शनिवार, 13 सितंबर 2025

नामकरण संस्कार

🌹नामकरण : संस्कृति और पहचान🌹

भारतीय धर्मों के परिवार आजकल बच्चों के नाम पाश्चात्य तर्ज़ पर रखने लगे हैं। पूर्व में, विशेषकर तमिलनाडु में दिगम्बर जैन समुदाय में नामकरण की परंपरा तीर्थंकरों, जैन कथानकों में वर्णित पात्रों तथा जैन अधिष्ठाता देव–देवियों के नामों पर आधारित होती थी। आज भी कुछ परिवार इस परंपरा को संजोए हुए हैं। लेकिन देखने-सुनने में आता है कि श्वेताम्बर जैन परिवारों में पाश्चात्य तर्ज़ पर नाम रखने का चलन अधिक बढ़ गया है। जैसे—निकिता, आनवी, युवीर, येदांत, साख , अयान आदि। कई बार बुज़ुर्ग इन नामों का सही उच्चारण भी नहीं कर पाते हैं । प्रश्न यह है कि क्या हमें अपने बच्चों के नाम भी विदेशों से आयात करने चाहिए ?

वहीं दूसरी ओर विदेशी धर्मावलंबी आज भी परंपरागत नामों को महत्व देते हैं। उनके नाम से ही धर्म की पहचान हो जाती है। इसके विपरीत भारतीय धर्मों में नामों से पहचान करना कठिन होता जा रहा है। विदेशी शैली पर नाम रखकर हम क्या सिद्ध करना चाहते हैं ? याद कीजिए—लॉर्ड मैकाले ने सौ वर्ष पहले कहा था कि भारत पर स्थायी विजय पाने के लिए भारतीय संस्कृति को समाप्त करना आवश्यक है। अंग्रेजों के शासनकाल में यह पूरी तरह संभव नहीं हो पायी । लेकिन उनके जाने के बाद धीरे-धीरे भारतीय संस्कृति में ह्रास शुरू हो गया।

भाषा बदली—लोग अंग्रेज़ी में बात करना अपनी शान समझने लगे। पहनावा बदला—रीति-रिवाज़ बदल गए।खानपान बदला—पढ़ाई और शिक्षा पद्धति बदली। स्वरोज़गार के बजाय नौकर बनना ज़्यादा पसंद आने लगा। मंदिरों की पूजा-पद्धति और समय में भी बदलाव होने लगा। जन्मदिन, नववर्ष जैसे पाश्चात्य जश्न ने धार्मिक पर्वों का स्थान लेना शुरू कर दिया।

अब समय है कि हम गंभीर चिंतन और मनन करें। नामकरण से लेकर जीवनशैली तक भारतीय बने रहें, यही हमारी असली पहचान है। यदि हम अपने बच्चों को भारतीय और धार्मिक नाम देंगे तो उनमें संस्कार, आस्था और परंपरा स्वतः जीवित रहेगी। नाम केवल पहचान नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के संस्कार का आधार है। आइए हम संकल्प लें कि भारतीय संस्कृति की धरोहर को जीवित रखें और इसे गर्व के साथ आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाएँ।

सुगालचन्द जैन, चेन्नई

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