सोमवार, 7 जुलाई 2025

जैन मंदिरो पर कब्जा

अंबिका माता #शक्तिपीठ  गिरनार । 
वर्तमान में यह एक हिंदू मंदिर के रूप में जाना जाता है । लेकिन वास्तव में यह एक जैन मंदिर था । जो 22वें तीर्थंकर नेमिनाथ प्रभु की यक्षिणी अंबिका को समर्पित था । 
क्षमा करना, लेकिन एक बात बहुत गहरी समझ आ गई। एक बात  का दोष लगाया जाता है कि श्रमण राजाओं और प्रजा के अहिंसा धर्म के कारण भारत कमजोर हो गया । जो कि बिल्कुल बेबुनियाद भ्रम जो भारतीय समाज में फैलाया गया । जबकि वे श्रमण राजाओं का ही शासन काल था जिसे स्वर्णिम भारत कहां गया । उन्हीं श्रमण राजाओं ने अखंड भारत की नींव रखी थी ।उसी अहिंसा धर्म के बलबूते ।।  एक भी ब्राह्मणवादी राजा नहीं मिलेगा इतिहास में जिसने इस संपूर्ण भारत तो छोड़ो , बल्कि आधे भारत भूमि को भी एक सूत्र में नहीं बांध पाए । बल्कि इस भूमि को खंड खंड कर दिए।  विदेशी आक्रमणों से इस भूमि को बचा नहीं पाए ।  थोड़ा इतिहास को गौर से पढ़ें ।
इतिहास में जैसे जैसे जिनालयों के स्वरूप को बदलकर हिंदू मंदिरों में परिवर्तित करते चले गए । जैसे जैसे लोग चमत्कारिक , लुभावने देवी देवताओं की मन मोहक काल्पनिक कहानियों के झांसों  में आते गए, वैसे वैसे भारत कमजोर होता चला गया । चूंकि भारत के लोग अपने मूल संस्कारों को छोड़ते चले गए । अपनी मूल भारतीय जीवन शैली भुलाते चले गए । अरिहंतो की दिगंबर ध्यानस्थ प्रतिमाओं पर पाखंडों का चोला ओढ़ा दिया गया । भारत से भारत के मूल संस्कार ही छिपा दिए गए । 
आप लोग क्या सोचते हैं? मुसलमानों ने, अंग्रेजों ने जीत लिया भारत ? नहीं , तुम हार गए, इसीलिए वे जीत गए। भारतीयों ने अपने मूल संस्कार छोड़ दिए ।  कमजोर  जीवन शैली ने आज भारतीय समाज को कहां लाकर खड़ा कर दिया । सोने की चिड़िया वाला भारत था । और  आज के भारत की आधी से ज्यादा आबादी मुफ्त के अनाज  के लिए कतार पर खड़ी है।  
काल्पनिक कहानियों से बाहर निकलें । मंदिरों के मूल स्वरूप को जानें । तभी आपको भारतीय जीवन  दर्शन का सही रूप ज्ञात होगा । 
इस मंदिर का प्राचीनतम निर्माण 7-8 वीं शताब्दी से भी पूर्व में हुआ था।  इस मंदिर की नींव इसकी साक्षी है  । इस मंदिर का उल्लेख दिगंबराचार्य जिनसेन जी द्वारा रचित  हरिवंश पुराण (7th century) में भी मिलता है। अनेक साक्ष्यों से भरा हुआ है जैन इतिहास । और ये इतिहास सिर्फ कागजों में नहीं या कोई काल्पनिक कहानियों में नहीं गढ़ा गया । बल्कि भारत के पर्वतों की ऊंची ऊंची चोटियों की चट्टानों में लिखा है । आज भारत को साक्ष्यों की अपेक्षा , पाखंड से, पूर्वाग्रहों से बाहर आने की आवश्यकता है । और भारत की सही जीवन शैली पुनः अपनाने की आवश्यकता है । इन प्राचीन मंदिरों को अपने मूल स्वरूप में आना चाहिए ।  इनकी शुचिता व पवित्रता अति आवश्यक है । तब ही इस भारत का सूर्य चमकेगा । 
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