गुरुवार, 2 अप्रैल 2026

युद्ध जीतकर भी हार गए

1971 की लड़ाई में इंदिरा गांधी की तारीफ तो हम सब करते हैं, लेकिन पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी के संसद में दिए उस धमाकेदार बयान को पढ़ना जरूरी है, जो शिमला समझौते की सच्चाई उजागर करता है।

युद्ध की पृष्ठभूमि
1971 के युद्ध में पाकिस्तान के 93,000 से अधिक सैनिक भारतीय कैद में थे, जिनमें 3,000 से ज्यादा अधिकारी शामिल थे।

भारतीय सेना ने सिंध के थारपारकर जिले के बड़े हिस्से पर कब्जा कर लिया था और उसे गुजरात का नया जिला घोषित करने की घोषणा की थी।

मुजफ्फराबाद में भी तिरंगा फहराया गया था, लेकिन ये सारी जीत मैदान में हुई—मेज पर कुछ और ही हुआ।

शिमला समझौते का खेल
जुल्फिकार अली भुट्टो अपनी बेटी बेनजीर भुट्टो को लेकर शिमला आए, जहां इंदिरा गांधी ने कश्मीर की मांग रखी—93000 सैनिकों के बदले कश्मीर दो।

 भुट्टो ने साफ इनकार कर दिया: "कश्मीर नहीं देंगे, सैनिक रख लो।" जिनेवा कन्वेंशन के तहत युद्धबंदियों की गरिमा बनाए रखना भारत पर था, जिसका बोझ इंदिरा नहीं झेल सकीं।

भुट्टो की कूटनीति
भुट्टो ने बेनजीर से कहा कि भारत की कमर टूट चुकी—शरणार्थियों का बोझ, अर्थव्यवस्था चरमराई, 93000 सैनिक पालना असंभव।

 उन्होंने इंदिरा को घेर लिया, जैसे सांप के गले में छछूंदर फंस जाए। पुपुल जयकर और कुलदीप नैयर की किताबों में लिखा है कि इंदिरा के पास कूटनीतिक दांव का ज्ञान नहीं था, वो मौके चूक गईं।

समझौते का नतीजा
शिमला समझौते (1972) में इंदिरा ने कश्मीर मुद्दा द्विपक्षीय रखा, 93000 पाक सैनिक लौटा दिए, थारपारकर (जहां 1971 में हिंदू बहुल आबादी थी) पाकिस्तान को वापस कर दिया।

 भारत के 54-56 सैनिक पाक जेलों में, मरते रहे।

सेना प्रमुख का गुस्सा
तत्कालीन सेना प्रमुख ने रिटायरमेंट के बाद किताब में लिखा: "मैदान में हम जीते, लेकिन राजनेताओं ने मेज पर हरा दिया—वो इंदिरा गांधी थीं।"

 आसिफ जरदारी ने संसद में कहा कि भुट्टो ने इंदिरा से जमीन वापस ले ली, जबकि 90,000 कैदी भारत के पास थे।

कांग्रेस का इतिहास यही बताता है—युद्ध जीता, लेकिन कूटनीति में बर्बादी। ये दमदार सबक है कि ताकत मैदान तक सीमित न रहे।

युद्ध जीतकर भी हार गए

1971 की लड़ाई में इंदिरा गांधी की तारीफ तो हम सब करते हैं, लेकिन पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी के संसद में दिए उस धमाकेदार ब...