख पौधे रोपे जायेंगे। जनपद की पांचों तहसील में एक लाख 63 हज़ार पौधे रोपण का लक्ष्य मिला है। सरकारी-गैरसरकारी स्तर पर पौधा रोपण के लिये सर्वे कर स्थान चिन्हित कर लिये गये हैं। पेड़ो की अंधाधुंध कटाई के कारण ही बरसात में पहाड़ दरक रहे हैं, ज़लज़ले आ रहे हैं। प्रकृति से छेड़छाड़ का नतीजा भुगत रहा है इंसान। पेड़ इंसान के साथी होते हैं। पेड़ हमारी जरूरतों को पूरा करते हैं। पेड़ भूमि कटाव को रोकने में सहायक होते हैं। पेड़ धरती में जल का संरक्षण करते हैं। पेड़ो से पहाड़ो को मजबूती मिलती है। लेकिन इंसान का लालच इन सब बातों पर भारी पड़ रहा है। पौधरोपण तो प्रतिवर्ष होता है। लेकिन जरूरी यह है कि पौधरोपण किये गये पौधों में से बचते कितने पौधे हैं। हर वर्ष सरकारें भारी भरकम राशि व्यय करती है। ऐसे में हम सभी का कर्तव्य है की हम सब भी रोपें गये पौधों की जानकारी रखें एवं उनकी देखभाल में सहयोग करें। सुनील जैन राना

शुक्रवार, 14 जुलाई 2023

मूक पशुओं कब प्रति बेरुखी

जीव रक्षा केंद्र, चिलकाना रोड़, सहारनपुर के बाहर बना पशु प्याऊ तोड़ा जाएगा। इस आशय से सम्बंधित बिजलीं कर्मचारी का फोन संस्था के संयोजक सुनील जैन राना के पास आया। बताया गया कि वहां ट्रांसफार्मर लगेगा जिसके लिये यह प्याऊ तोड़ना पड़ेगा। कर्मचारी ने यह भी कहा कि हम दूसरी जगह पशु प्याऊ बनवा देंगे। संस्था द्वारा नगर में अनेको पशु प्याऊ बनवाये गए थे जिनमें से 2-3ही बचे हैं। कुछ कब्जा लिये गए। कुछ सड़क, नाला बनने के चक्कर मे तोड़ दिये गए। नुमाइश कैम्प में भारत माता मंदिर से पहले बना प्याऊ भी अक्सर उसकी पाईप लाइन तोड़ कर कब्जा करने की फिराक में खोके वाले रहते हैं। अब संस्था के बाहर बने प्याऊ के तोड़ दिए जाने पर दोबारा बने या न बने कैसे विश्वास करें। जीव दया रखते हुए हमें आप सभी के सहयोग की जरूरत है बताएं हम क्या करें। संस्था निःशुल्क जीव दया के कार्य करती है। ऐसे में प्रसाशन के सहयोग की भी हमे जरूरत रहती है। नगर निगम एवम मेयर महोदय से अनुरोध है की इस प्याऊ को टूटने सर बचाएं। 🙏🏻 निवेदक, सुनील जैन राना संयोजक

रविवार, 9 जुलाई 2023

वेज़ सामान, नॉनवेज नाम क्यो?

*बिरयानी कबाब के नाम पर अदभुत संग्राम *दादा जी ने हटवा के ही दम लिया ----- कल एक ब्राम्हण परिवार की शादी में , प्रीतिभोज में जाना हुआ , स्वागत गेट में गुलाब के फूल , मैंगो शेक, ड्राइफूट के साथ स्वागत हुआ अंदर मैदान में अद्भुत नजारा था। आर्केस्ट्रा की स्वर लहरी चारो तरफ गुंजायमान थी । इवेंट मैनेजमेंट का फंडा चारो तरफ बिखरा हुआ दिख रहा है। दूल्हा और दुल्हन को गेट से ही मंच तक लेकर जाने की अदभुत तैय्यारी भी रथ व नाचने गाने वालो को पूरी टीम तैयार थी जो वर वधु को लेकर बीच मैदान में ले जाकर वरमाला करवाकर स्टेज में ले गया । हम सब तो थके मांदे भूख से व्याकुल लोग थे जो पहुंच गए स्टार्टर की ओर पर उसी बीच एक दूसरे और तेज हो हल्ला सुनाई देने लगी, मैं भी गुपचुप का दोना फेक उस और हो लिया। वहा तो अलग ही नजारा था। चक सफेद धोती कुर्ता और कंधे में क्रीम कलर का साफी डाले लगभग 65 साल का बुजुर्ग पर उनका आवाज युवाओं से भी तेज ,लड़की वाले व केट्ररर्स को चमका रहा था और बार बार कह रहा था हम सब खाना नही खायेगे,या तो आप ये मेनू की जो सूची लिखे बोर्ड है उसे फेके या फिर भोजन को फेके ? हम सब ये खाना नही खायेगे । हम शादी में आए है निकाह में नहीं। मेरी भी नजर अचानक खाने के स्टाल पर पड़ी , जहा लिखा था वेज बिरयानी, हरा भरा कबाब, वेज कोरमा कबाब ,वेज हांडी बिरयानी,। बुजुर्ग तमतमाया हुआ था, बात बात में कहता था बिरयानी व कबाब किसे कहते है, मुझे समझाओ फिर ही हम सब भोजन करेगे और अपने इस बहस में मुझे भी शामिल कर लिया की बताइए शुक्ला जी क्या ऐसा लिखना उचित है। मांस के उपयोग से बने भोजन को ही बिरयानी व कबाब कहते है ,क्या हमे इस जगह पर ऐसे हालात में भोजन करना चाहिए ।मेरे और अनायास दादा के प्रश्न पर मैं भी कुछ बोल नहीं पा रहा था। एक तरफ केट्ररर्स की गलती ,समाज में चल रहे अंधाधुन पश्चात्य संस्कृति के ढल रहे लोग,और दूसरी ओर हाथ जोड़े अनुनय करते खड़े लड़की के परिवार वाले? और सबके बीच धर्म, संस्कृति व भोजन के तरीके पर अड़े दादाजी,जो अपनी जगह बिल्कुल सही थे अब उनके स्वर और तीखे हो गए कहने लगे बताओ मैं विवाह में आया हु की निकाह में ? बाते बढ़ते देख मेने व वहा पर खड़े दो तीन मित्रो ने मिलकर केटरर्स को चिल्लाकर स्टाल से सारे स्टीगर निकाल फेके जिसमे बिरयानी व कबाब जैसे शब्द लिखे थे, तब दादाजी का गुस्सा शांत हुआ और फिर उन्होंने भोजन ग्रहण करने की हामी भरी वो भी बैठकर, । दादा जी की बाते वहा पर उपस्थित सभी लोगो को एक सीख दे गई की मांसाहारी भोजन के लिए ही कबाब व बिरयानी जैसे शब्द प्रयोग किया जाता है ।और खाना नही हमे भोजन करना चाहिए । केटरर्स जो भी लिखे उसे हमे भी एक बार मेनू तय करते समय अपनी समाज एवम संस्कृति के हिसाब से देख भी लेना चाहिए ।।