दलितों को समझना चाहिए की कौन उनका हितैषी है। राहुल गाँधी को खुद अपनी जात पता नहीं और जातीय जनगणना कराने की बात करते हैं। बिहार में ज़ब जातीय जनगणना हुई तब ये सरकार में भागीदार थे। अब कोई इनसे पूछें की बिहार में जातीय जनगणना से किसको फायदा हुआ तो ये जबाब नहीं दे पायेंगे।
अम्बेडकर की फोटो लहराकर राहुल गाँधी क्या बताना चाह रहें हैँ। इनके साथ जुटी भीड़ भले ही दलितों की हो लेकिन उन्हें भी पता नहीं होगा की उनके भगवान अम्बेडकर को कांग्रेस नें कितना अपमानित किया था। यहां तक की चुनावों में भी जानबूझकर अम्बेडकर को हरवा दिया था। अब उसी कांग्रेस के नेता राहुल गाँधी को तो बस हल्ला मचाने का कोई भी मुद्दा चाहिए। उससे क्या लाभ - हानि होगी इन्हें पता नहीं होता।
नेताओं के साथ जुटी भीड़, भीड़ ही होती है, उस भीड़ को पता नहीं होता की उन्हें क्यों इकट्ठा किया गया है। उनके क्या मुद्दे हैं? बस नेताबको देखा इकठे हो गये। अक्सर ऐसा ही होता है की या तो धन देकर भीड़ इकठ्ठा की जाती है या किसी बड़े नेता के नाम पर लोग इकठ्ठा होते हैं।
सुनील जैन राना
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें